भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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• सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १३६ )

मैं अनन्त अनन्तमहिमावाली संसारसागरसे तारनेवाली हूँ, तुमको दिव्य-नेत्र देती हूं मेरा ईश्वरसंबन्धी पद देखो ॥ ७ ॥ यह कह वह मौन हुई, और रघुनाथ उनकें पदको देखने लगे, जो करोड सूर्यके समान सब ओरसे परिपूर्ण था ॥ ८ ॥

ज्वालावलीसहस्राढ्यं कालानलशतोपमम् ॥ तदंष्ट्राकरालं दुर्धर्षं जटामण्डलमंडितम् ॥ ९ ॥ त्रिशूलवरहस्तं च घोररूपं भयावहम् ॥ प्रशाम्यत्सौम्यवदनमनंतैश्वर्यसंयुक्तम् ॥ १०॥ चन्द्रावयवलक्ष्माढ्यं चन्द्रकोटिसमप्रभम् ॥ किरीटिनं गदाहस्तं नूपुरैरुपशोभितम् ॥ ११ ॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगंधानुलेपनम् ॥ शंखचक्रकरं काम्यं त्रिनेत्रं कृत्तिवाससम् ॥ १२ ॥

सहस्रों ज्वालासमूहोंसे व्याप्त, कालानल सौके समान दंष्ट्राकरालसे दुर्धर्ष, जटामंडलासे मंडित ॥ ९ ॥ त्रिशूल हाथमें लिये घोर रूप भयावने प्रशांत सौम्यवदन अनन्त ऐश्वर्यसे संयुक्त ॥ १० ॥ चन्द्रके खण्ड और लक्ष्मीसे युक्त करोड चन्द्रमाकेसमान कान्तिमान् किरीट गदा हाथमें लिये, नूपुरोंसे शोभित ॥ ११ ॥ दिव्य माला वस्त्र धारणकिये, दिव्य गंधका अनुलेपन लगाय, शंख चक्र हाथमें लिये, त्रिनेत्र, कृत्ति-वा ॥ १२ ॥

अन्तःस्थं चांडबाह्यस्थं बाह्याभ्यंतरतःपरम् ॥ सर्वशक्तिमयं शांतं सर्वाकारं सनातनम् ॥ १३॥ ब्रह्मेन्द्रोपेंद्रयोगींद्रैरीड्यमानपदांबुजम् ॥ सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोक्षिशिरोमुखम् ॥ १४ ॥

अन्तरमें स्थित तथा अण्डकोशके बाह्यमें स्थित, बाहर भीतरसे परे सर्वशक्तिमान शान्त सर्वाकार सनातन ॥ १३ ॥ ब्रह्मा इन्द्र उपेंद्र योगीन्द्रोंसे प्रार्थित चरण कमल, सब ओरसे चरण नेत्र और शिरवाले ॥ १४ ॥

  • सर्वमावृत्य तिष्ठन्तं ददर्श पदमैश्वरम् ॥ दृष्ट्वा च तादृशं रूपं दिव्यं माहेश्वरं पदम् ॥ १५ ॥ तयैव च समाविष्टः स रामो हृतमानसः ॥ आत्मन्याधाय चात्मानमोंकारं समनुस्मरन् ॥ १६ ॥

सबको आवृत्त कर स्थित होते हुए उस ईश्वरसम्बन्धी पदका दर्शन किया. इस प्रकारका उस दिव्य माहेश्वरके पदको देखकर ॥ १५ ॥ रामचंद्र मनके हरण हो जानेमें उनसे आविष्ट हो हृतमन होकर आत्माको आत्मामें ध्यान कर ॐ कारका स्मरण कर ॥ १६ ॥