अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(६८) अद्भुतरामायण [ द्वादश-
द्वादश सर्ग
उपनिषदकथन करना
पुना रामः प्रवचनमुवाच द्विजपुंगवः । अव्यक्तादभवत्कालः प्रधानं पुरुषः परः ॥ १ ॥ तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्मात्सर्वमहं जगत् । सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ २ ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति । सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥ ३ ॥ सर्वाधारं स्थिरानंदमव्यक्तं द्वैतवर्जितम् । सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम् ॥ ४ ॥
फिर रामचन्द्र कहने लगे हे ब्राह्मणश्रेष्ठ । अव्यक्तसे काल हुआ उससे पर प्रधान पुरुष हुआ ॥ १ ॥ इनसे यह सब जगत् उत्पन्न हुआ है, वह सब ओरसे हस्त चरण शिर मुखवाला है ॥ २ ॥ सब ओरसे कर्णवान् और सब ओरसे आवृत्त हुआ स्थित है सब इन्द्रियगुणोंका आभासरूप, सब इन्द्रियोंसे वर्जित ॥ ३ ॥ सर्वाधार, स्थिरानंद, अव्यक्त, द्वैतवर्जित, सब उपमानसे रहित, प्रमाणसे रहित, तथा इंद्रियोंसे परे ॥ ४ ॥
निर्विकल्पं निराभासं सर्वाभासं परामृतम् । अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शास्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ ५ ॥ निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः । स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यंतरात्परः ॥ ६ ॥
निर्विकल्प निराभास सर्वाभास परामृत अभिन्न भिन्न संस्थावाले शाश्वत ध्रुव अविनाशी ॥ ५ ॥ निर्गुण परम व्योम उसके ज्ञानको कवि कहते हैं वही सब भूतोंका आत्मा बाह्य अन्तरसे परे है ॥ ६ ॥
सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । मया ततमिदं विश्वं जगदव्यक्तरूपिणा ॥ ७ ॥ मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित् । प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम् ॥ ८ ॥
सो मैं सर्वत्रगामी शांत ज्ञानात्मा परमेश्वर हूं मुझे अव्यक्त रूपवालेने यह सब जगत् विस्तार कर रक्खा है ॥ ७ ॥ सब प्राणी मेरे स्थानमें हैं, इसको जानता है, वह वेदका जाननेवाला कहता है, प्रधान और पुरुष यह दोही तत्त्व कहते हैं ॥ ८ ॥