भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 128, कुल 173 में से

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पृष्ठ 128

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२१)

त्रयोविंशति सर्ग

जानकीद्वारा सहस्रमुखी रावणका वध

रामं तथाविधं दृष्ट्वा मुनयो भयविह्वलाः ।। हाहाकारं प्रकुर्वन्तः शांतिं जेपुश्च केचन ।। १ ।। तदा तु मुनिभिर्दृष्टा सीता प्रहसितानना ।। वसिष्ठप्रमुखाः सर्वे सीतां प्रोचुर्महर्षयः ।। २ ।।

रामचन्द्रको इस प्रकारका देख मुनि भयसे व्याकुल हो गये और कोई हाहाकार कर शान्तिपाठ करने लगे ।। १ ।। उस समय जानकीको हास्यमुख देखकर वसिष्ठ आदि ऋषि जानकीसे कहने लगे ।। २ ।।

सीते कथं श्रावितोऽयं रावणं राघव स्त्वया ।। समुत्पन्नो विपाकोऽयं घोरो जनकनंदिनि ।। ३ ।। क्व गता भ्रातरः सर्वे क्व गता वानरर्षभाः ।। मंत्रिणः क्व गता भद्रे रामस्य किमुपस्थितम् ।। ४ ।।

हे जानकी ! क्यों इस रावणकी वार्ता रामचन्द्रको सुनाई, इसीका घोर-फल रघुनन्दनको उपस्थित हुआ है ।। ३ ।। सब भाई और वानर जाने कहां गये, हे भद्रे ! सब मंत्री कहां गये, रघुनाथजीको यह क्या व्यसन उपस्थित हुआ है ।। ४ ।।

श्रुत्वैतद्वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।। रामं तथाविधं दृष्ट्वा शयानं पुष्पकोपरि ।। ५ ।। पुंडरीकनिभे नेत्रे निमील्य रणमूर्द्धनि ।। आलिंग्य चोरसा सुप्तं प्रियामिव धनुः शरम् ।। ६ ।। नर्दन्तं राक्षसं चापि महाबलपराक्रमम् ।। साट्टहासं विनद्योच्चैः सीता जनकनंदिनी ।। ७ ।। स्वरूपं प्रजहौ देवी महाविकटरूपिणी ।। क्षुत्क्षामाच कोटराक्षी चक्रभ्रमितलोचना ।। ८ ।।

उन मुनियोंके इस प्रकारके वचन श्रवण कर और रामचन्द्रको पुष्पकपर मूच्छित देखकर ।। ५ ।। धनुष शर लिये मूच्छित रामको आलिंगन कर कमलकेसे नेत्रोंको रणस्थलमें मीचकर ।। ६ ।। महाबली पराक्रमी राक्षसको शब्द करता देखकर जनकनंदिनी सीता ऊँचे स्वरसे अट्टहास करके ।। ७ ।। वह महाविकट रूपवाली होकर अपना पूर्वरूप त्यागन करती हुई भूखसे व्याकुल कोटराक्षी चक्रके समान भ्रमित लोचन ।। ८ ।।