भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

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(१३२) अद्भुतरामायण [चतुर्विंशति-

उत्तस्थौ च महाबाहू रामः कमललोचनः ॥ रे रावण सुदुष्ट- स्त्वमद्य मद्बाणभेदितः ॥ २७ ॥ द्रक्ष्यस्याशु यमस्यास्यं भ्रुकुटी- भीषणाकृति ॥ ब्रुवन्नेवं धनुर्गृह्य ह्यपश्यन्त्रिदशान्पुरः ॥ २८ ॥

तब तत्काल महाबाहु राम उठ बैठे, और बोले अरे रावण ! तू आज मेरे बाणसे भेदित होकर ॥ २७ ॥ अवश्य भयंकर भौंवाले यमराजका मुख देखेगा, जब यह कहकर धनुष ग्रहण किया तब देवताओंको अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २८ ॥

नापश्यज्जानकीं तत्र प्राणेभ्योपि गरीयसीम् ॥ नृत्यतीं चापरां कालीमपश्यच्च रणांगणे ॥ २९ ॥ चतुर्भुजां चलज्जिह्वां खङ्गखर्पर- धारिणीम् ॥ शवरूपमहादेवहृत्संस्थां च दिगंबराम् ॥ ३० ॥

परन्तु प्राणप्यारी जानकीको वहां नहीं देखा युद्धस्थलमें नृत्य करती हुई महाकालीको देखा ॥ २९ ॥ और स्थितिके निमित्त शवरूपधारी महा-देवको देखा चार भुजा चलजिह्वा खड्गखर्परधारिणी जानकीको देखा ॥ ३० ॥

पिबन्तीं रुधिरं भीमां कोटराक्षीं क्षुधातुराम् ॥ जगद्ग्रासे कृतो- त्साहां मुण्डमालाविभूषणाम् ॥ ३१ ॥ भीमाकाराभिरन्याभिः क्रीडंतीं रणमूर्द्धनि ॥ मुण्डै राक्षसरांजस्य खेलंतीं कंदुकं मुदा ॥ ३२ ॥

वह कोटराक्षी महाभयंकर खङ्ग खर्पर धीरण किये दिगम्बर जगत्के ग्रासमें उत्साह करती मुण्डमालाके गहना पहरे ॥ ३१ ॥ और दूसरी भयंकर कन्दुक मूर्ति धारण किये हुए मृतकाओंके साथ रणभूमिमें क्रीडा करते देखा, और राक्षसराजके शिरके संग कन्दुक क्रीडा करते देखा ॥ ३२ ॥

प्रलयध्वांतधाराभां सदा घर्घरनादिनीम् ॥ अन्त्रमुण्डकरोटचक्ष- कृतमालां चलत्पदाम् ॥ ३३ ॥ कबन्धान्राक्षसानां च तया सह विनृ- त्यतः ॥ रथवाजिगजानां च शकलानि व्यलोकयत्यय् ॥ ३४ ॥

प्रलयकालके अन्धकारके समान सदा घर्घर शब्द करनेवाली आँते शिर हाथ नेत्रोंकी माला बनाये पद चलाती ॥ ३३ ॥ मृतक राक्षसोंके कबन्धोंके साथ नृत्य करती, रथ घोडे हाथियोंको टुकडोंको देखती हुई ॥ ३४ ॥

नैकोपि राक्षसो यत्र करपादशिरोयुतः ॥ कबन्धा ये च नृत्यंति तेषां पादाः प्रतिष्ठिताः ॥ ३५॥ कबन्धं रावणस्यापि नृत्यन्तं च व्यलोक- यत् ॥ तद्दृष्ट्वा मुमहाघोरं प्रेतराजपुरोपमम् ॥ ३६ ॥