अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११७)
मुख फैलाये हुए वे महाबली सर्प रामके ही निकट धावमान हुए वह वासुकीके समान दीप्त भागवाले महाविषैले ॥ १७ ॥ दिशा विदिशाओंको सब ओरसे व्याप्त करते हुए, तब रामचन्द्र सब ओर सर्पोंको धावमान देखकर ॥ १८ ॥
सौपर्णमस्त्रं तद्घोरं पुनः प्रावर्तयद्रणे ॥ रामेण च शरा मुक्ता रुक्मपुंखाः शिलाशिताः ॥ १९ ॥ सुपर्णाः कांचना भूत्वा विचेरुः सर्पशत्रवः ॥ ते ताञ्छत्रुशराञ्जघ्नुः सर्परूपान्महाविषान् ॥ २० ॥
युद्धमें घोर गरुडास्त्रका स्मरण करते हुए, वे रामचन्द्रके सुवर्ण पुंखवाले बाण शिलापर पैनाये हुए ॥ १९ ॥ सुवर्णके गरुड होकर सब ओरसे सर्पशत्रु विचरने लगे उन्होंने रावणके महाविषैले सर्पोंका नाश कर दिया ॥ २० ॥
सुपर्णरूपा रामस्य विशिखाः कामरूपिणः ॥ अस्त्रे प्रतिहते क्रुद्धो रावणो राक्षसाधिपः ॥२१॥ अभ्यवर्षत्तदा रामं घोराभिश्चाश्मवृष्टिभिः ॥ ततः शरसहस्रेण पुनरक्लिष्टकारिणम् ॥ २२ ॥
शिखाहीन कामरूपी रामके बाणोंसे अस्त्र नष्ट होनेसे राक्षसराज रावण बडा क्रोधित हुआ ॥ २१ ॥ और रघुनाथजीके ऊपर घोर पत्थरकी वर्षा करने लगा, फिर सौ सहस्र बाणसे अक्लिष्ट कर्मकारी ॥ २२ ॥
रामबाणानभ्यहनद्घोराभिः शरवृष्टिभिः ॥ विषेदुर्देवगंधर्वाश्चारणाः पितरस्तथा ॥ २३ ॥ रामप्रार्तं तदा दृष्ट्वा सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ रामचन्द्रमसं दृष्ट्वा ग्रस्तं रावण राहुणा ॥ २४ ॥
रामके बाणोंको घोर बाणवर्षासे नष्ट करने लगा । देव, गन्धर्व, चारण, पितर यह देखकर दुःखी हुए ॥ २३ ॥ रामचन्द्रको व्याकुल देखकर सिद्ध और परमर्षि ऐसे जानने लगे मानो चन्द्रको राहु ग्रास करता हो ॥ २४ ॥
प्राजापत्यं च नक्षत्रं रोहिणीं शशिनः प्रियाम् ॥ समाक्रम्य बुधस्तस्थौ प्रजाना महिते रतः ॥ २५ ॥ सधूमः परिवृत्तोर्मिः प्रज्वलन्निव सागरः ॥ उत्पपात ततः क्रुद्धः स्पृशन्निव दिवाकरम् ॥ २६ ॥
उस समय प्रजापतिका नक्षत्र चन्द्रमाकी प्रिया रोहिणीको आक्रमण कर बुध स्थित हुआ, इससे भी प्रजाका अहित होता है ॥ २५॥ समुद्र जलने सा लगा और धूम निकलने लगा तब वह रावण सूर्यको स्पर्श करते हुए के समान ऊपरको कूदा ॥ २६ ॥