अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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द्वाविंशति सर्ग
रामचन्द्रका मूर्च्छित होना
विनर्दन्तं रिपुं दृष्ट्वा रामः शत्रुनिबर्हणः। जज्वलंच स कोपेन रक्षसां सहजो रिपुः ॥ १ ॥ विचकर्ष धनुः श्रेष्ठ प्रलयानलसंनिभम् ॥ वेगेन बाणांश्चिक्षेप रक्षसां मर्मसु प्रभुः ॥ २ ॥
शत्रुनाशी श्रीरामचन्द्रजी शत्रुको गर्जन करता हुआ देखकर वह राक्षसोंके स्वाभाविक शत्रु कोपसे जल उठे ॥ १ ॥ प्रलयके समान उस धनुषश्रेष्ठको खेंचकर वेगसे राक्षसोंके मर्मस्थानमें प्रभु बाण प्रहार करने लगे ॥ २ ॥
तिलशः खण्डयन्ति स्म बाणा राक्षसपुङ्गवान् ॥ कदा धनुषि संधत्ते कदा विसृजति प्रभुः ॥ ३ ॥ नान्तरं ददृशे कैश्चिच्छिन्नाः स्युररयः परम् ॥ जघान राक्षसान्रामो रुद्रः पशुगणानिव ॥ ४ ॥
और बाणोंसे राक्षसश्रेष्ठोंको खंड खंड करने लगे कब धनुषके ऊपर बाण चढाते और कब छोडते हैं ॥ ३ ॥ इसमें कुछभी अन्तर नहीं दीखता था और शत्रु क्षीण होते चले जाते थे, रामने राक्षसोंको ऐसा मारा जैसे रुद्र पशुओंका संहार करता है ॥ ४ ॥
तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म कृतं रामेण रावणः॥ अनीकाग्रं समासाद्य युयुधे राघवेण हि ॥ ५ ॥ रे रे राक्षससेनान्यः प्रेक्षका इव तिष्ठत ॥ अहमेको हनिष्यामि नरमाकस्मिकं रिपुम् ॥ ६ ॥
रामचंद्रका यह दुष्कर कर्म देखकर रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥ अरे राक्षसी सेनाके लोगो ! क्या तुम देखते हुए स्थित हो, मैं इस अकस्मात् आये शत्रुको इकला वध करूंगा ॥ ६ ॥
अद्य निर्मानवां पृथ्वीं निर्देवं त्रिदिवं तथा ॥ करिष्याम्यहमेवैकः शोषयिष्यामि वारिधीन् ॥ ७ ॥ पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि पातयिष्यामि वै ग्रहान् ॥ इत्युक्त्वा राक्षसश्रेष्ठो रामं योद्धुमथाह्वयत् ॥ ८ ॥
आज पृथ्वीको निर्मनुष्य कर डालूंगा, तथा त्रिदिवको देवतारहित करदूंगा और सागरको सोख डालूंगा ॥ ७ ॥ पर्वतोंको चूर्ण कर ग्रहोंको गिरा दूंगा, हे राम ! यह लंकापुरी नहीं है यह कहकर राक्षसश्रेष्ठ रामचन्द्रको युद्ध के निमित बुलाने लगा ॥ ८ ॥