अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 125, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें( ११८ ) अद्भुतरामायण [ द्वाविंशो-
नष्टरूपश्च परुषो मंदरश्मिर्दिवाकरः॥अदृश्यत कबन्धांकः समेतो धूमकेतुना ॥ २७ ॥ ऋक्षाश्वरवनिर्घोषा गगने पुरुषाधमाः ॥ औत्पातिकानि नर्दतः समंतात्परिचक्रमुः ॥ २८ ॥
उस समय नष्टरूप पुरुष और मन्द किरणोंवाला सूर्य हो गया और धूमकेतुके सहित कबन्ध दीखने लगा ॥ २७ ॥ आकाशमें नक्षत्रोंका तीक्ष्ण शब्द होने लगा, सब ओरसे उत्पात दीखने लगे ॥ २८ ॥
रामोऽपि बद्ध्वा भ्रुकुटिं क्रोधसंरक्तलोचनः ॥ क्रोधं चकार सुभृशं निर्द्दहन्निव राक्षसम् ॥ २९ ॥ तस्य क्रुद्धस्य वदनं दृष्ट्वा रामस्य धीमतः ॥ सर्वभूतानि वित्रसुः प्राकंपत मही तदा ॥ ३० ॥
रामचन्द्रभी भौंह चढ़ाये क्रोधसे लालनेत्र किये राक्षसको जलाते हुएके समान क्रोध करते हुए ॥ २९ ॥ उन क्रोध किये रामचन्द्रका मुख देखकर सब भूत घबड़ा गये और पृथिवी कंपित होगई ॥ ३० ॥
सिंहशार्दूलमाच्छैलः प्रजज्वालाकुलद्रुमः ॥ बभूव चातिक्षुभितः समुद्र इव १पर्वसु ॥ ३१ ॥ लंकायां रावणवधे यं प्रायुंक्त शरं प्रभुः ॥ जग्राह तं शरं दीप्तं निःसंतमिवोरगम् ॥ ३२ ॥
सिंह शार्दूलके सहित पर्वत और कुलवृक्ष जल उठे और पर्वतमें सागरके समान समुद्र क्षुभित होगये ॥ ३१ ॥ लंकामें रावण वधके निमित्त जो बाण प्रभुने चलाया था, उसी बाणको श्वास लेते सर्पके समान ॥ ३२ ॥
यमस्मै प्रथमं प्रादादगस्त्यो भगवानृषिः ॥२ब्रह्मदत्तं महाबाणं यमाह युधि तद्वधे ॥ ३३ ॥ ब्रह्मणा निर्मितं पूर्णमिंद्राद्यैरमिततेजसा ॥ दत्तं सुरपतेः पूर्वं त्रैलोक्यजयकांक्षिणः ॥ ३४ ॥
प्रभुने ग्रहण किया, वह ब्रह्मदत्त महाबाण अगस्त्यजीने दिया था, युद्धमें उसके वधको ग्रहण किया ॥ ३३ ॥ वह महातेज द्वारा ब्रह्माका निर्माण किया था, इन्द्रादिके तेज उसमें विद्यमान थे, त्रिलोकी जयकी इच्छा करनेवाले इन्द्रके निमित्त वह बाण दिया गया था ॥ ३४ ॥
१ पर्वस्विवेतिसम्बन्धः । २ यं महाबाणं ब्रह्मदत्तं प्राहैत्यन्वयः । युधितद्वधनिमित्तं ब्रह्मणा निर्मितमिति