अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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मन्ता राम हैं और मति सीता है इनको विना विचारे मानना उचित है एकही सर्वगत सूक्ष्म अचल और ध्रुव हैं ।। १७ ।। योगी उसको देखते हैं वही देवीका परमपद है वह अनन्त अजर ब्रह्म केवल निष्कल और परे है ।। १८ ।।
योगिनस्तत्प्रपश्यन्ति तव देव्याः परं पदम् ।। सा त्वं धात्रीव परमा यानन्दनिधिमिच्छताम् ।। १९ ।। संसारतापानखिलान्हरसीश्वर-संश्रयात् ।। नेदानीं भूतसंहारस्त्वया कार्यो महेश्वरि ।। २० ।।
हे देवि ! आपके उस पदको योगी देखते हैं वह तुमही परमधात्री हो आनंदसागरकी इच्छा करनेवालोंको ।। १९ ।। ईश्वरके संश्रयसे संसारके संपूर्ण तापोंको दूर करती हो. हे महेश्वरि ! इस समय तुमको प्राणियोंका संहार न करना चाहिये ।। २० ।।
रावणो सगणं हत्वा जगतां सुखमाहितम् ।। किं पुनर्नृत्यकलया जगत्संह्रियते त्वया ।। २१ ।। एतच्छ्रुत्वाविशालाक्षी ब्रह्मणोऽभ्यर्थनं वचः ।। प्रीता सीता तदा प्राह ब्रह्माणं सहदैवतम् ।। २२ ।।
गणसहित रावणको मारकर जगत्को सुखी किया है फिर अब नृत्यके व्याजसे सब जगत्का संहार क्यों करती हो ।। २१ ।। वह विशाला श्रीब्रह्माजी-की यह प्रार्थना सुनकर प्रसन्न हो ब्रह्मादि देवतोंसे कहने लगी ।। २२ ।।
पतिर्मे पुंडरीकाक्षः पुष्पकोपरि राघवः ।। विद्धः क्षुरप्रेण हृदि शेते मृतकवत्प्रभुः ।। २३ ।। तस्मिन्नेव स्थिते देवाः किमिच्छामि जगद्धितम् ।। ग्रासमेकं करिष्यामि जगदेतच्चराचरम् ।। २४ ।।
हमारे पति कमललोचन राम पुष्पकविमान पर तीक्ष्ण बाणसे विद्ध हुए मृतकके समान सोते हैं ।। २३ ।। हे देवताओ ! उनके ऐसे होनेमें जगत्के हितकी किस प्रकार इच्छा कर सकती हूं, इस चराचर जगत्का एकही ग्रास कर जाऊंगी ।। २४ ।।
श्रुत्वैतद्वचनं देव्याः संरंभसहित सुराः ।। हाहाकारं प्रचक्रुस्ते संचचाल च मेदिनी ।। २५ ।। ततो ब्रह्मा सुरैः सार्द्धं पुष्पकं रथमा-स्थितम् ।। श्रीरामं ग्राहयामास स्मृतिं स्पृष्ट्वा स्वपाणिना ।। २६ ।।
संरम्भसहित देवता देवीके यह वचन सुनकर हाहाकार करने लगे, और पृथ्वी चलायमान होगई ।। २५ ।। तब ब्रह्माजीने देवताओंसहित पुष्पकमें स्थित श्रीरामको हाथसे स्पर्श कर स्मृति दिवाई ।। २६ ।।