भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

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(१२८) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति

डरसे देवताओंके विमान आकाशसे गिरने लगे, सूर्यके घोडे मार्ग त्यागने लगे ॥ ६५ ॥ जब पृथ्वी जानकीका भार सहनेको समर्थ न हुई और सीताके चरणग्रसे पीडित हो पातालमें जाने लगी ॥ ६६ ॥

अट्टहासेन सीताया मातृणां हुंकृतेन च ।। प्रलयं मेनिरे लोकाः किमेतदिति विह्वलाः ॥६७॥ धरापातालगमनं वितर्क्य सुरसत्तमैः ।। संप्रार्थितो महादेवः स्वयमायाद्रणाजिरम् ॥ ६८ ॥

सीताके अट्टहास और मातृकाओंके हुंकारसे यह क्या हुआ इस प्रकार कहते लोक प्रलय मानने लगे ॥ ६७ ॥ देवता धराको पातालमें जाता देख महादेवसे प्रार्थना करने लगे, तब वे संग्रामस्थलमें आये ॥ ६८ ॥

जानक्याः पादविन्यासे शवरूपधरो हरः ।। आत्मानं स्तंभयामास धरणीधृतिहेतवे ॥ ६९ ॥ सर्वभारसहो देवः सीतापादतले स्थितः शवरूपो विरूपाक्षः स्थिताभूद्धरातदा ॥ ७० ॥

तब शवके समान रूप धारण कर शिव पृथ्वी थामनेको जानकीके नीचे स्थित हुए, और अपनेको स्थित किया ॥ ६९ ॥ सीताके पगतलमें स्थित हो देव सम्पूर्ण भार सहन करने लगे तब शवरूपधारी पृथ्वी स्तंभित हुई ॥ ७० ॥

तथाप्युपरिगा लोका न स्थातुं सेहिरे क्षणम् ।। सीतायाः पादशब्देन शिरसा हुंकृतेन च ।। निःश्वासवातसंघातैर्दुःस्थिता भूर्भुवादयः। ७१। धरणीतनयया यद्धीमनृत्यं धरण्यां कृतमिह मनसा तंर्त्तिचतयंतो द्विजेन्द्राः ।। जयति जयति सीतेत्याहुरिंद्रादिदेवाः सपदि भुवन भंगं मन्यमाना विषेदु ॥ ७२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदि. अद्भु. भाषाटीकायां सहस्रवदन-रावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ।। २३ ।।

परन्तु ऊपरके लोक उस समय भी स्थित न हो सके, सीताके चरणशब्द और शिरके हुंकारसे तथा निश्वासकी पवनसे भूर्भवः स्व आदि लोक अस्वस्थ हो गये ॥ ७१ ॥ धरणीतनयाने जो भयंकर नृत्य पृथ्वीपर किया, उसके मनमें विचार करते द्विजेन्द्र इन्द्रादिक देवता जय जय करने लगे और संसार भंग होगा ऐसा मानने लगे ॥ ७२ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां सहस्रवदनरावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ॥ २३ ॥