अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 140, कुल 173 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३३ )
कोई भी राक्षस हाथ पैर शिरसे युक्त नहीं था, जो कबन्ध नृत्य करते थे केवल उन्हींके चरण स्थित थे ॥ ३५ ॥ रावणका कबन्धभी नृत्य करते देखा वह स्थान महाघोर प्रेतराजके पुरके समान देखकर ॥ ३६ ॥
कालीं च वीक्ष्य नृत्यंतीं मातृभिः सहितां द्विज । पपात हस्ताद्रामस्य वेपताः सशरं धनुः ॥ ३७ ॥ भयाच्च निमिमीलाशुः रामः पद्मविलोचने ॥ इत्येवं विस्मितं दृष्ट्वा ब्रह्मोवाच रघूत्तमम् ॥ ३८ ॥
हे द्विज ! मातृकाओंके सहित महाभयंकर कालीको नृत्य करती देख कम्पित हुए रामके हाथसे धनुष बाण गिरपड़ा ॥ ३७ ॥ और डरसे रामचन्द्रने अपने दोनों कमलकेसे नेत्र मीच लिये. इस प्रकार विस्मित देखकर रामचन्द्रसे ब्रह्माजी कहने लगे ॥ ३८ ॥
त्वां दृष्ट्वा विह्वलं सीता क्रुद्धं चापि च रावणम् ॥ रथादवस्कन्द्य- सती पपात रणमूर्द्धनि ॥ ३९ ॥ भीमां च मूर्त्तिमालम्ब्य रोमकूपाश्च मातृकाः ॥ निर्माय ताभिः सहिता हत्वा रावणमग्रतः ॥ ४० ॥
जानकी आपको विह्वल और रावणको क्रुद्ध देखकर तत्काल युद्धस्थलमें विमानसे कूद पडी ॥ ३९ ॥ और उस भयंकर मूर्त्तिका अवलम्बन कर अपने रोमकूपसे मातृका उत्पन्न कर तनकें सहित क्रीडा कर रावणका वध किया । ४०
रक्षसां निधनं कृत्वा नृत्यंतीयं व्यवस्थिता ॥ अनया सहितो राम सृजस्यवसि हंसि च ॥ ४१ ॥ नानया रहितो राम किंचित्कर्तुमपि क्षमः ॥ इति बोधयितुं सीता चकार तद निंदिता ॥ ४२ ॥
अब यह राक्षसोंका वधकर व्यवस्थित हो नृत्य करती हैं, हे राम ! इनके सहित आप जगत् उत्पन्न कर नष्ट कर देते हैं ॥ ४१ ॥ हे राम ! इनके बिना आप कुछभी नहीं कर सकते हो यही दिखानेको जानकीने यह कार्य किया है ४२
पश्यैतां जानकीं राम त्यज भीतिं महाभुजा ॥ निर्गुणां सगुणां साक्षात्सदसद्यक्तिवर्जिताम् ॥ ४३ ॥ इत्येतद्द्रुहिणवचो निशम्य रामः श्रुतिमुखमात्महितं पराभिमर्दि ॥ शुचमनुविजहौ विचार्य किंचिज्जनकसुतामनुपश्यति स्म पश्चात् ॥ ४४ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे रामा- श्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥
हे राम ! आप इन जानकीको देखिये भय त्यागन कीजिये, यह साक्षात् निर्गुण सत् असत् व्यक्तिसे रहित हैं ॥ ४३ ॥ इस प्रकार ब्रह्माजीके वचन