अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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तब कन्या विस्मयको प्राप्त हो बोली दो भुजा देखती हूं, तब पर्वत बोले हे शुभे ! उसके वक्षस्थलमें ॥ १५ ॥ क्या है जो यह पुरुष धारण कर रहा है, सो बता, तब कन्याने कहा वह पुरुष बहुत सुन्दर माला धारण किये है ॥ १६ ॥
वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकौ । एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १७ ॥ मनसा चिंतयंतौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत् । मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः ॥ १८ ॥
और हाथमें धनुषबाण धारण किये हैं, जब यह कहा तब वे दोनों मुनि श्रेष्ठ ॥ १७ ॥ मनमें विचारने लगे यह किसीकी माया है, यह मायावी तस्कर अवश्यही श्रीकृष्ण हैं ॥ १८ ॥
आगतो नान्यथा कुर्यात्कथं मेऽन्यो मुखं त्विदम् । गोलांगूली-यमित्येवं चिंतयामास नारदः ॥ १९ ॥ पर्वतोऽपि तथैवैतद्वानरत्वं कथं मया । प्राप्तमित्येव सहसा चिंतामापेदिवांस्तथा ॥ २० ॥
वही आगये हैं नहीं तो इस प्रकारका हमारा मुख किस प्रकारका हों सकता है, कि गोलांगुलका मुख हो गया, यह नारदजी चिन्ता करने लगे ॥ १९ ॥ पर्वत कहने लगे हमारा वानरका मुख किस प्रकार हो गया ? इस प्रकार बडी चिन्ता हुई ॥ २० ॥
ततो राजा प्रणम्याऽसौ नारदं पर्वतं तथा । भवद्भूचां किमिदं भद्रौ कृतं बुद्धि विमोहनम् ॥ २१ ॥ स्वस्थौ भवंतौ तिष्ठेतां यदि कन्यार्थ-मुद्यतौ । एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ ॥ २२ ॥
तब राजा प्रणाम कर नारद और पर्वतसे बोले, यह तुम्हारी बुद्धिमें मोह किस प्रकारसे हुआ है ॥ २१ ॥ यदि कन्याके स्वीकारकी इच्छा है तो आप स्वस्थ होकर स्थित पूजिये, यह सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ राजासे कहने लगे ॥ २२ ॥
त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथंचन । आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव भामिनी ॥ २३ ॥ ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्य च देवताम् । पित्रा नियुक्ता सहसा मुनिशापभयाद्द्विज ॥ २४ ॥
राजन् तुमने ही मोह किया है, और हम भी किसी प्रकारसे मोह नहीं करते हैं, यह कन्या हम दोनोंमें किसी एकको वरण कर ले ॥ २३ ॥ तब वह कन्या फिर देवताको प्रणाम करके शापके डरसे पितासे नियुक्त की गई ॥ २४ ॥