अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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जिस जिस देशसे आये थे उस उस देशको चले गये, जैसे जबरदस्ती चोरोंको राजसेवक गलहस्त देकर निकालते हैं ॥ ७ ॥ वे अस्त्रवेगसे अपने अपने घर आकर आश्चर्य करने लगे, हम कहां थे कहां आ गये इस प्रकार स्वप्न देखने लगे ॥ ८ ॥
प्रलयानिलवेगेन अस्त्रेण वंचिता भृशम् ॥ भरतो लक्ष्मणश्चापि शत्रुघ्नो हनुमांस्तथा ॥ ९ ॥ सुग्रीवनलनीलाद्या हरयोऽनिलरंहस ॥ विभीषणपुरोगाश्च राक्षसाः क्रूरविक्रमाः ॥ १० ॥
प्रलयकी पवनके वेगसे अत्यन्त आहत हुए भरत, शत्रुघ्न, हनुमान् ॥ ९ ॥ सुग्रीव, नल, नीलादि वानर पवनवेगसे विभीषणादि सम्पूर्ण राक्षस जो बडे पराक्रमी थे ॥ १० ॥
वानराश्च नरा ऋक्षा राक्षसा अक्षता गृहम् ॥ प्राप्यातिवि- स्मिताः सर्वे शोचंतो राममेवपि ॥ ११ ॥ पुष्करे पुष्पकेतिष्ठन्ससीतो राघवः परम् ॥ आस्ते स्म नास्त्रवेगोऽयं रामं चालयितुं क्षमः । १२ ।
वानर, नर, रीछ, राक्षस सब अक्षत अपने घर प्राप्त हो महाविस्मययुक्त रामचन्द्रके निमित्त शोच करने लगे ॥ ११ ॥ केवल सीतासहित रामचन्द्र पुष्पक विमानमें स्थित रहे, वह अस्त्र रामको चलायमान करनेको समर्थ न हुआ ॥ १२ ॥
महर्षयोऽपि तत्रासन्किमेतदिति विस्मिताः ॥ सापि सीता महा- भागा तत्रास्ते स्म शुचिस्मिता ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगराकारं दृष्ट्वा रागबलं महत् ॥ स्वस्तीतिवादिनः सौम्यशांतिं जेपुर्महर्षयः ॥ १४ ॥
जो महर्षि थे वेभी यह क्या हुआ, इस प्रकार आश्चर्यमें भरकर सोचने लगे; वह महाभागा मनोहर हास्ययुक्त जानकीभी वहीं स्थित रही ॥ १३ ॥ गन्धर्वनगरके समान वह रामकी वडी भारी सेनाको देख स्वस्ति कहकर ऋषिजनशांतिका जप करने लगे ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षचराः सर्वे हाहाकारं प्रचक्रिरे ॥ देवा अग्निमुखा विप्र किं कृतं रावणेन हि ॥ १५ ॥ गरुडस्थो यदा विष्णू रावणं हंतुमा- गत ॥ लीलया लवणांभोधौ क्षिप्तो विष्णुः सनातनः ॥ १६ ॥
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