भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५)

अथाययौ ब्रह्मवरात्मजो महांस्त्रैविद्य वृद्धोभगवान्महात्मा ।
सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो महामुनिर्नारद आजगाम ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे नारदपर्वत-
सभाप्रवेशो नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥

उसी समय ब्रह्मवरात्मज महान् त्रिविद्यावृद्ध महात्मा नारदजी पर्वतको साथ लेकर उस स्थानमें आये ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आ० अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषायां नारदपर्वत-
सभाप्रवेशो नाम तृतीय सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थ सर्ग

रामचन्द्रके जन्म लेनेका कारण

तवागतौ समीक्ष्याथ राजा संभ्रांतमानसः । दिव्यमासनमा दिश्य पूजयामास तावुभौ ॥ १ ॥ उभौ देवऋषी दिव्यौ नित्यज्ञानवतां वरौ । सभासीनौ महात्मानौ कन्यार्थे मुनिसत्तमौ ॥ २ ॥

उन दोनोंको आया देखकर राजा संभ्रान्तमन होकर दिव्य आसनपर बैठाकर दोनोंकी पूजा करता हुआ ॥ १ ॥ वे दोनों दिव्य देवऋषि नित्य ज्ञानवालोंमें श्रेष्ठ महात्मा कन्याके निमित्त उस आसनमें बैठते हुए ॥ २ ॥

तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम् । स्थितां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ३ ॥ अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि । तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथा विधि ॥ ४ ॥

उन दोनोंको प्रणाम कर राजा कमललोचनी यशस्विनी अपनी कन्यासे बोले ॥ ३ ॥ हे भद्रे ! इन दोनोंमें जिसे मनसे वरण करो उसीको यथाविधि प्रणाम कर यह माला पहरा दो ॥ ४ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या स्त्रीभिः परिवृता तदा । मालां हिरण्मयीं दिव्यामादाय शुभलोचना ॥ ५॥ तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ६ ॥

स्त्रियोंसे युक्त जब उस कन्यासे यह वचन कहा गया तब वह शुभ लोचना दिव्य सुवर्णकी मालाको लेकर ॥ ५ ॥ खडी रही तब राजाने कहा हे वत्से ! तू क्या करेगी ॥ ६ ॥