भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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( १६० ) अद्भुत रामायण [ सप्तविंशति-

सीतासहित रघुनाथको ऋषिजन अभिनन्दन कर आशीर्वादोंसे बडाकर अपने २ स्थानोंको गये ॥ ७ ॥ रामचन्द्रभी सीता और महात्मा भ्राताओंके साथमें देवताओंके हितके निमित्त पृथ्वीको निष्कंटक करते हुए ॥ ८ ॥

यज्ञान् बहुविधांश्चक्रे सरयूतीर उत्तमे । दशवर्षसहस्राणि दशवर्ष- शतानि च ॥ किंचिदभ्यधिकं चैव रामो राज्यमकारयत् ॥ ९ ॥ देवकिन्नरगंधर्वा विद्याधरमहोरगाः ॥ रामं नमंति सततं गुणारासं रमापतिम् ॥ १० ॥ एतत्ते कथितं भद्र भारद्वाज महामते ॥ तेषु किंचिदिहाश्चर्यमुक्तं रामकथाश्रयम् ॥ ११ ॥ सर्वं न वक्तुमिच्छामि पुनरुक्तिभयाद्विज ॥ ब्रह्मणा गोपितं तच्च अतोपि न तदुक्तवान् ॥ १२ ॥

सरयूके किनारे उत्तमोत्तम बहुतसे यज्ञ किये. इस प्रकार ग्यारह सहस्र वर्षसे कुछ अधिक रामने राज्य किया ॥ ९ ॥ देव किन्नर गन्धर्व विद्याधर महासर्प गुणोंके खान रामको सदा प्रणाम करते रहे ॥ १० ॥ हे भारद्वाज महामते ! यह सब आपके प्रति कथन किया, रामचरित्र अनेक हैं उनमें कुछेक रामकथाके आश्रयके चरित्र वर्णन किये हैं ॥ ११ ॥ पुनरुक्तिके भयसे मैं सम्पूर्ण कहनेको समर्थ नहीं हूं, ब्रह्माजीने गुप्त कर रक्खा था इस कारण मैंने तुमसे वर्णन नहीं किया था ॥ १२ ॥

अद्भुतोत्तरकाण्डे तत्कथितं वेदसंमितम् ॥ शृणोत्यधीते यश्चै- तत्स ब्रह्म परमाप्नुयात् ॥ १३ ॥ श्लोकमेकं तदर्थं वा शृणुयाद्यश्च मानवः ॥ प्रातर्मध्याह्नयोगे वा स याति परमां गतिम् ॥ १४ ॥

यह वेद संम्मत अद्भुतोत्तरकाण्ड वर्णन किया है जो इसको पढते सुनते हैं, वे पर ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ १३ ॥ जो मनुष्य इसका एक वा आधा श्लोक सुनते हैं, उनको प्रातः मध्याह्न योगमें पढनेसे परम पदकी प्राप्ति होती है । १४ ।

पञ्चविंशतिसाहस्रं रामायणमधीत्य यत् ॥ फलमाप्नोति पुरुषस्तदस्य श्लोकमात्रतः ॥ १५ ॥ न श्रुतं नाप्यधीतं वा येन श्रुत- मिदं द्विज ॥ स गर्भान्निःसृतो नैव यथा भ्रूणस्तथैव सः ॥ १६ ॥

पचीस सहस्र रामायण पढकर जो पुण्य प्राप्त होता है, वह इसके एक श्लोकसे मिलता है ॥ १५ ॥ जिसने इसको न पढा न सुना वह गर्भसे नहीं निकला भ्रूण (गर्भ) के समान है ॥ १६ ॥