भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग हिन्दीटीकासहित (१५९)

सप्तविंशति सर्ग

श्रीरामका अयोध्याजीमें आना

रामस्तु पुष्पकारूढः सीतामालिग्य बाहुना ॥ अयोध्यामगमद्वीरः काकुत्स्थकुलनन्दनः ॥ १ ॥ रथनेमिस्वनं श्रुत्वा रामदर्शनलालसाः ॥ भ्रातरो भरताद्यास्ते योधमुख्याश्च ते तथा ॥ २ ॥

पुष्पकपर चडे हुए राम भुजासे जानकीको आलिंगन कर वह काकुत्स्थ- कुलप्रकाश अयोध्याको चले ॥ १ ॥ उस पुष्पकका शब्द सुनकर रामके दर्शनकी लालसावाले भरतादिक भ्राता और मुख्य योधा ॥ २ ॥

राममागतमाज्ञाय ससीतं सन्नृषिव्रजम् ॥ प्रणेमुः सहसागत्य आनन्दाश्रुकणा कुलाः ॥ ३ ॥ वानराज्ञाक्षसान्सर्वानानाय्य स्वपुरं हि सः ॥ सर्वं तत्कथयामास रामः कमललोचनः ॥ ४ ॥

सीता और ऋषियोंके साथ रामको आया जानकर आनन्दके आंसू भरे सहसा रामसे आकर प्रणाम करने लगे ॥ ३ ॥ सब वानर राक्षसोंको अपने पुरमें लाकर कमललोचन रामने रावणवधका सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया ॥ ४ ॥

तच्छ्रुत्वा विस्मिताः सर्वे साधुसाध्विति वादिनः ॥ सीतां तत्त्वेन विज्ञाय रामं च मधुसूदनम् ॥ ५ ॥ तदेव चिंतयंतस्ते स्वं स्वं स्थानं ययुर्मुदा ॥ विसृष्टा रामभद्रेण सांत्वपूर्वं महात्मना ॥ ६ ॥

यह सुनकर सब विस्मित हो धन्य धन्य कहने लगे, तत्त्वसे सीतांको जानकर और मधुसूदनरूप रामको जानकर ॥ ५ ॥ यही विचार करते वे अपने २ स्थानोंको चले गये, उन महात्माओंको रामचन्द्रने सत्कारपूर्वक बिदा किये । ६ ।

ऋषयश्चाभिनंद्यैनं ससीतं रघुनंदनम् ॥ आशीर्भिर्वर्धयामासुर्ययु- श्चापि यथागतम् ॥ ७ ॥ रामोऽपि सीतया सार्द्धं भ्रातृभिश्च महा- त्मभिः ॥ चक्रे निष्कंटकां पृथ्वीं देवानां च महद्धितम् ॥ ८ ॥