भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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( १३० ) \qquad अद्भुतरामायण \qquad [ चतुर्विंशति

देवीकी चार शक्ति स्वरूपसे स्थित हैं अधिष्ठानके वशसे जानकी रामकी स्त्री हैं ॥ ७ ॥ शांति विद्या प्रतिष्ठा और निवृत्ति यह परमेश्वर देव चतुर्व्यूह रूपसे कहा जाता है ॥ ८ ॥

अनया परया देवः स्वात्मानंदं समश्नुते ॥ यत्त्वस्त्यनादिसंसिद्धमैश्वर्यमतुलं महत् ॥ ९ ॥ त्वत्संबन्धादवाप्तं तद्रामेण परमात्मना ॥ सैषा सर्वेश्वरी देवी सर्वभूतप्रवर्तिका ॥ १० ॥

इसी पराशक्तिसे देवका स्वात्मानन्द जाना जाता है, जो अनादिसंसिद्ध अतुल महत् ऐश्वर्य है ॥ ९ ॥ वही परमात्मा रामद्वारा तुम्हारे सम्बन्धसे प्राप्त किया जाता है, यह सर्वेश्वरी देवी सब भूतोंकी प्रवर्त्त करनेवाली है १०

त्वयेदं भ्रामयेदीशो मायावी पुरुषोत्तमः ॥ सैषा मायात्मिका शक्तिः सर्वाकारा सनातनी ॥ ११ ॥ वैश्वरूपं महेशस्य सर्वदा संप्रकाशयेत् ॥ अन्याश्च शक्तयो मुख्यास्त्वया देवि विनिर्मिता ॥ १२ ॥

तुमसेही यह मायावी पुरुषोत्तम भ्रमण कराये जाते हैं यह मायात्मिका शक्ति सर्वाकारा सनातनी है ॥ ११ ॥ यह महेश्वरका विश्वरूप सदा प्रकाशित करती है. हे देवि ! और भी मुख्य शक्ति तुमनेही निर्माण की है ॥ १२ ॥

ज्ञानशक्तिः क्रियाशक्तिः प्राणशक्तिरिति त्रयम् ॥ सर्वासामेव शक्तीनां शक्तिमन्तो विनिर्मिता ॥ १३ ॥ एका शक्तिः शिवोप्येकः शक्तिमानुच्यते शिवः ॥ अभेदं चानुपश्यंति योगिनस्तत्त्वदर्शिनः १४

ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति, प्राणशक्ति यह सम्पूर्णशक्ति और उनके शक्तिमान् निर्माण किये हैं ॥ १३ ॥ वास्तविक एकही शक्ति और एकही शक्तिमान शिव हैं, तत्त्वदर्शी योगी इनमें भेद नहीं मानते हैं ॥ १४ ॥

शक्तयो जानकी देवी शक्तिमन्तो हि राघवः ॥ विशेषः कथ्यते चायं पुराणे तत्त्ववादिभिः ॥ १५ ॥ भोग्या विश्वेश्वरी देवी रघूत्तमपतिव्रता ॥ प्रोच्यते भगवान्भोक्ता रघुवंशविवर्द्धनः ॥ १६ ॥

संपूर्ण शक्तियोंका स्वरूप जानकी देवी, शक्तिमान् राम हैं. तत्त्ववादियोंने पुराणोंमें यह विशेषतासे कहा है ॥ १५ ॥ रघुराजकी पतिव्रता देवी योग्या है, और रघुवंशविवर्द्धन भगवान् भोक्ता कहलाते हैं ॥ १६ ॥

मंता रामो मतिः सीता मन्तव्या च विचारतः ॥ एकं सर्वगतं सूक्ष्मं कूटस्थ मचलं ध्रुवम् ॥ १७ ॥ योगिनस्तत्प्रपश्यंति तव देव्याः परं पदम् ॥ अनंतमजरं ब्रह्म केवलं निष्कलं परम् ॥ १८ ॥

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