अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 127, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ें( १३० ) अद्भुतरामायण [द्वाविंशति-
तं वज्रमिव दुर्धर्षं वज्रपाणिविसर्जितम् ॥ कृतांतकमिवावार्यं रावणो वीक्ष्य तत्पुरः ॥ ४५ ॥ हुंकृत्य किल जग्राह बाणं वामेन पाणिना ॥ ततस्तं जानुना कृष्य बभंज राक्षसाधिपः ॥ ४६ ॥
इन्द्रके हाथसे छोडे हुए वज्रके समान महादुर्धर्ष कालके समान निवारण करनेके अयोग्य उस बाणको देखकर रावण ॥ ४५ ॥ “हूँ” ऐसा शब्द कर वाम हाथसे वाण ग्रहण कर लेता हुआ, और जंघासे खेंचकर उसको तोड डाला ४६ ।
भग्ने तस्मिञ्छरे रामो विमना इव तस्थिवान् ॥ सहस्रकन्धरः क्रुद्धः क्षुरंप्रगृह्य साय कम् ॥ ४७ ॥ विव्याध रा*घवं वक्षः सर्वप्राणेन राक्षसः ॥ वक्षो निर्भिद्य स शरो रामस्य सुमहात्मनः ॥ ४८ ॥
उस वाणके भग्न होनेसे रामचन्द्र विमन होकर स्थित हुए; तब वह सहस्र-कंधर क्रोध कर तीक्ष्ण वाणको ग्रहण कर ॥ ४७ ॥ सम्पूर्ण बलसे रामचन्द्रकी छातीमें ताडन करता हुआ ॥ ४८ ॥
भित्त्वा महीं च सहसा पाताल तलमाविशत् ॥ ततो रामो महाबाहुः पपात पुष्पकोपरि ॥ ४९ ॥ निःसंज्ञो निश्चलश्चासीद्धाहा भूतानि चक्रिरे ॥ प्राकम्पत मही सर्वा सपर्वतवनाब्धिका ॥ ऋषयः कांदिशीकास्ते हा राम इति वादिनः ॥ ५० ॥
वह बाण रामचंद्रकी छातीको भेदन कर पृथिवी फाडकर पातालमें प्रवेश कर गया; तब महाबाहु राम मूर्च्छित हो पुष्पकमें गिरे ॥ ४९ ॥ निश्चल और अचेतन हो गये, सब प्राणी हाहाकार करने लगे, सब पर्वत और वनोंके सहित पृथिवी कंपित हो गई और हा राम ! इस प्रकारके शब्द ऋषिजन करने लगे ५०
दशशतवदनो जितारिरुग्रोरणशिरसि प्रननर्त सानुयात्रः ॥ गगन-तलगता निपतुरुल्काः प्रलयमिवापि च मेनिरे जनौघाः ॥ ५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तर कांडे रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥
शत्रुका जीतनेवाला सहस्रमुखी रावण रणमें नृत्य करने लगा आकाशसे उल्कापात होने लगीं, सब प्राणियोंने जाना अब प्रलय हो जायगी ॥ ५१ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसादमिश्रकृत रामस्वप्नायितं नाम द्वाविंशतितमः सर्गः ॥ २२ ॥
* रावणं राघवसम्बन्धि ।