भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(११६) अद्भुतरामायण [द्वाविंशो-

त्वामद्य खड्गेनाच्छिद्य तर्पयिष्यामि चानुगान् ।। नेयं लंकापुरी राम नाहञ्च दशकन्धरः ।। ९ ।। शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया रघुनन्दन ।। कपित्थमिव काकुत्स्थ करी मदकलः किल ।। १० ।। कि, आज तुमको खड्गसे छेदन कर अपने अनुचरोंको तृप्त कर दूंगा, हे राम ! न तो यह लंकापूरी है और न मैं दशमुख रावण हूं ।। ९ ।। मैं गदास तुम्हारा शिर चूर्ण कर दूंगा यह कैथकी तरहसे वा मदवाले हाथीके समान गिरेगा ।। १० ।।

इत्युक्त्वा रावणो युद्धं रामेण सह चारभत् ।। तदभूद्वैरथं युद्धं बलिवासवयोरिव ।। ११ ।। रावणं प्राप्य रामोऽपि परं हर्षमुपागमत् ।। तदभूदद्भुतं युद्धं द्वयोर्वै रोमहर्षणम् ।। १२ ।। यह कह रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा वह वलि वासवके समान वीरथ युद्ध होने लगा ।। ११ ।। रावणको प्राप्त हो राम भी परम प्रसन्न हुए, वह उन दोनोंका रोमहर्षण युद्ध हुआ ।। १२ ।।

रामस्य च महाबाहोर्बलिनौ रावणस्य च ।। गांधर्वेण च गांधर्वं दैवं दैवेन राघवः ।। १३ ।। अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ।। अस्त्रयुद्धे च परमो रावणो राक्षसाधिपः ।। १४ ।। महाबाहु राम और वली रावणका गन्धर्व तथा दैव आदि अस्त्रोंसे युद्ध होने लगा ।। १३ ।। परमास्त्रज्ञाता रामने राक्षसराजके अस्त्रोंको ताडन कर दिया, परम अस्त्रयोधी रोक्षसपति रावण ।। १४ ।।

ससर्ज परदक्रुद्धः पन्नगास्त्र स राघवे ।। ते रावणधनुर्मुक्ताः शराः कांचनभूषिताः ।। १५ ।। अभ्यवर्त्तन्त काकुत्स्थं सर्पा भूत्वा महाविषाः ।। ते सर्पवदना घोरा वमन्तो ज्वलनं मुखैः ।। १६ ।। रामचन्द्रके ऊपर पन्नगास्त्रका प्रहार करता हुआ उससे रावणके धनुषसे मुक्त हुए सुवर्णभूषित बाण ।। १५ ।। रामके ऊपर सर्प होकर गिरने लगे और वे घोर सर्प मुखसे अग्निको वमन करते थे ।। १६ ।।

राममेवाभ्यवर्त्तंत व्यादितास्या भयावहाः ।। तैर्वासुकिसमस्पर्शै-र्दीप्तभोगैर्महाविषैः ।। १७ ।। दिशश्च विदिशश्चैव समंतादावृता भृशम् ।। रामः संपततो दृष्ट्वा पन्नगांस्तान्सहस्रशः ।। १८ ।।