अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५३)
षड्विंशति सर्ग
श्रीरामविजयवर्णन
एवं नामसहस्रेण स्तुत्वाऽसौ रघुनंदनः ॥ भूयः प्रणम्य प्रीतात्मा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥ १ ॥ यदेतदैश्वरं रूपं घोरं ते परमेश्वरि ॥ भीतोऽस्मि सांप्रतं दृष्ट्वा रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ २ ॥
इस प्रकार रघुनन्दन सहस्रनामसे स्तुति करे फिर हाथ जोड प्रणाम कर जानकीसे कहने लगे ॥ १ ॥ हे परमेश्वरी ! जो यह तेरा घोर परमेश्वर सम्बन्धी रूप है इससे मैं भीत हो रहा हूं इस कारण इसे शान्त करे सौम्यरूप दिखाओ ॥ २ ॥
एवमुक्ताथ सा देवी तेन रामेण मैथिली ॥ संहृत्य दर्शयामास स्वं रूपं परमं पुनः ॥ ३ ॥ कांचनांबुरुहप्रख्यं पद्मोत्पलसुगंधिकम् ॥ सुनेत्रं द्विभुजं सौम्यं नीलालकविभूषितम् ॥ ४ ॥
जब रामने मैथिली जानकीसे ऐसा कहा तब जानकीने अपना रूप शान्त कर सौम्यरूप दिखलाया ॥ ३ ॥ जो कञ्चनके कमलके समान पद्मदलके समान, सुगंधिवाला सुन्दर नेत्र दो भुजा, नीली अलकोंसे विभूषित ॥ ४ ॥
रक्तपादांबुजतलं सुरक्तकर पल्लवम् ॥ श्रीमद्विशालसदवृत्तललाटतिलकोज्ज्वलम् ॥५॥ भूषितं चारुसर्वांगं भूषणैरभिशोभितम्॥ दधानं सुरसां मालां विशालां हेमनिर्मिताम् ॥ ६ ॥ ईषस्मितं सुबिम्बोष्ठं नूपुरांबरसंयुक्तम् ॥ प्रसन्नवदनं दिव्यमनन्तमहिमास्पदम् ॥ ७ ॥ तदीदृशं समालोक्य रूपं रघुकुलोत्तमः ॥ भीतिं संत्यज्य हृष्टात्मा बभाषे परमेश्वरीम् ॥ ८ ॥
लाल चरण लाल करपल्लव श्रीमान् विशाल सद्वृत्त ललाटके ऊपर उज्ज्वल तिलक लगाये ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण सुन्दर अंग भूषणोंसे शोभित विशाल सुवर्णनिर्मित सुरमाला धारण किये ॥ ६ ॥ कुछेक हास्ययुक्त बिम्बाफलके समान ओष्ठ, नूपुर और अम्बरसे संयुक्त प्रसन्नमुख दिव्य और अनन्तमहिमाका स्थान ॥ ७ ॥ रघुनाथजी जानकीका इस प्रकारका रूप देखकर भयको त्याग प्रसन्न हो परमेश्वरीसे कहने लगे ॥ ८ ॥
(१५४) अद्भुतरामायण [ षड्विंशति-
अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ॥ यन्मे साक्षात्त्वमक्ता प्रसन्ना दृष्टिगोचरा ॥ ९ ॥ त्वया सृष्टं जगत्सर्वं प्रधानाद्यं त्वयि स्थितम् ॥ त्वय्येव लीयते देवि त्वमेव च परागतिः ॥ १० ॥
आज मेरा जन्म और तप सफल है जो तुम अव्यक्ता साक्षात् मेरी दृष्टिके सन्मुख हुई हो और प्रसन्न हुई हो ॥ ९ ॥ तुमनेही सब जगत् निर्माण किया है और यह प्रधानादि दुतुममें स्थित है. हे देवि ! यह अन्तमें तुममेंही लय हो जाता है, तुमही परागति हो ॥ १० ॥
वदंति केचित्त्वामेव प्रकृतिं विकृतेः परम् ॥ अपरे परमात्मज्ञाः शिवेति शिवसंश्रये ॥ ११ ॥ त्वयि प्रधानं पुरुषो महान्ब्रह्मा तथेश्वरः ॥ अविद्या नियमिर्माया कालाद्याः शतशोऽभवन् ॥ १२ ॥
कोई तुमहीको प्रकृतिसे विकृतिसे परे कहते हैं. परमात्माके जाननेवाले शिवके आश्रयमें शिवा कहते हैं ॥ ११ ॥ तुममें प्रधान पुरुष महान् ब्रह्मा ईश्वर अविद्या नियति माया कालादि सैकड़ों होते हैं ॥ १२ ॥
त्वं हि सा परमा शक्तिरनंता परमेष्ठिनी ॥ सर्वभेदविनिर्मुक्ता सर्वभेदाश्रया निजा ॥ १३ ॥ त्वामधिष्ठाय योगेशि पुरुषः परमेश्वरीम् ॥ प्रधानाद्यं जगत्कृत्स्नं करोति विकरोति च ॥ १४ ॥
तुम अनन्त परमेष्ठिनी परमशक्ति हो सब भेदोंसे निर्मुक्त सब भेदोंके आश्रयवाली निजस्वरूप ॥ १३ ॥ हो हे योगेशि ! तुम परमेश्वरको प्राप्त होकर पुरुष प्रधानादि सब जगत्को निर्माण कर फिर संहार करती है ॥ १४ ॥
त्वयैव संगतो देवः स्वमानंदं समश्नुते ॥ त्वमेव परमानन्दस्त्वमेवानन्ददायिनी ॥ १५ ॥ त्वमेव परमं व्योम महाज्योतिर्निरंजनम् ॥ शिवं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ १६ ॥ त्वं शक्रः सर्व-देवानां ब्रह्मा ब्रह्मविदामपि ॥ सांख्यानां कपिलो देवो रुद्राणामसि शंकरः ॥ १७ ॥ आदित्यानामुपेंद्रस्त्व वसूनां चैव पावकः ॥ वेदानां सामवेदस्त्वं गायत्री छन्दसामपि ॥ १८ ॥
तुम्हारी संगतिसे अपने देव अपने आनन्दको प्राप्त होता है, तुमही परमानंद और आनंदकी देनेवाली हो ॥ १५ ॥ तूही । परमाकाश महाज्योति निरञ्जन है, शिव सर्वगत सूक्ष्म परब्रह्म सनातन है ॥ १६ ॥ तुम
१ स्वके नित्ये निजं त्रिष्वित्यमराञ्चित्या ।
सर्ग ], हिन्दीटीकासहित (१५५)
सर्ग ], हिन्दीटीकासहित (१५५)
सब देवताओंके इद्र, ब्रह्मज्ञानियोंके ब्रह्मा हो, सांख्योंमें कपिलदेव, रुद्रोंमें शंकर हो ।। १७ ।। आदित्योंमें उपेन्द्र और वसुओंमें पावक हो, वेदोंमें सामवेद और छंदोंमें गायत्री हो ।। १८ ।।
अध्यात्मविद्या विद्यानां गीतानां परमा गतिः ।। माया त्वं सर्वशक्तीनां कालः कलयतामपि ।। १९ ।। ॐकार सर्वगुह्यानां वर्णानां च द्विजोत्तमः ।। आश्रमाणां गृहस्थस्त्वमीश्वराणां महेश्वरः ।। २० ।।
विद्यामें अध्यात्मविद्या गतियोंमें परमगति सर्वशक्तियोंकी माया और कलित करनेवालोंमें काल तुम हो ।। १९ ।। सम्पूर्ण गुह्योंमें ॐकार तुम हो, वर्णोंमें ब्राह्मण, आश्रमोंमें, गृहस्थ, और ईश्वरोंमें महेश्वर तुम हो ।। २० ।।
पुंसां त्वमेव पुरुषः सर्वभूत हृदि स्थितः ।। सर्वोपनिषदां देवि गुह्योपनिषदुच्यसे ।। २१ ।। ईशानं चासि भूपानां युगानां कृतमेव च ।। आदित्यः सर्वमार्गाणां वाचां देवि सरस्वती ।। २२ ।।
पुरुषोंमें पुरुष सब भूतोंके हृदयमें तुम स्थित हो हे देवि ! सम्पूर्ण उपनिषदोंमें गुप्त उपनिषद् तुम हो ।। २१ ।। राजोंमें ईशता, और युगमें सतयुग तुम हो, अर्चिरादि सब मार्गोंमें आदित्य, वाणियोंमें सरस्वती देवी तुम हो ।। २२ ।।
त्वं लक्ष्मीश्चारुरूपाणां विष्णुर्मायाविनामपि ।। अरुंधती सतीनां त्वं सुपर्णः पततामसि ।। २३ ।। सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठं साम च सामसु ।। सावित्री ह्यसि जप्यनां यजुषां शतरुद्रियम् ।। २४ ।।
सुन्दर रूपवालोंमें लक्ष्मी मायावियोंमें विष्णु, सतियोंमें अरुन्धती, पक्षियोंमें गरुड तुम हो ।। २३ ।। वेदके सूक्तोंमें पुरुषसूक्त साममें ज्येष्ठ साम, जपोंमें सावित्री, और यजुओंमें शतरुद्रिय तुम हो ।। २४ ।।
पर्वतानां महामेरुरनन्तो भागिनामसि ।। सर्वेषां त्वं परंब्रह्म त्वन्मयं सर्वमेवहि ।। २५ ।। रूपं तवाशेषकलाविहीनमगोचरं निर्मलमेकरूपम् ।। अनादिमध्यान्तमनन्तमाद्यं नमामि सत्यं तमसः परस्तात् ।। २६ ।।
१ अर्चिरादिमार्गाणाम् ।
१ कलाः कलनानि परिच्छेदा इति यावत् । कल संख्याने । यावत्परिच्छेदशून्यमपरिच्छिन्नमिति यावत् ।
(१५६) अद्भुतरामायण [षड्विंशति
पर्वतोंमें मेरु भोगियों (सर्पों) में अनन्त, सबके परब्रह्म तुम हो यह सब तुममें हैं ॥ २५ ॥ तुम्हारा रूप सब कालसे विहीन अगोचर निर्मल एक है, आदि अन्त मध्यरहित अनन्त तुमसे परे, सबकी आदि तुमको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २६ ॥
यदेव पश्यंति जगत्प्रसूतिं वेदांतविज्ञानविनिश्चतार्थाः ॥ आनन्द- मात्रं परमाविधान तदेव रूपं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ २७ ॥ अशेष- सूत्रांतरसन्निविष्टं प्रधानसंयोगवियोगहेतुः ॥ तेजोमयं जन्मविना- शहीनं प्राणाभिधानं प्रणतोऽस्मि रूपम् ॥ २८ ॥
जो वेदान्तके विज्ञानसे निश्चित अर्थवाले होकर इस जगत्की प्रसूति तुमको जब देखते हैं, आनन्द मय परम तुम्हारे रूपको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ सम्पूर्णके सूत्रांतरमें सन्निविष्ट प्रधानसंयोगवियोगके हेतु तेजोमय जन्मविनाशसे हीन प्राणरूप तुमको मैं नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २८ ॥
आद्यंतहीनं जगदात्मरूपं विभिन्नसंस्थं प्रकृतेः परस्तात् ॥ कूट- स्थमव्यक्तवपुस्तवैव नमामि रूपं पुरुषाभिधानम् ॥ २९ ॥ सर्वाश्रयं सर्वजगन्निधानं सर्वत्रगं जन्मविनाशहीनम् ॥ नतोऽस्मि ते रूपमणु- प्रभेदमाद्यं महत्त्वे पुरुषानुरूपम् ॥ ३० ॥
आदि अन्तमें हीन. जगत्के आत्मरूप विभिन्नसंस्थावान्, प्रकृतिसे परे, कूटस्थ अव्यक्त शरीर पुरुषरूप तुमको नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २९ ॥ सबके आश्रय, सर्व जगत्के निधान, सब स्थानमें जानेवाले जन्मविनाशसे रहित, अणुप्रभेद आद्य महत्त्व पुरुष अनुरूप तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३० ॥
प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजमैश्वर्यविज्ञानविरागधर्मैः ॥ समन्वितं देवि नतोऽस्मि रूपं द्विसप्तलोकात्मकमंबुसंस्थम् ॥ ३१ ॥ विचित्र- भेदं पुरुषैकनाथमनंत भूतैर्विनिवासितं ते ॥ नतोऽस्मि रूपं जगदंड- संज्ञमशेषवेदात्मकमेकमाद्यम् ॥ ३२ ॥ स्वतेजसा पूरितलोकभेदं नमामि रूपं रविमंडलस्थम् ॥ सहस्रमूर्द्धानमनंतशक्तिं सहस्रबाहुं पुरुषं पुराणम् ॥ शयानमंतः सलिले तवैव नारायणाख्यं प्रणतोऽस्मि रूपम् ॥ ३३ ॥ दंष्ट्राकरालं त्रिदशाभिवंद्यं युगांतकालानलकल्प- रूपम् ॥ अशेषभूतांडविनाश हेतुं नमामि रूपं नव कालसंज्ञम् ॥ ३४ ॥
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५७)
प्रकृतिकी अवस्थावाला, त्रिगुणात्मबीज ऐश्वर्य विज्ञान विराग धर्मोंसे युक्त, चौदह लोकात्मक, जलमें स्थित, आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३१ ॥ विचित्रभेद पुरुष एकनाथ अनन्त भूतोंसे निवासित जगतके अंडसंज्ञक अशेष वेद आद्य तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३२ ॥ अपने तेजसे लोकको भेद पूर्ण रविमंडलमें स्थित तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं सहस्रमूर्धावाले अनन्तशक्ति सहस्रबाहु पुराणपुरुष जलके भीतर शयन करनेवाले नारायणाय आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३३ ॥ कराल डाढोंवाले देवताओंसे नमस्कृत युगान्तकालानलके समान प्रकाशित सम्पूर्ण भूतअण्डके विनाशकारण कालसंज्ञके तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३४ ॥
फणासहस्रेण विराजमानं भुवस्तलेऽधिष्ठितमप्रमेयम् ॥ अशेष-
भारोद्वहने समर्थं नमामि ते रूपनंतसंज्ञम् ॥ ३५ ॥ अव्याहतैश्वर्यम
युग्मनेत्रं ब्रह्मात्मतानं दरसंज्ञमेकम् ॥ युगांतशेषं दिवि नृत्यमानं
न तोऽस्मि रूपं तव रुद्रसंज्ञम् ॥ ३६ ॥
सहस्रफणोंसे विराजमान पृथ्वीतलमें स्थित अप्रमेय सम्पूर्ण भारके उद्वहन करनेमें समर्थ अनन्तसंज्ञक अव्यौतहतैश्वर्य नेत्रद्वयवाले ब्रह्मानंदमें स्थित स्वर्गमें नाचनेवाले ऐसे तुम्हारे रुद्र रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
प्रहीणशोकं विमलं पवित्रं सुरा सुरैरर्चितपादयुग्मम् ॥ सुकोमलं
देवि विशालशुभ्रं नमामि ते रूपमिदं नमामि ॥ ३७ ॥ एतावदुक्त्वा
वचनं रघुराजकुलोद्वहः ॥ संप्रेक्षमाणो वैदेहीं प्रांजलिः पार्श्वतोऽ
भवत् ॥ ३८ ॥
शोकरहित विमल पवित्र सुर असुरोंसे अर्चित चरणकमल कोमल विशाल शुभ्र इस तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३७ ॥ राजा रघुकुलनंदन राम हाथ जोडे यह वचन कहते देवीके पार्श्वभागमें स्थित हुए ॥ ३८ ॥
अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतीपतेः ॥ सस्मितं प्राह
भर्त्तारं शृणुष्वैकं वचो मम ॥ ३९ ॥ गृहीतं यन्मया रूपं रावणस्य
वधाय हि ॥ तेन रूपेण राजेंद्र वसामि मानसोत्तरे ॥ ४० ॥
तब जानकी जगत्पतिके वचन श्रवण करके हँसती हुई स्वामीसे बोली हमारा आप एक वचन सुनिये ॥ ३९ ॥ जो मैंने रावणके वधके निमित्त यह रूप धारण किया है इस रूपसे मैं मानसेके उत्तरभागमें निवास करूंगी ॥ ४० ॥
(१५८) अद्भुतरामायण [ षड्विंशति-
प्रकृत्या नीलरूपस्त्वं लोहितो रावणार्र्दितः ।। नीललोहितरूपेण त्वया सहवसाम्यहम् ।। ४१ ।। गृहाण च वरं राम सखो यदभिकां- क्षितम् ।। तच्छ्रुत्वा राघवो वीरः प्रतिश्रुत्य गिरौ स्थितिम् ।। ४२ ।।
हे राम तुम प्रकृतिसे नीलरूप हो रावणसे अर्दित होनेसे लोहितवर्ण हुए सो नीललोहित रूपसे तुम्हारे साथ में निवास करूँगी ॥ ४१ ॥ हे राम ! जिस वरकी इच्छा हो सो आप मुझसे मांगिये, यह वचन सुन रामचन्द्र उस पर्वतकी स्थितिको अङ्गीकार कर ॥ ४२ ॥
भारद्वाजांशभागेन ययाचे परमेश्वरीम् ।। देवि सीते महाभागे दर्शितं रूपमैश्वरम् ।। ४३ ।। हृदयान्नापगच्छेतदिति मे दीयतां वरः ।। भ्रातरो मम कल्याणि वानरोः सविभिषणाः ।। ४४ ।।
हे भारद्वाज ! अंश भागद्वारा परमेश्वरीसे मांगने लगे, हे महाभागे देवि सीते ! यह जो तुमने ईश्वर सम्बन्धी रूप दिखाया है ॥ ४३ ॥ यह कभी मेरे हृदयसे न जाय यही वर मुझे दीजिये । हे कल्याणी ! मेरे भ्राता वानर और विभीषणादि सुहृद् ॥ ४४ ॥
सेनान्यो मम वैदेहि अयोध्यायोधमुख्यकाः ।। सुपुनस्ते संगताः संतु मया रावणतर्जिताः ।। ४५ ।। एतस्मिन्नंतरे चाभूदाकाशे दुंदुभि- स्वनः ।। पपात पुष्पवृष्टिश्च रामसीतोपरि द्विज ।। ४६ ।।
हमारे सब सेनाके लोग अयोध्याके मुख्य जो रावणसे तर्जित हो गये हैं वे सब मुझसे फिर मिल जायँ ॥ ४५ ॥ उसी समय आकासे दुन्दुभीका शब्द होने लगा, राम सीताके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ४६ ॥
प्रहस्य सीता पुनराह रामं तथेति रामोऽपि विरिंचिमुख्यान् ।। स तान्विसृज्य प्रतिगृह्य सीतां गंतुं स्वकं देशमसावियेष ।। ४७ ।।
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम- विजयो नामषड्विंशतितमः सर्गः ।। २६ ।।
तब हँसकर जानकी रघुनाथजीसे कहने लगीं कि, ऐसाही होगा तब रघुनाथजी ब्रह्मादिक देवताओंको बिदा कर सीता ले अपने देश जानेकी इच्छा करने लगे ॥ ४७ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां श्रीरामविजयो नाम षड्विंशतितम सर्गः ।। २६ ।।
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१५९)
सर्ग हिन्दीटीकासहित (१५९)
सप्तविंशति सर्ग
श्रीरामका अयोध्याजीमें आना
रामस्तु पुष्पकारूढः सीतामालिग्य बाहुना ॥ अयोध्यामगमद्वीरः काकुत्स्थकुलनन्दनः ॥ १ ॥ रथनेमिस्वनं श्रुत्वा रामदर्शनलालसाः ॥ भ्रातरो भरताद्यास्ते योधमुख्याश्च ते तथा ॥ २ ॥
पुष्पकपर चडे हुए राम भुजासे जानकीको आलिंगन कर वह काकुत्स्थ- कुलप्रकाश अयोध्याको चले ॥ १ ॥ उस पुष्पकका शब्द सुनकर रामके दर्शनकी लालसावाले भरतादिक भ्राता और मुख्य योधा ॥ २ ॥
राममागतमाज्ञाय ससीतं सन्नृषिव्रजम् ॥ प्रणेमुः सहसागत्य आनन्दाश्रुकणा कुलाः ॥ ३ ॥ वानराज्ञाक्षसान्सर्वानानाय्य स्वपुरं हि सः ॥ सर्वं तत्कथयामास रामः कमललोचनः ॥ ४ ॥
सीता और ऋषियोंके साथ रामको आया जानकर आनन्दके आंसू भरे सहसा रामसे आकर प्रणाम करने लगे ॥ ३ ॥ सब वानर राक्षसोंको अपने पुरमें लाकर कमललोचन रामने रावणवधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया ॥ ४ ॥
तच्छ्रुत्वा विस्मिताः सर्वे साधुसाध्विति वादिनः ॥ सीतां तत्त्वेन विज्ञाय रामं च मधुसूदनम् ॥ ५ ॥ तदेव चिंतयंतस्ते स्वं स्वं स्थानं ययुर्मुदा ॥ विसृष्टा रामभद्रेण सांत्वपूर्वं महात्मना ॥ ६ ॥
यह सुनकर सब विस्मित हो धन्य धन्य कहने लगे, तत्त्वसे सीतांको जानकर और मधुसूदनरूप रामको जानकर ॥ ५ ॥ यही विचार करते वे अपने २ स्थानोंको चले गये, उन महात्माओंको रामचन्द्रने सत्कारपूर्वक बिदा किये । ६ ।
ऋषयश्चाभिनंद्यैनं ससीतं रघुनंदनम् ॥ आशीर्भिर्वर्धयामासुर्ययु- श्चापि यथागतम् ॥ ७ ॥ रामोऽपि सीतया सार्द्धं भ्रातृभिश्च महा- त्मभिः ॥ चक्रे निष्कंटकां पृथ्वीं देवानां च महद्धितम् ॥ ८ ॥
( १६० ) अद्भुत रामायण [ सप्तविंशति-
सीतासहित रघुनाथको ऋषिजन अभिनन्दन कर आशीर्वादोंसे बडाकर अपने २ स्थानोंको गये ॥ ७ ॥ रामचन्द्रभी सीता और महात्मा भ्राताओंके साथमें देवताओंके हितके निमित्त पृथ्वीको निष्कंटक करते हुए ॥ ८ ॥
यज्ञान् बहुविधांश्चक्रे सरयूतीर उत्तमे । दशवर्षसहस्राणि दशवर्ष- शतानि च ॥ किंचिदभ्यधिकं चैव रामो राज्यमकारयत् ॥ ९ ॥ देवकिन्नरगंधर्वा विद्याधरमहोरगाः ॥ रामं नमंति सततं गुणारासं रमापतिम् ॥ १० ॥ एतत्ते कथितं भद्र भारद्वाज महामते ॥ तेषु किंचिदिहाश्चर्यमुक्तं रामकथाश्रयम् ॥ ११ ॥ सर्वं न वक्तुमिच्छामि पुनरुक्तिभयाद्विज ॥ ब्रह्मणा गोपितं तच्च अतोपि न तदुक्तवान् ॥ १२ ॥
सरयूके किनारे उत्तमोत्तम बहुतसे यज्ञ किये. इस प्रकार ग्यारह सहस्र वर्षसे कुछ अधिक रामने राज्य किया ॥ ९ ॥ देव किन्नर गन्धर्व विद्याधर महासर्प गुणोंके खान रामको सदा प्रणाम करते रहे ॥ १० ॥ हे भारद्वाज महामते ! यह सब आपके प्रति कथन किया, रामचरित्र अनेक हैं उनमें कुछेक रामकथाके आश्रयके चरित्र वर्णन किये हैं ॥ ११ ॥ पुनरुक्तिके भयसे मैं सम्पूर्ण कहनेको समर्थ नहीं हूं, ब्रह्माजीने गुप्त कर रक्खा था इस कारण मैंने तुमसे वर्णन नहीं किया था ॥ १२ ॥
अद्भुतोत्तरकाण्डे तत्कथितं वेदसंमितम् ॥ शृणोत्यधीते यश्चै- तत्स ब्रह्म परमाप्नुयात् ॥ १३ ॥ श्लोकमेकं तदर्थं वा शृणुयाद्यश्च मानवः ॥ प्रातर्मध्याह्नयोगे वा स याति परमां गतिम् ॥ १४ ॥
यह वेद संम्मत अद्भुतोत्तरकाण्ड वर्णन किया है जो इसको पढते सुनते हैं, वे पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य इसका एक वा आधा श्लोक सुनते हैं, उनको प्रातः मध्याह्न योगमें पढनेसे परम पदकी प्राप्ति होती है । १४ ।
पञ्चविंशतिसाहस्रं रामायणमधीत्य यत् ॥ फलमाप्नोति पुरुषस्तदस्य श्लोकमात्रतः ॥ १५ ॥ न श्रुतं नाप्यधीतं वा येन श्रुत- मिदं द्विज ॥ स गर्भान्निःसृतो नैव यथा भ्रूणस्तथैव सः ॥ १६ ॥
पचीस सहस्र रामायण पढकर जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इसके एक श्लोकसे मिलता है ॥ १५ ॥ जिसने इसको न पढा न सुना वह गर्भसे नहीं निकला भ्रूण (गर्भ) के समान है ॥ १६ ॥
सग १ ] हिन्दीटीकासहित ( १६१)
रामायणमिदं श्रुत्वा न मातुर्जठरे विशेत् ॥ वेदाश्चत्वार एकत्र तुलया चेदमेकतः ॥ १७ ॥ विधात्रा तुलितं शास्त्रं सर्वदेवाग्रतो द्विज ॥ इदं तु सर्ववेदेभ्यो गौरवादतिरिच्यते ॥ १८ ॥
इस रामायणको सुनकर फिर माताके उदरमें प्रवेश करना नहीं पड़ता, चार वेद एक ओर और रामायण एक ओर रखकर ॥ १७ ॥ विधाताने देवताओंके सामने इसको तोला तो यह गौरवमें वेदोंसे अधिक पाई गई ॥ १८ ॥
शक्राय स्वर्णदीतीरे पुरा पृष्टोऽहमब्रुवम् ॥ तदेव तव चाख्यात- मद्भुतोत्तरकाण्डकम् ॥ १९ ॥ रामायणं महारत्नं ब्राह्महृत्क्षीरधाव- भूत् ॥ नारदान्तः समासाद्य क्रमान्मम हृदि स्थितम् ॥ २० ॥
स्वर्णके किनारे पहले मैंने इन्द्रके पूंछनेपर यह कथा कही थी वही अद्भुतोत्तर काण्ड तुमसे वर्णन किया है ॥ १९ ॥ यह रामायणरूपी महारत्न ब्रह्माजीके हृदय रूपी क्षीर समुद्रमें स्थित था, फिर वह नारदके अन्तरमें प्राप्त हो क्रमसे मेरे हृदयमें प्राप्त हुआ है ॥ २० ॥
तत्सर्वं ब्रह्मणो लोके निःशेषमवतिष्ठते ॥ किंचिदुर्व्यां च पाताले त्रिदिवे शक्रसन्निधौ ॥ २१ ॥ विरिंचिनारदोऽहं च त्रय एवास्य पारगाः ॥ चतुर्थो नोपपद्येत बुद्ध्वेदं सुस्थिरो भव ॥ २२ ॥ यदुक्तमद्भुते काण्डे पुनस्ते कथयाम्यहम् ॥ श्रीरामजन्मवृत्तान्तः श्रीमतीचरितं महत् ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यकस्थानां शोणितेन महा त्मनाम् ॥ नारदस्य च शापेन लक्ष्म्याश्चैवापराधतः ॥ २४ ॥
यह सब चरित्र तो ब्रह्मलोकमें स्थित है, कुछ पृथ्वी पातालमें और स्वर्गमें इन्द्रके समीप स्थित है ॥ २१ ॥ ब्रह्मा नारद और मैं यह तीनही इसके परगामी हैं चौथा नहीं है ऐसा जानकर स्थिर हो ॥ २२ ॥ जो कुछ इस अद्भुतोत्तर काण्डमें कहा है उसकी सूची तुमसे कहता हूं, रामजन्मका वृत्तान्त, श्रीमतीका चरित्र ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यमें रहनेवाले महात्मा ऋषियोंका रुधिर लेना, नारदके शापसे और लक्ष्मीके अपराधसे ॥ २४ ॥
मंदोदरीगर्भनिष्ठा वैदेही जन्म चोक्तवान् ॥ रामस्य विश्वरूपं च भार्गवेण च वीक्षितम् ॥ २५ ॥ ऋष्यमूके हनुमता चतुर्बाहूरघू- त्तमः ॥ दृष्टो भिक्षुस्वरूपेण सुग्रीवसख्यमुक्तवान् ॥ २६ ॥ ११
(१६२) अद्भुतरामायण [ सप्तविंशति
मन्दोदरीके गर्भसे जानकीका जन्म, रामचन्द्रका भार्गवको विश्वरूप दिखाना ॥ २५ ॥ ऋष्यमूकमें हनुमानजीको चतुर्बाहुरूप दर्शन देना और भिक्षुरूपसे महाराजसे मिलकर सुग्रीवकी मित्रता करानी ॥ २६ ॥
लक्ष्मणांगजतापेन शोषणं वारिधेः पुनः ॥ प्राप्तराज्यस्य रामस्य मुनीना सन्निधौ तथा ॥ २७ ॥ सीतायाः कथनं श्रुत्वा सहस्रास्यस्य रक्षसः ॥ मानसोत्तरशैलेदे स्थितिं ज्ञात्वा रघूद्वहः ॥ २८ ॥
फिर लक्ष्मणके अंगसे उत्पन्न हुए तापसे सागरको सुखाना, फिर राज्य प्राप्त होकर मुनियोंके निकटमें ॥ २७ ॥ जानकीसे सहस्रमुखी रावणका वृत्तान्त सुनकर और उसकी स्थिति मानसके उत्तर भागमें जानकर ॥ २८ ॥
जगाम पुष्करद्वीपं भ्रातृभि सह वानरैः ॥ सीताया ऐश्वरं रूपं रावणस्य वधस्तथा ॥ २९ ॥ अयोध्यागमनं रामस्यैष वृत्तान्त संग्रहः ॥ वृत्तान्तसंग्रहं चापि पठित्वा रामभक्तिमान् ॥ जायते मुनिशार्दूल नात्र कार्या विचारणा ॥ ३० ॥
रामचन्द्र भाइयों सहित पुष्करद्वीपको गये, सीताका ईश्वर सम्बन्धी रूप और सहस्रमुख रावणका वध ॥ २९ ॥ फिर अयोध्यामें आगमन रामवृत्तांत-संग्रह है, राममें भक्ति करनेवाला इसही वृत्तान्तको पाठकर रघुनाथमें भक्ति-मान् होता है, हे मुनिराज ! इसमें सन्देह नहीं ॥ ३० ॥
पठेच्च यो रामचरित्र मेतत्पुनाति पापात्सुकृतं लभेत ॥ तीर्था-भिषेकं समरे जयं च स सर्वयज्ञस्य महत्फलं च ॥ ३१ ॥ भजेत यो राममर्चित्यरूपमेकेन भावेन च भूमिपुत्रीम् ॥ एतत्सुपुण्यं शृणुयात्प-ठेद्वा भूयो भवेन्नो जठरे जनन्याः ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
जो कोई इस रामचरित्रको पढता हैं, वह तरकर सुकृत को प्राप्त होता है; तीर्थका अभिषेक, समरमें जय और सब यज्ञका महाफल प्राप्त करता है ॥ ३१ ॥ जो अचिन्त्यरूप रामका भजन करता है वा एक भावसे जानकीका भजन करता है, इस पवित्र ग्रन्थको सुनता व पढता हैं वह फिर माताके गर्भमें स्थित नहीं होता, मुक्त हो जाता है ॥ ३२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डेमुरादाबादनिवासी पं. सुखानन्दमिश्रात्मज पंडित ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां श्रीसीता-रामयोरयोध्यागमनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥ २७ ॥
श्लोकसंख्या १३५३.
वाल्मीकी नारद ऋषी, महावीर शिर नाय ॥
बूझी कुलगुरु शिव शिवा, गणपति गिरा मनाय ॥ १ ॥
रामचरित भाषा कियो, द्विज ज्वालापरसाद ॥
पढहिं सुनहिं सुख लहहिं जन, ऋषियनको संवाद ॥ २ ॥
राम लषण सीता भरत, रिपुहन पवनकुमार ॥
प्रेम सहित वन्दहुँ चरण, हितकृत वारंवार ॥ ३ ॥
कृपादृष्टिकी वृष्टि जिमि, करत हमारी ओर ॥
तैंसिय कीजै नित्य प्रति, दयादृगनकी कोर ॥ ४ ॥
संवत गुणशरअंकविधु, भाद्रशुक्ल रविवार ॥
सुखदायक तिथि सप्तमी, पूरचो ग्रन्थविचार ॥ ५ ॥
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
| खेमराज श्रीकृष्णदास, <br> 'श्रीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> खेतवाड़ी-बम्बई. | गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, <br> 'लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर' स्टीम्-प्रेस, <br> कल्याण-बम्बई. |
श्री १०८ अवधड़ पीर बाबा नारायण
का धर्म पूत बाबा भूतनाथ अवधड़
श्री गुरु स्थान- ग्राम मल्हापुर
डा० सिरसगंज
जि० मैनपुरी
जन्म तिथि पूर्णिमा अगहन १९६५
बुद्धवार
बुक-पोस्ट
शुभविवाह
तिलकोत्सव एवं प्रीतिभोज
दिनांक-11 मई 2013, शनिवार
(सायं 6 बजे से आपके आगमन तक)
सपरिवार
[श्री]राम पोरेवाल जी (कामरेड)
इटावा
R.P.B.
ETAWAH
Ph. 252570
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