भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(११४) अद्भुतरामायण [ एकविंशति-

अन्तरिक्षचारी जीव हाहाकार करने लगे, अग्निमुखादि देवता कहने लगे यह रावणने क्या किया ॥ १५ ॥ जिस समय गरुड़पर स्थित विष्णु रावणके मारनेको आये थे तो इसने लीलासेही सागरकी ओर क्षिप्त कर दिया था ॥ १६॥

साट्टहासं विनद्योच्चै रक्षसा वामपाणिना ॥ ततः प्रभृति देवाश्च गंधर्वाः किन्नरा नराः ॥ १७ ॥ गन्धमस्य न गृह्णन्ति शार्दूलस्येव जंबुकाः ॥ सोऽयं विष्णुर्दशरथाज्जातो देवः सनातनः ॥ १८ ॥

और हँसकर बाँये हाथसेही यह कार्य इसने किया था; उस दिनसे देवता गन्धर्व किन्नर अप्सरा ॥ १७ ॥ इसकी गन्धतक ग्रहण नहीं करते हैं, जैसे शार्दूलकी गन्धको जंबुक नहीं ग्रहण करते हैं, वही यह सतातन विष्णु दशरथसे उत्पन्न हुए हैं ॥ १८ ॥

अस्माकं भागधेयेन रामो जयतु रावणम् ॥ परस्परं सुराः सर्वे वदन्तोऽन्तर्हिता स्थिताः ॥ १९ ॥ ननर्द च सहस्रास्याः क्षुद्रं मत्वा स राघवम् ॥ विसिष्मिये च रामोऽपि तद्दृष्ट्वा कर्म दुष्करम् ॥ २० ॥ क्रोधमाहारयामास रावणस्य वधं प्रति ॥ ततः किलकिलाशब्दं चक्रू राक्षसपुंगवाः ॥ २१ ॥ स राघवः पद्मपलाशलोचनो जज्वल कोपेन द्विषज्जयैषणः ॥ रामं प्रहर्तुं न शशाक मेदिनी चकंपिरे वारिधयो ग्रहा अपि ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामसैन्यविक्षेपणं नामैकविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥

हमारे भाग्यसे राम रावणको जीतें, इस प्रकार अन्तरमें स्थित हुए सब देवता परस्पर कहने लगे ॥ १९ ॥ और रामचन्द्रको क्षुद्र मानकर रावण गर्जने लगा, उसका यह दुष्कर कर्म देखकर रामचन्द्रको आश्चर्य हुआ ॥ २० ॥ और रावणके वध करनेको वडा क्रोध किया, तब राक्षस किलकिला शब्द करने लगे ॥ २१ ॥ तब कमललोचन रामचन्द्र शत्रुको जीतनेके निमित्त क्रोधसे जल उठे, तब इधर रामके प्रहार करनेको समर्थ न हुआ तब पृथ्वी, सागर और सब ग्रह कंपित होगये ॥ २२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा० अद्भु० भा०टी० रामसैन्यविक्षेपणं नामकैविंशतितमः सर्गः ॥ २१ ॥