भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 136

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१२९)

चतुर्विंशति सर्ग

देवतोंका रामको आश्वासन करना

संरंभवेगं सीताया वीक्ष्य ब्रह्मपुरो गमाः ॥ सलोकपालास्त्रिदशा ऋषिभिः पितृभिः सह ॥ १ ॥
प्रसादयितुमुद्युक्ताः सीतां ते तुष्टुवुः सुराः ॥ कृताञ्जलिपुटा देवाः प्रणम्य च पुनः पुनः ॥ २ ॥

तब सीताका इस प्रकार वेग और क्रोध देखकर लोकपाल देवता और पितर तथा ब्रह्माजी ॥ १ ॥ वे सीताके प्रसन्न करनेको युक्त हो उन्हें सन्तुष्ट करने लगे, देवता हाथ जोड वारवार प्रणाम कर ॥ २ ॥

ब्रह्माद्याः स्तोतुमारब्धाः सीतां राक्षसनाशिनीम् ॥ या सा माहेश्वरी शक्तिर्ज्ञानरूपायिलालसा ॥ ३ ॥
अनन्या निष्कले तत्त्वे संस्थिता रामवल्लभा ॥ स्वाभाविकी च त्वन्मूला प्रभा भानोस्तथामला ॥ ४ ॥

राक्षसनाशिनी जानकीकी ब्रह्मादिदेवता स्तुति करने लगे, जो यह माहेश्वरी शक्ति ज्ञानरूपा अतिलालसायुक्त है ॥ ३ ॥ यह रामवल्लभा अनन्य और निष्फल तत्त्वमें स्थित है. वह स्वाभाविकी शक्ति आपहीसे होती है, जैसे सूर्यकी कांति निर्मल होती है ॥ ४ ॥

एका सा वैष्णवी शक्ति रणे कोपाधिवेगतः ॥ परापरेण रूपेण क्रीडन्ती रामसन्निधौ ॥ ५ ॥
सेव्यं करोति सकलं तस्याः कार्यमिदं जगत् ॥ न कार्यं चापि करणमीश्वरस्येति निश्चयः ॥ ६ ॥

वह एकही वैष्णवी शक्ति रणमें बडे वेगसे और क्रोधसे परापररूप किये रामके निकट क्रीडा करती है ॥ ५ ॥ यही सब जगत् करके अपना कार्य करके विहरती है कि, ईश्वरको कार्य करनेकी आवश्यकता नहीं है ॥ ६ ॥

चतस्रः शक्तयो देव्याः स्वरूपत्वेन संस्थिताः ॥ अधिष्ठान वशादस्या जानक्या रामयोषितः ॥ ७ ॥
शांतिर्विद्या प्रतिष्ठा च निवृत्तिश्चेति ताः स्मृताः ॥ चतुर्व्यूहस्ततो देवः प्रोच्यते परमेश्वरः ॥ ८ ॥

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 136, कुल 173 में से · BharatKosha