भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पृष्ठ 76

[ सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६९)

तयोरनादिर्निर्दिष्टः कालः संयोजकः परः । त्रयमेतदनाद्यंत-
मध्यक्ते समवस्थितम् ॥ ९ ॥ तदात्मकं तदन्यत्स्यात्तद्रूपं मामकं
विदुः । महदाद्यं विशेषांतं संप्रसूतेऽखिलं जगत् ॥ १० ॥
उनका संयोग करनेवाला अनादि निर्दिष्ट काल है, यह तीनों अनादि
अनन्त अव्यक्तमें स्थित हैं । ९ ।। तदात्मक अन्य दो परन्तु वह रूप मेरा
ही महत्से लेकर है विशेषपर्यंत सब जगत्को निर्मित करती है ।।१०।।

या प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्व देहिनाम् । पुरुषः प्रकृतिस्थतोऽ-
पिभुक्ते यः प्राकृतान्गुणान् ॥ ११ ॥ अहंकारो विविक्तत्वात्प्रोच्यते
पञ्चविंशकः । आद्यो विकारः प्रकृतिर्महानात्मेति कथ्यते ॥ १२ ॥
जो यह प्रकृति सब प्राणियोंकी मोहित करनेवाली कही गई है और पुरुष
प्रकृतिमें स्थित हुआ प्रकृतिके गुणोंको भोगता है ।।११।। अहंकारसे विविक्त
होनसे वह पच्चीस तत्त्वका कहा जाता है आद्य विकार प्रकृति और महान्
आत्मा कहा जाता है ॥ १२ ॥

विज्ञानशक्तिर्विज्ञानादहंकारस्तदुत्थितः । एक एव महानात्मा
सोऽहंकारोऽभिधीयते ॥ १३ ॥ स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्व
चिंतकैः । तेन वेदयते सर्वं सुखं दुखं च जन्मसु ॥ १४ ॥
विज्ञानसे विज्ञानशक्ति और उससे अहंकारयुक्त कहा जाता है ।। १३ ।।
वही जीव अन्तरात्मा नामसे तत्वविज्ञानियों द्वारा गाया जाता है उसके
द्वारा जन्मोंका सुख दुःख जाना जाता है ।। १४ ।।

स विज्ञानात्मकस्तस्य मनःस्यादुपकारकम् । तेनाषिवेकतस्तस्मा
संसारः पुरुषस्य नु ॥ १५ ॥ स चाविवेकः प्रकृतौ संगात्कालेन
सोऽभवत् । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ १६ ॥
विज्ञानात्मक वही है, मन उसका उपकारी है, उसको अविवेक होनसे
संसार प्राप्त हुआ है ।। १५ ।। वह अविवेक प्रकृतिके संगसे काल द्वारा प्राप्त
हुआ है, कालही प्राणियोंको प्रगट कर संहार कर जाता है ।। १६ ।।

सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे । सोऽन्तरा सर्वमेवेदं
नियच्छति सनातनः ॥ १७ ॥ प्रोच्यते भगवान्प्राणः सर्वज्ञः पुरुषः
परः । तर्वेंद्रियेभ्यः परमं मनः प्राहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥