अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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षड्विंशति सर्ग
श्रीरामविजयवर्णन
एवं नामसहस्रेण स्तुत्वाऽसौ रघुनंदनः ॥ भूयः प्रणम्य प्रीतात्मा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥ १ ॥ यदेतदैश्वरं रूपं घोरं ते परमेश्वरि ॥ भीतोऽस्मि सांप्रतं दृष्ट्वा रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ २ ॥
इस प्रकार रघुनन्दन सहस्रनामसे स्तुति करे फिर हाथ जोड प्रणाम कर जानकीसे कहने लगे ॥ १ ॥ हे परमेश्वरी ! जो यह तेरा घोर परमेश्वर सम्बन्धी रूप है इससे मैं भीत हो रहा हूं इस कारण इसे शान्त करे सौम्यरूप दिखाओ ॥ २ ॥
एवमुक्ताथ सा देवी तेन रामेण मैथिली ॥ संहृत्य दर्शयामास स्वं रूपं परमं पुनः ॥ ३ ॥ कांचनांबुरुहप्रख्यं पद्मोत्पलसुगंधिकम् ॥ सुनेत्रं द्विभुजं सौम्यं नीलालकविभूषितम् ॥ ४ ॥
जब रामने मैथिली जानकीसे ऐसा कहा तब जानकीने अपना रूप शान्त कर सौम्यरूप दिखलाया ॥ ३ ॥ जो कञ्चनके कमलके समान पद्मदलके समान, सुगंधिवाला सुन्दर नेत्र दो भुजा, नीली अलकोंसे विभूषित ॥ ४ ॥
रक्तपादांबुजतलं सुरक्तकर पल्लवम् ॥ श्रीमद्विशालसदवृत्तललाटतिलकोज्ज्वलम् ॥५॥ भूषितं चारुसर्वांगं भूषणैरभिशोभितम्॥ दधानं सुरसां मालां विशालां हेमनिर्मिताम् ॥ ६ ॥ ईषस्मितं सुबिम्बोष्ठं नूपुरांबरसंयुक्तम् ॥ प्रसन्नवदनं दिव्यमनन्तमहिमास्पदम् ॥ ७ ॥ तदीदृशं समालोक्य रूपं रघुकुलोत्तमः ॥ भीतिं संत्यज्य हृष्टात्मा बभाषे परमेश्वरीम् ॥ ८ ॥
लाल चरण लाल करपल्लव श्रीमान् विशाल सद्वृत्त ललाटके ऊपर उज्ज्वल तिलक लगाये ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण सुन्दर अंग भूषणोंसे शोभित विशाल सुवर्णनिर्मित सुरमाला धारण किये ॥ ६ ॥ कुछेक हास्ययुक्त बिम्बाफलके समान ओष्ठ, नूपुर और अम्बरसे संयुक्त प्रसन्नमुख दिव्य और अनन्तमहिमाका स्थान ॥ ७ ॥ रघुनाथजी जानकीका इस प्रकारका रूप देखकर भयको त्याग प्रसन्न हो परमेश्वरीसे कहने लगे ॥ ८ ॥