भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

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(१५२) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति

इस प्रकार हाथ जोडे प्रसन्नमन रोमांचशरीर हो रघुनन्दनने जानकीको प्रसन्न किया ॥ १५३ ॥ हे भारद्वाज महाभाग ! जो कोई इस अद्भुत स्तोत्रको सुनता है पढता है वा पढाता है वह परमपदको जाता है ॥ १५४ ॥

ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्ब्रह्म प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ शूद्रः सद्गतिमा- प्नोति धनधान्यविभूतयः ॥ १५५ ॥ भवंति स्तोत्रमाहात्म्यादेत- त्स्वस्त्ययनं महत् ॥ मारीभये राजभये तथा चोराग्निजे भये ॥ १५६ ॥

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शाश्वत ब्रह्मको प्राप्त होते हैं और शूद्रको सद्गति तथा धन धान्यकी प्राप्ति होती है ॥ १५५ ॥ इस स्तोत्रके माहात्म्यसे परम मंगल होता है महामारीभय राजभय चोर अग्निका भय ॥ १५६ ॥

व्याधीनां प्रभवे घोरे शत्रूत्थाने च संकटे ॥ अनावृष्टिभये विप्र सर्वशांतिकरं परम् ॥ १५७ ॥ यद्य दिष्टतमंयस्य तत्सर्वंस्तोत्रतो भवेत् ॥ यत्रैतत्पठ्यते सम्यक् सीतानामसहस्रकम् ॥ १५८ ॥

महाघोर व्याधि शत्रुओंके संकटमें अनावृष्टिके भयमें सब प्रकारकी शान्ति होती है ॥ १५७ ॥ जो जो इसको इष्ट हो वह सब इस स्तोत्रके पाठसे हो जाता है यह सीतासहस्रनाम पढा जाता है ॥ १५८ ॥

रामेण सहिता देवी तत्र तिष्ठत्यसंशयम् ॥ महापापातिपापानि- विलयं यांति सुव्रत ॥ १५९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे सीतासहस्रनाम- स्तोत्रकथनं नाम पंचविंशतितमः सर्गः ॥ २५ ॥

वहां रामके सहित देवी स्थित होती है इसमें संदेह नहीं । हे द्विज ! महापाप औय घोरपाप भी इससे छूट जाते हैं ॥ १५९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकायां सीतासहस्रनामस्तोत्रकथनं नाम पंच विंशतितमः सर्गः ॥ २५ ॥