भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 164

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५७)

प्रकृतिकी अवस्थावाला, त्रिगुणात्मबीज ऐश्वर्य विज्ञान विराग धर्मोंसे युक्त, चौदह लोकात्मक, जलमें स्थित, आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३१ ॥ विचित्रभेद पुरुष एकनाथ अनन्त भूतोंसे निवासित जगतके अंडसंज्ञक अशेष वेद आद्य तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३२ ॥ अपने तेजसे लोकको भेद पूर्ण रविमंडलमें स्थित तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं सहस्रमूर्धावाले अनन्तशक्ति सहस्रबाहु पुराणपुरुष जलके भीतर शयन करनेवाले नारायणाय आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३३ ॥ कराल डाढोंवाले देवताओंसे नमस्कृत युगान्तकालानलके समान प्रकाशित सम्पूर्ण भूतअण्डके विनाशकारण कालसंज्ञके तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३४ ॥

फणासहस्रेण विराजमानं भुवस्तलेऽधिष्ठितमप्रमेयम् ॥ अशेष-
भारोद्वहने समर्थं नमामि ते रूपनंतसंज्ञम् ॥ ३५ ॥ अव्याहतैश्वर्यम
युग्मनेत्रं ब्रह्मात्मतानं दरसंज्ञमेकम् ॥ युगांतशेषं दिवि नृत्यमानं
न तोऽस्मि रूपं तव रुद्रसंज्ञम् ॥ ३६ ॥

सहस्रफणोंसे विराजमान पृथ्वीतलमें स्थित अप्रमेय सम्पूर्ण भारके उद्वहन करनेमें समर्थ अनन्तसंज्ञक अव्यौतहतैश्वर्य नेत्रद्वयवाले ब्रह्मानंदमें स्थित स्वर्गमें नाचनेवाले ऐसे तुम्हारे रुद्र रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

प्रहीणशोकं विमलं पवित्रं सुरा सुरैरर्चितपादयुग्मम् ॥ सुकोमलं
देवि विशालशुभ्रं नमामि ते रूपमिदं नमामि ॥ ३७ ॥ एतावदुक्त्वा
वचनं रघुराजकुलोद्वहः ॥ संप्रेक्षमाणो वैदेहीं प्रांजलिः पार्श्वतोऽ
भवत् ॥ ३८ ॥

शोकरहित विमल पवित्र सुर असुरोंसे अर्चित चरणकमल कोमल विशाल शुभ्र इस तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३७ ॥ राजा रघुकुलनंदन राम हाथ जोडे यह वचन कहते देवीके पार्श्वभागमें स्थित हुए ॥ ३८ ॥

अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतीपतेः ॥ सस्मितं प्राह
भर्त्तारं शृणुष्वैकं वचो मम ॥ ३९ ॥ गृहीतं यन्मया रूपं रावणस्य
वधाय हि ॥ तेन रूपेण राजेंद्र वसामि मानसोत्तरे ॥ ४० ॥

तब जानकी जगत्पतिके वचन श्रवण करके हँसती हुई स्वामीसे बोली हमारा आप एक वचन सुनिये ॥ ३९ ॥ जो मैंने रावणके वधके निमित्त यह रूप धारण किया है इस रूपसे मैं मानसेके उत्तरभागमें निवास करूंगी ॥ ४० ॥

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित) · पृष्ठ 164, कुल 173 में से · BharatKosha