अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 168, कुल 173 में से
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रामायणमिदं श्रुत्वा न मातुर्जठरे विशेत् ॥ वेदाश्चत्वार एकत्र तुलया चेदमेकतः ॥ १७ ॥ विधात्रा तुलितं शास्त्रं सर्वदेवाग्रतो द्विज ॥ इदं तु सर्ववेदेभ्यो गौरवादतिरिच्यते ॥ १८ ॥
इस रामायणको सुनकर फिर माताके उदरमें प्रवेश करना नहीं पड़ता, चार वेद एक ओर और रामायण एक ओर रखकर ॥ १७ ॥ विधाताने देवताओंके सामने इसको तोला तो यह गौरवमें वेदोंसे अधिक पाई गई ॥ १८ ॥
शक्राय स्वर्णदीतीरे पुरा पृष्टोऽहमब्रुवम् ॥ तदेव तव चाख्यात- मद्भुतोत्तरकाण्डकम् ॥ १९ ॥ रामायणं महारत्नं ब्राह्महृत्क्षीरधाव- भूत् ॥ नारदान्तः समासाद्य क्रमान्मम हृदि स्थितम् ॥ २० ॥
स्वर्णके किनारे पहले मैंने इन्द्रके पूंछनेपर यह कथा कही थी वही अद्भुतोत्तर काण्ड तुमसे वर्णन किया है ॥ १९ ॥ यह रामायणरूपी महारत्न ब्रह्माजीके हृदय रूपी क्षीर समुद्रमें स्थित था, फिर वह नारदके अन्तरमें प्राप्त हो क्रमसे मेरे हृदयमें प्राप्त हुआ है ॥ २० ॥
तत्सर्वं ब्रह्मणो लोके निःशेषमवतिष्ठते ॥ किंचिदुर्व्यां च पाताले त्रिदिवे शक्रसन्निधौ ॥ २१ ॥ विरिंचिनारदोऽहं च त्रय एवास्य पारगाः ॥ चतुर्थो नोपपद्येत बुद्ध्वेदं सुस्थिरो भव ॥ २२ ॥ यदुक्तमद्भुते काण्डे पुनस्ते कथयाम्यहम् ॥ श्रीरामजन्मवृत्तान्तः श्रीमतीचरितं महत् ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यकस्थानां शोणितेन महा त्मनाम् ॥ नारदस्य च शापेन लक्ष्म्याश्चैवापराधतः ॥ २४ ॥
यह सब चरित्र तो ब्रह्मलोकमें स्थित है, कुछ पृथ्वी पातालमें और स्वर्गमें इन्द्रके समीप स्थित है ॥ २१ ॥ ब्रह्मा नारद और मैं यह तीनही इसके परगामी हैं चौथा नहीं है ऐसा जानकर स्थिर हो ॥ २२ ॥ जो कुछ इस अद्भुतोत्तर काण्डमें कहा है उसकी सूची तुमसे कहता हूं, रामजन्मका वृत्तान्त, श्रीमतीका चरित्र ॥ २३ ॥ दण्डकारण्यमें रहनेवाले महात्मा ऋषियोंका रुधिर लेना, नारदके शापसे और लक्ष्मीके अपराधसे ॥ २४ ॥
मंदोदरीगर्भनिष्ठा वैदेही जन्म चोक्तवान् ॥ रामस्य विश्वरूपं च भार्गवेण च वीक्षितम् ॥ २५ ॥ ऋष्यमूके हनुमता चतुर्बाहूरघू- त्तमः ॥ दृष्टो भिक्षुस्वरूपेण सुग्रीवसख्यमुक्तवान् ॥ २६ ॥ ११