अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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रथसे रथीको राक्षसको राक्षस द्वारा घोडेको घोडेसे पृथ्वीतलमें पीसने लगे ॥ २५ ॥ वानरोंसे वानरोंको घोररूपसे राक्षस ताडन करने लगे और राक्षसोंको राक्षसद्वारा पीसने लगे ॥ २६ ॥
आक्षिप्य च शिला जघ्नु राक्षसा वानर स्तथा ॥ तेषामाच्छिद्य शस्त्राणि जघ्नुस्तानपि वानराः ॥ २७ ॥ निर्जघ्नुः शैलशिखैर्विभिन्नाश्च परस्परम् ॥ सिंहनादं विनेदुश्च रणे वानरराक्षसाः ॥ २८ ॥
शिलाओंसे राक्षस वानरोंको मर्द्दन करने लगे और उनके शस्त्रोंको छेदन कर वानर उनको मारने लगे ॥ २७ ॥ परस्पर शैलशिखरोंको प्रहारकरके रणमें परस्पर ताडन कर रीछ वानर शब्द करने लगे ॥ २८ ॥
छिन्नचर्मतनुत्राणा राक्षसा वानरैः कृताः ॥ सुस्राव रुधिरं तेभ्यः स्रवतः पर्वतादिव ॥ २९ ॥ तस्मिंस्तदा संयति संप्रवृत्ते कोलाहले राक्षसराजधान्याम् ॥ संहृष्यमाणेषु च वानरेषु निपात्यमानेषु च राक्षसेषु ॥ ३० ॥
छिन्न चर्मतरकस राक्षसोंको वानरोंने कर दिये और पर्वतोंसे झरनेके समान उनके रुधिर निकलने लगा ॥ २९ ॥ तब उस संग्रामसे प्रवृत्त होनेमें राजधानीमें वडा कोलाहल हो गया, वानरोंके प्रसन्न होनेमें और राक्षसोंके मारनेमें ॥ ३० ॥
प्रभज्य मानेषु महाबलेषु महर्षयो भूतगणाश्च नेदु ॥ तेनापि सर्वे हरयः प्रहृष्टा विनेदुरास्फोटितसिंहनादैः ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर काण्डे संकुलयुद्धं नामविंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥
महासेनाके भग्न होनेमें महर्षि और भूतगण शब्द करने लगे, इससे सब वानर प्रसन्न हुए और भुजा फटकारते सिंहनाद करने लगे ॥ ३१ ॥
इत्यार्षे श्रीम. मा. आदि. अद्भु. भा. टी. संकुलयुद्धंनाम विंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥