भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(७०) अद्भुतरामायण [ द्वादश-

सब कालके वशमें हैं, काल किसीके वशमें नहीं है वह सनातन सबके अन्तरमें स्थित हुआ वश करता है ॥ १७ ॥ वही भगवान् प्राण सर्वज्ञ पुरुष कहाता है, विद्वान् सब इन्द्रियोंसे परे मनको कहते हैं ॥ १८ ॥

मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः । महतः परमव्यक्त- मव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ १९ ॥ पुरुषाद्भगवान्प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत् । प्राणात्परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः ॥ २० ॥

मनसे परे अहंकार अहंकारसे परे महान्, उससे परे अव्यक्त इससे परे पुरुष ॥ १९ ॥ पुरुषसे परे भगवान् प्राण और उसके वशीभूत यह सब जगत् है प्राणसे परे व्योम और आकाशसे परे ईश्वर है ॥ २० ॥

सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ॥ २१ ॥ नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावर- जंगमम् । ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम् ॥ २२ ॥

सो मैं सर्वत्रगामी शान्त ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ मुझसे परे और कुछ नहीं, मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ स्थावर जंगम जगत्में नित्य हीं रहेंगे, केवल एक आकाशरूप महेश्वर मैंही स्थित हूँ ॥ २२ ॥

सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत् । मायी मायामयो देवः कालेन सह संगतः ॥ २३ ॥ मत्सन्निधावेष कालः करोति सकलं जगत् ॥ नियोजयत्यनंतात्मा ह्येतद्वेदानुशासनम् ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमदा. आदि. वाल्मी. उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

सो मैं यह सब उत्पन्न करके संहार कर जाता हूं मैं मायामय देव कालके सम्बन्धसे सब कुछ कहता हूँ ॥ २३ ॥ मेरी इच्छा निकटतासे यह काल सब जगत् रखता है और अनन्तात्मा इसके कृत्यमें लगता है, यही वेदका अनुशासन है ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्वा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषा-टीकायां उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

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