अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(१५६) अद्भुतरामायण [षड्विंशति
पर्वतोंमें मेरु भोगियों (सर्पों) में अनन्त, सबके परब्रह्म तुम हो यह सब तुममें हैं ॥ २५ ॥ तुम्हारा रूप सब कालसे विहीन अगोचर निर्मल एक है, आदि अन्त मध्यरहित अनन्त तुमसे परे, सबकी आदि तुमको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २६ ॥
यदेव पश्यंति जगत्प्रसूतिं वेदांतविज्ञानविनिश्चतार्थाः ॥ आनन्द- मात्रं परमाविधान तदेव रूपं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ २७ ॥ अशेष- सूत्रांतरसन्निविष्टं प्रधानसंयोगवियोगहेतुः ॥ तेजोमयं जन्मविना- शहीनं प्राणाभिधानं प्रणतोऽस्मि रूपम् ॥ २८ ॥
जो वेदान्तके विज्ञानसे निश्चित अर्थवाले होकर इस जगत्की प्रसूति तुमको जब देखते हैं, आनन्द मय परम तुम्हारे रूपको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ सम्पूर्णके सूत्रांतरमें सन्निविष्ट प्रधानसंयोगवियोगके हेतु तेजोमय जन्मविनाशसे हीन प्राणरूप तुमको मैं नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २८ ॥
आद्यंतहीनं जगदात्मरूपं विभिन्नसंस्थं प्रकृतेः परस्तात् ॥ कूट- स्थमव्यक्तवपुस्तवैव नमामि रूपं पुरुषाभिधानम् ॥ २९ ॥ सर्वाश्रयं सर्वजगन्निधानं सर्वत्रगं जन्मविनाशहीनम् ॥ नतोऽस्मि ते रूपमणु- प्रभेदमाद्यं महत्त्वे पुरुषानुरूपम् ॥ ३० ॥
आदि अन्तमें हीन. जगत्के आत्मरूप विभिन्नसंस्थावान्, प्रकृतिसे परे, कूटस्थ अव्यक्त शरीर पुरुषरूप तुमको नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २९ ॥ सबके आश्रय, सर्व जगत्के निधान, सब स्थानमें जानेवाले जन्मविनाशसे रहित, अणुप्रभेद आद्य महत्त्व पुरुष अनुरूप तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३० ॥
प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजमैश्वर्यविज्ञानविरागधर्मैः ॥ समन्वितं देवि नतोऽस्मि रूपं द्विसप्तलोकात्मकमंबुसंस्थम् ॥ ३१ ॥ विचित्र- भेदं पुरुषैकनाथमनंत भूतैर्विनिवासितं ते ॥ नतोऽस्मि रूपं जगदंड- संज्ञमशेषवेदात्मकमेकमाद्यम् ॥ ३२ ॥ स्वतेजसा पूरितलोकभेदं नमामि रूपं रविमंडलस्थम् ॥ सहस्रमूर्द्धानमनंतशक्तिं सहस्रबाहुं पुरुषं पुराणम् ॥ शयानमंतः सलिले तवैव नारायणाख्यं प्रणतोऽस्मि रूपम् ॥ ३३ ॥ दंष्ट्राकरालं त्रिदशाभिवंद्यं युगांतकालानलकल्प- रूपम् ॥ अशेषभूतांडविनाश हेतुं नमामि रूपं नव कालसंज्ञम् ॥ ३४ ॥