भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(१३४) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति-

सुनकर रघुनन्दन राम जो कानोंके सुख देनेवाले आत्माको हितकारक शत्रु-नाशक थे रामने शोक त्याग किया पीछे जानकीको देखा ॥ ४४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. अदिका. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषा-टीकायांरामाश्वासनं नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥


पंचविंशति सर्ग

रामचन्द्रका सहस्रनामसे जानकी की स्तुति करना

ब्रह्मणो वचनं श्रुत्वा रामः कमललोचनः । प्रोन्मील्य शनकैरक्ष वेपमानो महाभुजः ॥ १ ॥ प्रणम्य शिरसा भूमौ तेजसा चापि विह्वलः ॥ भीतः कृतांजलिपुटः प्रोवाच परमेश्वरीम् ॥ २ ॥
का त्वं देवि विशालाक्षि शशांका वयवांकिते ॥ न जाने त्वां महादेवि यथावद् ब्रूहि पृच्छते ॥ ३ ॥ रामस्य वचनं श्रुत्वा ततः सा परमेश्वरी ॥ व्याजहार रघुव्याघ्रं योगिनामभयप्रदा ॥ ४ ॥

कमललोचन राम ब्रह्माजीके वचन सुनकर शनैः २ नेत्र खोल कम्पित होते हुए महाभुज ॥ १ ॥ भूमिमें शिर झुकाय प्रणाम कर उनके तेजसे विह्वल हो भीतके समान हाथ जोड परमेश्वरीसे बोले ॥ २ ॥ हे चन्द्रखण्डसे अंकित विशाललोचनी ! तुम कौन हो ? हे महादेवि ! हम तुमको नहीं जानते पूछते हुए अपनेको वर्णन करो ॥ ३ ॥ तब वह परमेश्वरी रामके वचन सुनकर योगियोंको अभय देनेवाली रघुनाथजीसे बोली ॥ ४ ॥

मां विद्धि परमां शक्तिं महेश्वरसमाश्रयाम्।अनन्यामव्ययामेकां यां पश्यन्ति मुमुक्षवः ॥ ५ ॥ अहं वै सर्वभावानामात्मा सर्वांतरा शिवा ॥ शाश्वती सर्वविज्ञाना सर्वमूर्तिप्रवर्तिका ॥ ६ ॥

मुझे महेश्वरके आश्रितवाली परमशक्ति जानों, मैं अनन्य अविनाशी एक हूँ, मुमुक्षुजन मुझको देखते हैं ॥ ५ ॥ मैं सब भावोंकी आत्मा सबके अन्तमें स्थित शिवा हूँ, मैं ही निरन्तर रहनेवाली सब विज्ञान और सब मूर्ति प्रवृत्त करनेवाली हूँ ॥ ६ ॥

अनंतानंतमहिमा संसारार्णवतारिणी ॥ दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे पदमैश्वरम् ॥ ७ ॥ इत्युक्त्वा विररामैषा रामोऽपश्यच्च तत्पदम् ॥ कोटिसूर्यप्रतीकाशं विश्वक्तेजोनिराकुलम् ॥ ८ ॥

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