अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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पार्श्वभागसे इधर उधरके राक्षसोंको प्रहार करने लगी, किन्हींको शरीरकी पवनोंसे नष्ट करती हुई ॥ १७ ॥ वह राक्षसोंको भयदायक प्रलय करने लगी, किसीको अट्टहास कर पृष्ठभागसे दो टुकडे करती हुई ॥ १८ ॥
कांश्चित्केशांन्समाकृष्य निष्पिपेष महीतले ॥ सारथान्सगजान्सा-
श्वान्सगदासहतोमरान् ॥ १९ ॥ कांश्चिद्योधान्समाकृष्य मज्जया-
मास वारिधौ ॥ गले चोद्वेष्ट्य केषांचित्प्राणाञ्जग्राह जानकी ॥२०॥
किन्हींके केश पकडकर पीस डालती हुई रथ हाथी घोडे तोमरोंसहित ॥ १९ ॥ खैंचकर किसीको सागरमें डुबाती हुई, किसीका गला घोटकर जानकीने प्राण हरण कर लिये ॥ २० ॥
केषांचित्स्कंध आरुह्य शिरांस्युत्पाटितानि हि ॥ हुंकारेणाट्टहासेन
कांश्चित्प्राणानहापयत् ॥ २१.॥ कांश्चित्प्रचूर्ण्य वदनं पशुमारम-
मारयत् ॥ तान्सर्वान्निमिषेणैव निहत्य जनकात्मजा ॥ २२ ॥
किन्हींके कंधेपर कूदकर शिर तोड़ती हुई, किन्हींके प्राण अट्टहास और हुंकारसे हरण कर लिये ॥ २१ ॥ किन्हींके वदनको चूर्ण कर पशुओंके समान मार डाला. इस प्रकार एक निमेषमात्रमें जानकी उन सबको मारकर ॥ २२ ॥
तेषामंत्रेण शिरसां मालाभिः कृतभूषणा ॥ रावणस्य शिरांस्यु-
ग्राण्यादाय रणमूर्द्धनि ॥ २३ ॥ कंदुकक्रीडनं कर्तुं मनश्चक्रे मन-
स्विनी ॥ एतस्मिन्नंतरे तस्यां रोमकूपेभ्य उद्गताः ॥ २४ ॥
उनके शिरोंकी माला बनाकर धारण करती हुई और रणस्थलमें वे रावणके शिर लेकर ॥ २३ ॥ उनसे वह मनस्विनी गेंदका खेल करनेकी इच्छा करने लगी इसी अवसरमें उसके रोमकूपसे निकलकर ॥ २४ ॥
मातरो विकृताकाराः साट्टहासाः समाययुः ॥ सह कंदुकलीलार्थं
सीतया ताः सहस्रशः २५ ॥ तासां कासांचिदाख्यास्ये नामानि
शृणुसुव्रत ॥ याभिर्व्याप्तास्त्रयो लोकाः कल्याणीभिश्चराचराः । २६
विकृत आकारवाली माताएँ हँसती हुई प्राप्त हुईं, वह सहस्रों कंदुक क्रीडामें जानकीको सहायता देने लगीं ॥ २५ ॥ हे सुव्रत उनमें किन्हींके नाम मैं कहता हूं, जिन कल्याणियोंसे त्रिलोकी व्याप्त रही है ॥ २६ ॥