अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(११२) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-
एकविंशति सर्ग
रावणका रामकी सेनाको विक्षेप करना
ततो रथं मारुततुल्यवेगमारुह्य शक्तिं निशितां प्रगृह्य ।। स
रावणो रामबलं प्रहृष्टो विवेश मीनो हि यथार्णवौघम् ।। १ ।।
सवानरान्हीनबलान्निरीक्ष्य प्राणेन दीप्तेन रराज राजा ।। एक-
क्षणेनैद्ररिपुर्महात्मा निहंतुमैच्छन्नरवानरांच ।। २ ।।
तब वडे क्षीण रथमें सवार होकर तीक्षण शक्तिको ग्रहण कर रावण रामकी सेनामें ऐसे प्रविष्ट हुआ जैसे मीन-सागरमें प्रवेश करती है ।। १ ।। तब वह वानरोंको हीनबल देखकर और राजा रावण प्राणोंके दीप्त होनेपर एकही क्षणमें उस वानरी सेनाके मारनेकी इच्छा करने लगा ।। २ ।।
मनसा चिंतयामास सहस्र कंधरः स्वराट् ।। एते क्षुद्राः समायाताः
प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।। ३ ।। द्वीपांतरं महत्प्राप्य मम युद्धाभिकां-
क्षिणः ।। किं स्यान्म महतैः क्षुद्रैर्नरराक्षसवानरैः ।। ४ ।।
वह सहस्रमुखका रावण मनमें विचार करने लगा, यह क्षुद्र अपने प्राण और धन छोडकर यहां आये हैं ।। ३ ।। और द्वीपान्तरमें प्राप्त होकर मुझसे युद्धकी इच्छा करते हैं, इन क्षुद्र नर राक्षस वानरोंके मारनेसे मुझे क्या मिलेगा ।। ४ ।।
यस्माद्देशात्समायातास्तं देशं प्रापयाम्यहम् ।। क्षुल्लकेषु शराघातं
न प्रशंसंति पंडिताः ।। ५ ।। इति संचिंत्य धनुषावायव्यास्त्रं युयोज
ह ।। तेनास्त्रेण नरा ऋक्षा वानरा राक्षसा हि ते ।। ६ ।।
यह जिस देशसे आये हैं उसी देशमें प्राप्त किये देता हूँ क्षुद्रोंमें शराघात करनेकी पंडित जन प्रशंसा नहीं करते हैं ।। ५ ।। यह विचार कर धनुषपर वायव्य अस्त्र चढाया, उस अस्त्रसे राक्षस वानर जितने सेनाके लोग थे ।। ६ ।।
यस्माद्यस्मात्समायातास्तं तं देशं प्रयापिताः ।। गलहस्तिकया
विप्र चोरान्राजभटा इव ।। ७ ।। ते सर्वे स्वगृहं प्राप्ता अस्त्रवेगेन
विस्मिताः ।। क्व स्थिताः क्व समा*यातामन्यंत स्वप्न एव तैः ।।८।।
* समायाताः अमन्यंतेतिच्छेदः संधिरार्षः ।