भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(१६) अद्भुतरामायण [ चतुर्थ-

अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे । सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तु वानराननौ ॥ ७ ॥ मुनिश्रेष्ठौ न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा । अनयोर्मध्यतस्त्वेकं वरं षोडशवार्षिकम् ॥ ८ ॥

इन दोनोंमें किसी एकको माला प्रदान कर। तब वह पितासे बोली इन दोनोंका तो वानरका मुख है ॥ ७ ॥ मुझे तो मुनिश्रेष्ठ नारद और पर्वत दीखते नहीं परंतु इन दोनोंके बीचमें एक सोलह वर्षका युवा ॥ ८ ॥

सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसंनिभम् । दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुंगो रःस्थलमुत्तमम् ॥ ९ ॥ चामीकराभं करणपटयुग्मकशोभितम् । विभक्तत्रिवलीयुक्तनाभि व्यक्तकृशोदरम् ॥ १० ॥

सम्पूर्ण गहनोंसे युक्त अलसीके फूलके समान दीर्घ बाहु विशाल नेत्र ऊँच । श्रेष्ठ उरस्थल ॥ ९ ॥ सुवर्णके समान तेजवाले दो वस्त्रोंसे शोभित विभक्त त्रिवलीसे युक्त नाभि प्रगट कृश उदरवाला ॥ १० ॥

हिरण्याभरणोपेतं सुरंगनखं शुभम् । पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम् ॥ ११ ॥ पद्मांग्घ्रि पद्महृदयं पद्मनाभं श्रियावृतम् । दंतपंक्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुङ्मलसन्निभम् ॥ १२ ॥

सुवर्णके गहनोंसे युक्त सुन्दर नख, कमलकेसे हाथ कमलमुख कमल लोचन ॥ ११ ॥ कमलकेसे चरण कमलहृदय पद्मनाभ लक्ष्मीसे युक्त चमेलीके कलीके समान दंतपंक्तिसे शोभित ॥ १२ ॥

हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै । पाणिं स्थितमिमं छन्नं पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥ १३ ॥ एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः । कियंतो बाहवस्तस्य कन्ये वद यथातथम् ॥ १४ ॥

मुझे देखकर हास्यकर दक्षिण हाथ फैलाये हैं इसहीको मैं सुन्दर सिर आदिसे युक्त देखती हूँ ॥ १३ ॥ यह कहनेपर नारदमुनि सन्देहको प्राप्त हो बोले हे कन्या ! यथार्थ कह उसके कितनी भुजा हैं ॥ १४ ॥।

बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या सुविस्मिता । प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे ॥ १५ ॥ किंच पश्यसि मे ब्रूहि करे किं धारय- त्यपि । कन्या तमाह मालां वै चंचद्रूपामनुत्तमाम् ॥ १६ ॥