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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

(६८) अद्भुतरामायण [ द्वादश-

द्वादश सर्ग

उपनिषदकथन करना

पुना रामः प्रवचनमुवाच द्विजपुंगवः । अव्यक्तादभवत्कालः प्रधानं पुरुषः परः ॥ १ ॥ तेभ्यः सर्वमिदं जातं तस्मात्सर्वमहं जगत् । सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ॥ २ ॥
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति । सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ॥ ३ ॥ सर्वाधारं स्थिरानंदमव्यक्तं द्वैतवर्जितम् । सर्वोपमानरहितं प्रमाणातीतगोचरम् ॥ ४ ॥

फिर रामचन्द्र कहने लगे हे ब्राह्मणश्रेष्ठ । अव्यक्तसे काल हुआ उससे पर प्रधान पुरुष हुआ ॥ १ ॥ इनसे यह सब जगत् उत्पन्न हुआ है, वह सब ओरसे हस्त चरण शिर मुखवाला है ॥ २ ॥ सब ओरसे कर्णवान् और सब ओरसे आवृत्त हुआ स्थित है सब इन्द्रियगुणोंका आभासरूप, सब इन्द्रियोंसे वर्जित ॥ ३ ॥ सर्वाधार, स्थिरानंद, अव्यक्त, द्वैतवर्जित, सब उपमानसे रहित, प्रमाणसे रहित, तथा इंद्रियोंसे परे ॥ ४ ॥

निर्विकल्पं निराभासं सर्वाभासं परामृतम् । अभिन्नं भिन्नसंस्थानं शास्वतं ध्रुवमव्ययम् ॥ ५ ॥ निर्गुणं परमं व्योम तज्ज्ञानं सूरयो विदुः । स आत्मा सर्वभूतानां स बाह्याभ्यंतरात्परः ॥ ६ ॥

निर्विकल्प निराभास सर्वाभास परामृत अभिन्न भिन्न संस्थावाले शाश्वत ध्रुव अविनाशी ॥ ५ ॥ निर्गुण परम व्योम उसके ज्ञानको कवि कहते हैं वही सब भूतोंका आत्मा बाह्य अन्तरसे परे है ॥ ६ ॥

सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । मया ततमिदं विश्वं जगदव्यक्तरूपिणा ॥ ७ ॥ मत्स्थानि सर्वभूतानि यस्तं वेद स वेदवित् । प्रधानं पुरुषं चैव तत्त्वद्वयमुदाहृतम् ॥ ८ ॥

सो मैं सर्वत्रगामी शांत ज्ञानात्मा परमेश्वर हूं मुझे अव्यक्त रूपवालेने यह सब जगत् विस्तार कर रक्खा है ॥ ७ ॥ सब प्राणी मेरे स्थानमें हैं, इसको जानता है, वह वेदका जाननेवाला कहता है, प्रधान और पुरुष यह दोही तत्त्व कहते हैं ॥ ८ ॥

[ सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (६९)

तयोरनादिर्निर्दिष्टः कालः संयोजकः परः । त्रयमेतदनाद्यंत-
मध्यक्ते समवस्थितम् ॥ ९ ॥ तदात्मकं तदन्यत्स्यात्तद्रूपं मामकं
विदुः । महदाद्यं विशेषांतं संप्रसूतेऽखिलं जगत् ॥ १० ॥
उनका संयोग करनेवाला अनादि निर्दिष्ट काल है, यह तीनों अनादि
अनन्त अव्यक्तमें स्थित हैं । ९ ।। तदात्मक अन्य दो परन्तु वह रूप मेरा
ही महत्से लेकर है विशेषपर्यंत सब जगत्को निर्मित करती है ।।१०।।

या प्रकृतिरुद्दिष्टा मोहिनी सर्व देहिनाम् । पुरुषः प्रकृतिस्थतोऽ-
पिभुक्ते यः प्राकृतान्गुणान् ॥ ११ ॥ अहंकारो विविक्तत्वात्प्रोच्यते
पञ्चविंशकः । आद्यो विकारः प्रकृतिर्महानात्मेति कथ्यते ॥ १२ ॥
जो यह प्रकृति सब प्राणियोंकी मोहित करनेवाली कही गई है और पुरुष
प्रकृतिमें स्थित हुआ प्रकृतिके गुणोंको भोगता है ।।११।। अहंकारसे विविक्त
होनसे वह पच्चीस तत्त्वका कहा जाता है आद्य विकार प्रकृति और महान्
आत्मा कहा जाता है ॥ १२ ॥

विज्ञानशक्तिर्विज्ञानादहंकारस्तदुत्थितः । एक एव महानात्मा
सोऽहंकारोऽभिधीयते ॥ १३ ॥ स जीवः सोऽन्तरात्मेति गीयते तत्त्व
चिंतकैः । तेन वेदयते सर्वं सुखं दुखं च जन्मसु ॥ १४ ॥
विज्ञानसे विज्ञानशक्ति और उससे अहंकारयुक्त कहा जाता है ।। १३ ।।
वही जीव अन्तरात्मा नामसे तत्वविज्ञानियों द्वारा गाया जाता है उसके
द्वारा जन्मोंका सुख दुःख जाना जाता है ।। १४ ।।

स विज्ञानात्मकस्तस्य मनःस्यादुपकारकम् । तेनाषिवेकतस्तस्मा
संसारः पुरुषस्य नु ॥ १५ ॥ स चाविवेकः प्रकृतौ संगात्कालेन
सोऽभवत् । कालः सृजति भूतानि कालः संहरते प्रजाः ॥ १६ ॥
विज्ञानात्मक वही है, मन उसका उपकारी है, उसको अविवेक होनसे
संसार प्राप्त हुआ है ।। १५ ।। वह अविवेक प्रकृतिके संगसे काल द्वारा प्राप्त
हुआ है, कालही प्राणियोंको प्रगट कर संहार कर जाता है ।। १६ ।।

सर्वे कालस्य वशगा न कालः कस्यचिद्वशे । सोऽन्तरा सर्वमेवेदं
नियच्छति सनातनः ॥ १७ ॥ प्रोच्यते भगवान्प्राणः सर्वज्ञः पुरुषः
परः । तर्वेंद्रियेभ्यः परमं मनः प्राहुर्मनीषिणः ॥ १८ ॥

(७०) अद्भुतरामायण [ द्वादश-

सब कालके वशमें हैं, काल किसीके वशमें नहीं है वह सनातन सबके अन्तरमें स्थित हुआ वश करता है ॥ १७ ॥ वही भगवान् प्राण सर्वज्ञ पुरुष कहाता है, विद्वान् सब इन्द्रियोंसे परे मनको कहते हैं ॥ १८ ॥

मनसश्चाप्यहंकारमहंकारान्महान् परः । महतः परमव्यक्त- मव्यक्तात्पुरुषः परः ॥ १९ ॥ पुरुषाद्भगवान्प्राणस्तस्य सर्वमिदं जगत् । प्राणात्परतरं व्योम व्योमातीतोऽग्निरीश्वरः ॥ २० ॥

मनसे परे अहंकार अहंकारसे परे महान्, उससे परे अव्यक्त इससे परे पुरुष ॥ १९ ॥ पुरुषसे परे भगवान् प्राण और उसके वशीभूत यह सब जगत् है प्राणसे परे व्योम और आकाशसे परे ईश्वर है ॥ २० ॥

सोऽहं सर्वत्रगः शांतो ज्ञानात्मा परमेश्वरः । नास्ति मत्परमं भूतं मां विज्ञाय विमुच्यते ॥ २१ ॥ नित्यं हि नास्ति जगति भूतं स्थावर- जंगमम् । ऋते मामेकमव्यक्तं व्योमरूपं महेश्वरम् ॥ २२ ॥

सो मैं सर्वत्रगामी शान्त ज्ञानात्मा परमेश्वर हूँ मुझसे परे और कुछ नहीं, मुझे जानकर प्राणी मुक्त हो जाता है ॥ २१ ॥ स्थावर जंगम जगत्में नित्य हीं रहेंगे, केवल एक आकाशरूप महेश्वर मैंही स्थित हूँ ॥ २२ ॥

सोऽहं सृजामि सकलं संहरामि सदा जगत् । मायी मायामयो देवः कालेन सह संगतः ॥ २३ ॥ मत्सन्निधावेष कालः करोति सकलं जगत् ॥ नियोजयत्यनंतात्मा ह्येतद्वेदानुशासनम् ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमदा. आदि. वाल्मी. उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

सो मैं यह सब उत्पन्न करके संहार कर जाता हूं मैं मायामय देव कालके सम्बन्धसे सब कुछ कहता हूँ ॥ २३ ॥ मेरी इच्छा निकटतासे यह काल सब जगत् रखता है और अनन्तात्मा इसके कृत्यमें लगता है, यही वेदका अनुशासन है ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्वा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये ज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषा-टीकायां उपनिषत्कथनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)

सर्ग हिन्दीटीकासहित (७१)

त्रयोदश सर्ग

रामका भक्तियोग कहना

वक्ष्ये समाहितमनाश्शृणुष्व पवनात्मज ॥ येनेदं लभ्यते रूपं येनेदं संप्रवर्तते ॥ १ ॥ नाहं तपोभिर्विविधैर्न दानेन च चेज्यया ॥ शक्यो हि पुरुषैर्ज्ञातुमृते भक्तिमनुत्तमाम् ॥ २ ॥

हे महावीर ! जो मैं कहता हूँ सो सावधान मन होकर सुनो जिससे यह सब रूप प्राप्त होकर प्रवृत्त होता है ॥ १ ॥ न मैं अनेक प्रकारके तप न दान न यज्ञसे पुरुषोंके द्वारा जाना जाता हूं केवल जो मेरी भक्ति करते हैं वही मुझको प्राप्त होते हैं ॥ २ ॥

अहं हि सर्वभावानांमंतस्तिष्ठासि सर्वगः ॥ मां सर्वसाक्षिणं लोका न जानंति प्लवंगम ॥ ३ ॥ यस्मांतरा सर्वमिदं यो हि सर्वांतर परः ॥ सोऽहं धाता विधाता च लोकेऽस्मिन्विश्वतोमुखः ॥ ४ ॥

मैं सर्वगामी सब भावोंके अन्तमें स्थित रहता हूँ हे वीर सर्वसाक्षी मुझको लोक जाननेमें समर्थ नहीं होते ॥ ३ ॥ जिसके अन्तरमें यह सब हैं और जो सर्वांतर्यामी परेसे परे हैं वह मैं धाता विधाता इस लोकमें सब स्थित हो रहा हूँ ॥ ४ ॥

न मां पश्यंति मुनयः सर्वेऽपि त्रिदिवौकसः ॥ ब्राह्मणा मनवः शक्रा ये चान्ये प्रथितौजसः ॥ ५ ॥ गृणंति सततं वेदा मामेकं परमेश्वरम् । जयन्ति विविधैरंगिन ब्राह्मणा वैदिकैर्मखैः ॥ ६ ॥

सब देवता और मुनि मुझे देखनेसे समर्थ नहीं होते हैं ब्राह्मण मनु इन्द्र तथा और देवता हैं ॥ ५ ॥ सब वेद मुझही एक परमेश्वरका निरन्तर यजन करते हैं, और कहते हैं ब्राह्मण अनेक यज्ञोंसे मेरा यजन करते हैं ॥ ६ ॥

सर्वे लोका नमस्यन्ति ब्रह्मलोके पिता महम् । ध्यायंति योगिनो देवं भूताधिपतिमीश्वरम् ॥७॥ अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता चैव फलप्रद ॥ सर्वदेवतनुर्भूत्वा सर्वात्मा सर्व संस्तुतः ॥ ८ ॥

सब लोक ब्रह्मलोकमें पितामहको नमस्कार करते हैं योगी भूताधिपति ईश्वरको नित्य ध्यान करते हैं ॥ ७ ॥ मैं सब यज्ञोंका भोक्ता और फलका

(७२) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-

देनेवाला हूँ सब देवका शरीर होकर सर्व आत्मा सबसे स्तुतिको प्राप्त होता हूँ ॥ ८ ॥

मां पश्यंतीह विद्वांसो धार्मिका वेदवादिनः । तेषां संनिहितो नित्यं ये भक्ता मामुपासते ॥९॥ ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या धार्मिका मामुपासते । तेषां ददामि तत्स्थानमानंदं परमं पदम् ॥ १० ॥

धर्मात्मा वेदवादी विद्वान् मुझको देखते हैं, जो भक्त मेरी उपासना करते हैं मैं सदा उनके निकट निवास करता हूँ ॥ ९ ॥ ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य धर्मात्मा मेरी उपासन-करते हैं, उनको मैं आनंदमय परम पदका स्थान देता हूँ ॥ १० ॥

अन्येऽपि ये विकर्मस्थाः शूद्राद्या नीच जातयः । भक्तिमंतः प्रमुच्यंते कालेन मयि संगताः ॥ ११ ॥ न मद्भक्ता विनश्यंते मद्भक्ता वीतकल्मषाः ॥ आदावेतत्प्रतिज्ञातं न मे भक्तः प्रणश्यति ॥ १२ ॥

और भी जो शूद्रादि नीच जाति विकर्ममें स्थित हैं वे भक्ति करनेके समय मेरे निकट प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं ॥ ११ ॥ मेरे भक्त पाप रहित हो जाते हैं, उनका नाश नहीं होता यह पहलेहीसे मेरी प्रतिज्ञा है कि, मेरे भक्त नाश नहीं होते ॥ १२ ॥

यो वा निंदति तं मूढो देवदेवं स निंदति ॥ यो हि तं पूजयेद्भक्त्या स पूजयति मां सदा ॥ १३ ॥ पत्रं पुष्पं फलं तोयं मदाराधनकार- णात् ॥ यो मे ददाति नियतः स मे भक्तः प्रियो मतः ॥ १४ ॥

जो मूढ मेरे भक्तकी निन्दा करता है वह देवदेवकी निन्दा करता है और जो उनको भक्तिसे पूजन करता है वह मेरा पूजन करता है ॥ १३ ॥ जो मेरे पूजनको पत्र पुष्प फल जल प्रदान करता है वह मेरा भक्त और मेरा प्रिय है ॥ १४ ॥

निधाय दत्तवान्वेदानशेषान्नास्य निःसृतान् ॥ १५ ॥ अहमेव हि सर्वेषां योगिनां गुरुरव्ययः ॥ धार्मिकाणां च गोप्ताहं निहन्ता वेद विद्विषाम् ॥ १६ ॥

में जगत्के आदिमें ब्रह्मा परमेष्ठीका निर्माण कर सम्पूर्ण वेदोंको प्रदान करता हुआ, जो मेरे मुखसे निकले हैं ॥ १५ ॥ मैं ही सम्पूर्ण योगियोंका अविनाशी गुरु हूँ धर्मात्माओंका रक्षक और वेदद्वेषियोंका नाशक हूँ ॥ १६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७३)

अहं वै सर्व संसारान्मोचको योगिनामिह ॥ संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः ॥ १७ ॥ अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ॥ मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी ॥ १८ ॥

में ही योगियोंके साथ सब संसारका मोचक हूँ, मैं ही सब संसारसे रहित सब संसारका हेतु हूँ ॥ १७ ॥ मैंही संहार करनेवाला और निर्माता तथा परिपालन करनेवाला हूँ मायावी मेरी शक्ति सब लोकको मोहित करती है ॥ १८ ॥

ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते । नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः ॥ १९ ॥ अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ॥ आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ॥ २० ॥

वह मेरीही शक्ति विद्यानामसे गायी जाती है, योगियोंके हृदयमें स्थित हो मैं उस मायाको दूर करता हूँ ॥ १९ ॥ मैं ही सब शक्तियोंका प्रवृत्त करनेवाला हूँ, सबका आधारभूत हो अमृतका निधान हूँ ॥ २० ॥

एका सर्वांतरा शक्तिः करोति विविधं जगत् ॥ भूत्वा नारायणोऽनंतो जगन्नाथो जगन्मयः ॥ २१ ॥ तृतीया महती शक्तिर्निहंति सकलं जगत् ॥ तामसी मे समाख्याता कालात्मा रुद्ररूपिणी ॥ २२ ॥

एकही सर्वांतरा शक्ति जगत्को अनेक प्रकारसे करती है, वह जगन्नाथ अविनाशी नारायण जगन्नाथ है ॥ २१ ॥ तीसरी महान् शक्ति सो जगत्को निर्माण करती है वह तामसी रुद्ररूपिणी कलात्मा रुद्ररूपवाली है ॥ २२ ॥

ध्यानेन मां प्रपश्यंति केचिज्ज्ञानेन चापरे ॥ अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ॥ २३ ॥ यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ॥ अन्येच ये त्रयो भक्ता मदाराधनकांक्षिणः ॥ २४ ॥

कोई मुझे ध्यानसे और कोई ज्ञानसे देखते हैं, कोई भक्तियोग और कोई कर्मयोगसे मुझको देखते हैं सब भक्तोंमें मुझे यह सबसे अधिक प्रिय है ॥ २३ ॥ जो ज्ञानसे मेरी नित्य आराधना करता है और जो दूसरे तीन प्रकार भक्त मेरी आराधनाके करनेवाले हैं ॥ २४ ॥

(७४) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-

तेऽपि मां प्राप्नुवंत्येव नावर्तंते च वै पुनः ।। मया ततमिदं कृत्स्ने- मेतद्यो वेद सोऽमृतः ।। २५ ।। पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभा- वतः ।। करोति काले भगवान्महायोगेश्वरः स्वयंम् ।। २६ ।। वे भी मुझको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं गिरते हैं, मैंने इस जगत्को विस्तार कर रक्खा है जो इसे जानता है सो अमृत होता है ।। २५ ।। मैं स्वभाव- से इस जगत्को वर्तमानके समान देखता हूँ, समयपर महायोगेश्वर भगवान् इसको कहते हैं ।। २६ ।।

योगं संप्रोच्यते योगी मायी शास्त्रेषु सूरिभिः ।। योगेश्वरोऽसौ भगवान्महादेवो महान्प्रभुः ।। २७ ।। महत्त्वात्सर्वसत्त्वानां परत्वा- त्परमेश्वरः ।। प्रोच्यते भगवान्ब्रह्मा महान्ब्रह्ममयो यतः ।। २८ ।। वही योगी मायी शास्त्रोंमें योगरूपसे कहा जाता है वह योगरूपसे कहा जाता है वह योगेश्वर भगवान् महायोगेश्वर महाप्रभु है ।। २७ ।। महत्तत्त्व होनेसे सब जीवोंका पर होनेसे परमेश्वर है, वह महान् ब्रह्ममय होनेसे ब्रह्मा कहलाते हैं ।। २८ ।।

यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।। सोऽविकंपेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।। २९ ।। सोऽहं प्रेरयिता देवः परमा- नन्दमाश्रिताः ।। तिष्ठामि योगी सततं यस्तद्वेद स वेदवित् ।। ३० ।। जो इस प्रकार मुझको महायोगेश्वर जानता है वह अविकम्पयोगसे युक्त होता है इसमें सन्देह नहीं ।। २९ ।। सो मैं परमानन्दरूपसे प्रेरणा किया हुआ सबके आश्रित हूँ नित्ययोगमें स्थित रहता हूँ जो इसको जानता है वह वेदको जानता है ।। ३० ।।

इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम् ।। प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिका याहिताग्नये ।। ३१ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे भक्तियोगो नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।

यह गुप्त ज्ञान सब वेदोंका सम्मत है, यह प्रसन्नचित्तवाले धर्मात्माओंको देना चाहिये जो अग्निहोत्र करनेवाले हैं ।। ३१ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामयणे वाल्मी. अद्भु. भाषाटी. भक्तियोगो नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७५)

चतुर्दश सर्ग

रामचन्द्र और महावीरजीका संवाद

सर्वलोकैकनिर्माता सर्वलोकैकरक्षिता ॥ सर्वलोकैकसंहर्ता सर्वा- त्माहं सनातनः ॥ १ ॥ सर्वेषामेव वस्तूनामंतर्यामी पिता ह्यहम् ॥ मय्येवान्तःस्थितं सर्वं नाहं सर्वत्र संस्थितः ॥ २ ॥

सब लोकोंका निर्माण करनेवाला सब लोकका रक्षक, सर्वलोकका संहार- कर्त्ता, सर्वात्मा, सनातन मैं हूँ ॥ १ ॥ सब वस्तुओंका अन्तर्यामी पिता हूँ मेरे अन्तःकरणमें सब स्थित हैं मैं नहीं ॥ २ ॥

भवता चाद्भुते दृष्टं यत्स्वरूपं तु मामकम् ॥ ममैषा ह्युपमा वत्स मायया दर्शिता मया ॥ ३ ॥ सर्वेषामेव भावानांमंतरा समवस्थितः ॥ प्रेरयामि जगत्सर्वं क्रियाशक्तिरियं मम ॥ ४ ॥

तुमने जो मेरा अद्भुतरूप देखा है हे वत्स ! मायाद्वारा मैंनेही यह रूप निर्माण किया है ॥ ३ ॥ सब भावोंके अन्तरमें में ही स्थित हूँ, सब जगत्को मैं प्रेरणा करता हूँ, यह मेरी क्रियाशक्ति है ॥ ४ ॥

ययेदं चेष्टते विश्वं मत्स्वभावानुवर्ति च ॥ सोऽहं काले जगत्कृत्स्नं करोमि हनुमन् किल ॥ ५ ॥ संहराम्येकरूपेण द्विधावस्था ममैव तु ॥ आदिमध्यांतनिर्मुक्तो मायातत्त्व प्रवर्तकः ॥ ६ ॥

यह जगत् मेरे द्वारा चेष्टा किया जाता है और मेरे स्वभावका अनुवर्तन करनेवाला है, हे हनुमन् ! सो मैं समयपर सब जगत्को निर्माण करता हूँ ॥ ५ ॥ एक रूपसे कहता हूँ, यह दो प्रकारसे मेरीही अवस्था है, आदि मध्य अन्तरसे रहित तत्त्वका प्रवृत्त करनेवाला मैं ही हूँ ॥ ६ ॥

क्षोभयामि च सर्गादौ प्रधानपुरुषावुभौ ॥ ताभ्यां संजायते सर्वं संयुक्ताभ्यां परस्परम् ॥ ७ ॥ महदादिक्रमेणैव मम तेजो विजृंभि- तम् ॥ यो हि सर्वजगत्साक्षी कालचक्रप्रवर्तकः ॥ ८ ॥

सृष्टिकी आदिमें मैं प्रधान और पुरुषको क्षुभित करता हूँ, उनके परस्पर संयुक्त होनेसे यह जगत् होता है ॥ ७ ॥ महदादिके क्रमसे यह मेरा तेज फैल रहा है, जो सब जगत्का साक्षी कालचक्रका प्रवृत्त करनेवाला है ॥ ८ ॥

(७६) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-

हिरण्यगर्भो मार्तंडः सोऽपि मद्देहसंभवः ॥ तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम् ॥ ९ ॥ दत्तवानात्मजावेदान् कल्पादौ चतुरः किल ॥ स मन्नियोगतो ब्रह्मा सदा मद्भाव भावितः ॥ १० ॥ हिरण्यगर्भ मार्तण्ड है वह मेरे देहसे प्रगट है, उसको मैंने अपना दिव्य ऐश्वर्यको सनातन ज्ञानयोग ॥ ९ ॥ और कल्पकी आदिमें चारों वेदोंको दिया है, वह मन्नियोगसे भगवान् सदा सद्भावमें स्थित हुए ॥ १० ॥

दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम् ॥ स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित् ॥ ११ ॥ भूत्वा चतुर्मुखः सर्वं सृजत्येवात्मसं- भवः ॥ योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः ॥ १२ ॥ उस मेरे दिव्य ऐश्वर्यको सदा धारण करते हैं, यह सबके निर्माता सबके ज्ञाता मेरी आज्ञासे ॥ ११ ॥ चतुर्मुखी होकर सृष्टिको निर्माण करते हैं, जो नारायण अनन्त लोकोंके प्रभु अविनाशी हैं ॥ १२ ॥

ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम् ॥ योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः ॥ १३ ॥ मदाज्ञयाऽसौ सततं संहरत्येव मे तनुः ॥ हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ॥ १४ ॥ वह मेरीही परमा मूर्ति होकर जगत्का पालन करते हैं, जो सब भूतोंका अन्तक रुद्र कालात्मा प्रभु है ॥ १३ ॥ वह मेरा शरीर मेरी आज्ञासे ही यह सब संहार करता है, देवताओंके निमित्त हव्य वहन करता हुआ ॥ १४ ॥

पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः ॥ भुक्तमाहारजातं यत्पचत्येतदहर्निशम् ॥ १५ ॥ वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियो- गतः ॥ यो हि सर्वांभसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः ॥ १६ ॥ अग्नि जो पाक करता है वह भी मेरी शक्तिसे प्रेरित हुआ करता है, जो कुछ भोजन किया आहार है मेरे बलसे जठराग्नि उसे पचाती है ॥ १५ ॥ भगवान् वैश्वानर अग्नि मेरी आज्ञासे यह करता है, जो सम्पूर्ण जलोंकी योनि वरुणदेवता है ॥ १६ ॥

स संजीवयते सर्वमीशस्यैव नियोगतः ॥ योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवो निरंजनः ॥ १७ ॥ मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि ॥ योऽपि संजीवनो नॄणां देवानाममृताकरः ॥ १८ ॥

सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)

सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)

वह ईशके नियोगसे ही सबको संजीवित करता है जो निरंजन देव जीवोंके बाहर भीतर स्थित है ॥ १७ ॥ मेरीही आज्ञासे यह प्राणियोंके शरीरको भरण पोषण करता है जो देवताओंके संजीवनमें अमृत रूप है ॥ १८ ॥]

सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते ॥ यः स्वभासा जगत्कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा ॥ १९ ॥ सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयंभुवः ॥ योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः ॥ २० ॥

चन्द्रमा मेरेही आज्ञासे वर्तता है, जो स्वभावसे सारे जगत्को प्रवृत्त कर देता है ॥ १९ ॥ सूर्य ब्रह्माजीकी आज्ञासे वृष्टि करता है, जो संपूर्ण जगत्का शास्ता नियमसे साधुतापूर्वक वर्तता है, सब देवताओंका अधिपति है ॥ २० ॥

यज्ञानां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह ॥ २१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगत ॥ योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां संप्रदायकः ॥ २२ ॥

वह देव यज्ञोंके फलका देनेवाला मेरी आज्ञासे वर्तता है, असाधुओंका शास्ता नियमसे वर्तता है ॥ २१ ॥ वैवस्वत यमदेव मेरीही आज्ञासे वर्तता है, जो सम्पूर्ण धनाध्यक्ष और धनोंके देनेवाले हैं ॥ २२ ॥

सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा ॥ यः सर्व रक्षसां नाथस्तापसानां फलप्रदः ॥ २३ ॥ मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा ॥ वैतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः ॥ २४ ॥

वह कुवेरभी ईश्वरकी आज्ञासे सदा वर्तता हैं जो सम्पूर्ण राक्षसोंका नाथ तपस्वियोंका फल देनेवाला है ॥ २३ ॥ वह निर्ऋतिभी सदा मेरी आज्ञासे वर्तता है, वेतालगण भूतोंका स्वामी भोगफल देनेवाला है ॥ २४ ॥

ईशानः सर्वभक्तानां सोऽपि तिष्ठेन्ममाज्ञया॥यो वामदेवौंगिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः ॥ २५ ॥ रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः ॥ २६ ॥

सब भक्तोंके ईशानभी मेरी आज्ञासे वर्तता है,जो वामदेव आंगिरस रुद्रगणोंका अग्रणी शिष्य है ॥ २५ ॥ नित्य योगियोंका रक्षक है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो सर्व जगत्के पूज्य विघ्नकारक गणेशजी हैं ॥ २६ ॥

विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात्किल ॥ योऽपि वेदविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः ॥ २७ ॥ स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयंभूप्रतिचोदितः ॥ ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः ॥ २८ ॥

(७८) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-

विनायक धर्मनेता है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ देवताओंके सेनापति प्रभु हैं ।। २७-।। वह स्कन्दभी प्रभुकी आज्ञामेंही वर्तते हैं, जो प्रजाओंके पति मरीच्यादि महर्षि हैं ।। २८ ।।

सृजंति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ।। या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम् ।। २९ ।। पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात् ।। वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती ।। ३० ।।

विविधलोक नारायणकी आज्ञासेही रचते हैं, जो लक्ष्मी सब भूतोंको महाश्री देती है ।। २९ ।। वह नारायणकी पत्नी मेरी आज्ञासे वर्तती है, जो देवी सरस्वती विपुल वाणी देती है ।। ३० ।।

सापीश्वरनियोगेन चोदिता संप्रवर्तते ।। याऽशेष पुरुषाघोरान्नरकात्तारयत्यपि ।। ३१ ।। सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी ।। पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी ।। ३२ ।। यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्धच नानुगा ।। योजनंतो महिमानंतः शेषोऽशेषा ऽमरप्रभुः ।। ३३ ।। दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः ।। योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः ।। ३४ ।।

वहभी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित हो वर्तती है जो अनेक पुरुषोंको नरकसे तारती है ।। ३१ ।। वह सावित्री देवी वशीभूत होतीहै जो पार्वती परमादेवी ब्रह्मविद्याकी विधान करनेवाली है ।। ३२ ।। ध्यान करनेवालोंको फल मेरेही आज्ञासे देती है जो अनन्त महिमावाले शेषजी देवाधिपति हैं।।३३।। वहभी देवदेवकी आज्ञासे पृथिवीको शिरपर धारण करते हैं जो नित्य संवर्तक अग्नि वडवारूपसे स्थित है ।। ३४ ।।

पिबत्यखिलमंभोधिमीश्वरस्य नियोगत ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ ।। ३५ ।। अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छासनमधिष्ठिताः ।। गंधर्वा उरगा यक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः ।। ३६ ।।

वहभी ईश्वरहीकी आज्ञासे सब सागरको शोषता है, आदित्य वसु रुद्र मरुत अश्विनीकुमार ।। ३५ ।। और भी सब देवता मेरे शासनमें स्थित रहते हैं, गन्धर्व उरग यक्ष सिद्ध साध्य चारण ।। ३६ ।।

भूतरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयंभुवः ।। कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षणाः ।। ३७ ।। ऋत्वब्दमासपक्षाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापते ।। युगमन्वंतराण्य्येव ममतिष्ठंति शासने । ३८।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)

भूत राक्षस पिशाच सब स्वयंभूकी आज्ञामें स्थित हैं कला काष्ठा निमेष मुहूर्त दिवस ॥ ३७ ॥ ऋतु वर्ष महीना पखवारा युग मन्वन्तर सब परमात्माके शासनमें स्थित हैं ॥ ३८ ॥

पराश्चैव परार्द्धाश्च कालभेदास्तथापरे ॥ चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ३९ ॥ नियोगादेव वर्तंते सर्वाण्येव स्वयंभुवः ॥ पत्तनानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात् ॥ ४० ॥

परा परार्द्ध जितने कालके भेद हैं, चार प्रकारके भूत स्थावर चर ॥ ३९ ॥ सब स्वयंभूके नियोगसे वर्तते हैं, सब पत्तन और भुवन उसीकी आज्ञासे वर्तते हैं ॥ ४० ॥

ब्रह्मांडानि च वर्तंते देवस्य परमात्मनः ॥ अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्मांडानि महाज्ञया ॥ ४१ ॥ प्रवृत्तानि पदार्थाघैः सहितानि समं ततः ॥ ब्रह्मांडानि भविष्यंति सह वस्तुभिरात्मगैः ॥ ४२ ॥

असंख्य ब्रह्माण्ड भी उस परमात्माकी आज्ञासे ही वर्तते हैं ॥ ४१ ॥ सब प्रवृत्त हुए पदार्थसमूहोंके साथै ब्रह्मांड अपनी २ वस्तुओंके साथ होते हैं ॥ ४२ ॥

हरिष्यंति सहैवाज्ञां परस्य परमात्मनः ॥ भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥ ४३ ॥ भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगान्मम वर्तते ॥ याऽशेषसर्वजगतां मोहिनी सर्वदेहिनाम् ॥ ४४ ॥

वह सब परमात्माकी आज्ञाको वहन करते हैं, भूमि जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि ॥ ४३ ॥ भूतादि आदि प्रकृति यह सब मेरी आज्ञासेही वर्तते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् और देहधारियोंकी मोहिनी है ॥ ४४ ॥

मायापि वर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः ॥ विधूय मोहकलिलं यथा पश्यति तत्पदम् ॥ ४५ ॥ सापि विद्या महेशस्य नियोगाद्वशवर्तिनी ॥ बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत् ॥ ४६ ॥

मायाभी नित्य ईश्वरकी आज्ञासे वर्तती है जिसके द्वारा मोहको दूर कर तत्पद देखा जाता है ॥ ४५ ॥ यह विद्या महेशके नियोगसे वशवर्तिनी है, बहुत कहनेसे क्या है यह जगत् मेरी शक्त्यात्मक हैं ॥ ४६ ॥

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं व्रजेत् ॥ अहंहि भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः ॥ ४७ ॥ परमात्मा परंब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ इत्येतत्परमं ज्ञानं भवते कथितं मया ॥ ४८ ॥

(८०)अद्भुतरामायणंचतुर्दश-

मुझसे यह जगत् पूर्ण होकर अन्तमें लय करलिया जाता है, मैंही भगवान् ईश स्वयंज्योति सनातन हूँ ॥ ४७ ॥ परमात्मा परब्रह्म हूँ मुझसे अधिक कोई नहीं है यह तुमको परज्ञान मैंने कथन किया है ॥ ४८ ॥

ज्ञात्वा विमुच्यते जंतुर्जन्म संसारबंधनात् ॥ मायामाश्रित्य जातोऽहं गृहे दशरथस्य हि ॥ ४९ ॥ रामोऽहं लक्ष्मणो ह्येष शत्रुघ्नो भरतोऽपि च ॥ चतुर्धा संप्रभूतोऽहं कथितं तेऽनिलात्मज ॥ ५० ॥

इसको जानकर प्राणी संसारके जन्ममरणसे छूट जाता है, मायाके आश्रित हो, मैं दशरथके यहां जन्म ले आया हूँ ॥ ४९ ॥ मैं ही राम लक्ष्मण शत्रुघ्न और भरत यह चार प्रकारसे अपने रूपको प्रकटकर स्थित हूँ ॥ ५० ॥

मायास्वरूपं च तव कथितं यत्प्लवंगम॥ *कृपया तद्धृदा धार्यं न विस्मर्त्तव्यमेव हि ॥ ५१ ॥ येनेयं पठ्यते नित्यं संवादो भवतो मम ॥ जीवन्मुक्तो भवेत्सोऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥

हे महावीर ! जो मैंने यह तुमसे रूप कथन किया है यह श्रद्धासे हृदयमें धारण करना भूलना नहीं ॥ ५१ ॥ जो यह हमारा संवाद नित्य पढेंगे वह जीवन्मुक्त हो सब पापोंसे छूट जायँगे ॥ ५२ ॥

श्रावयेद्वा द्विजाञ्छुद्धांन्ब्रह्मचर्यपरायणान् ॥ यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ ५३ ॥ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्म लोके महीयते ॥ ५४ ॥

जो ब्रह्मचर्यमें परायण ब्राह्मणोंको सुनावेंगे, वा जो इसका अर्थ विचारेंगे, वे परमगतिको प्राप्त होंगे ॥ ५३ ॥ जो अभियुक्त दृढव्रत हो इसे नित्य सुनेंगे वह सब पापरहित हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होंगे ॥ ५४ ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः । श्रोतव्यश्चापि मंतव्यो विशेषाद्ब्राह्मणैः सदा ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भग-
वद्धनुमत्संवादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस कारण सब प्रयत्नोंसे विद्वानोंको यह पढना और मनन करना चाहिये और विशेष कर ब्राह्मणोंको विचारना चाहिये ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा० वाल्मीकीये आदि० अद्भु० भाषाटीकायां भगवद्धनुमत्सं-
वादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥


* श्रद्धया इति पाठ ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)

पंचदश सर्ग

हनुमान्‌जीका रामचन्द्रकी स्तुति करना

ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना बद्धांजलिर्वायुसुतो महात्मा ॥
ओंकारमुच्चार्य विलोक्य देवमंतः शरीरे निहितं गुहायाम् ॥ १ ॥
रामं महात्मानम कुंठशक्तिं सनंदमुख्यैः स्तुतमप्रमेयम् ॥ पुष्टाव च
ब्रह्ममयैर्वचोभिरानंदपूर्णायितमानसः सन् ॥ २ ॥

वह महात्मा महावीरजी हृदयमें ध्यान कर शिरसे प्रणामकर हाथजोडकर ओंकारका उच्चारण देवको देखकर जो प्राणियोंके हृदय की गुहामें स्थित हैं ॥ १ ॥ राम महात्मा अकुंठशक्ति सनन्दादि मुख्योंसे स्तुतिको प्राप्त होते हुए, अप्रमेय भगवान्‌को आनन्दसे पूर्णमन होकर ब्रह्ममय वचनोंसे प्रसन्न स्तुति करने लगे ॥ २ ॥

त्वामेकमीशं पुराणं प्राणेश्वरं राममनन्तयोगम् ॥ नमामि सर्वान्तर-
सन्निविष्टं प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम् ॥ ३ ॥ पश्यंति त्वां मुनयो
ब्रह्मयोनिं दांताः शांता विमलं रुक्मवर्णम् ॥ ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे
शरीरे कविं परेभ्यः परमं परं च ॥ ४ ॥

तुमही एक ईश पुरुष पुराण प्राणेश्वर अनन्तयोग सबके अन्तरमें स्थित हो, प्रचेतस पवित्र ब्रह्ममय पवित्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ ब्रह्मयोनि आपको मुनिजन देखते हैं आप दान्त शान्त विगल रुक्मवर्ण हो, आत्मामें स्थित, परेसे परे तुमको महात्मा देखते हैं ॥ ४ ॥

त्वत्तःप्रसूता जगतःप्रसूतिः सर्वात्मसृष्टेः परमाणुभूतः ॥ अणो-
रणीयान्महतोमहीयांस्त्वामेव सर्वे प्रवदंति संतः ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भो
जगदंतरात्मा त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः ॥ स जायमानो भवता
विसृष्टो यथाविधानं सकलं ससर्ज ॥ ६ ॥

आपसे सारा जगत् उत्पन्न होता है, आप सर्वात्मा, सृष्टिके परमात्मा भूत हो, सूक्ष्म, बडेसे बड़े, आपको सन्त महात्मा कहते हैं ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भ जगत्के अन्तरात्मा आप पुराणपुरुषसे सब जगत् उत्पन्न होता है, विराटने -

(८२) अद्भुतरामायण [पञ्चदश-

आपसेही उत्पन्न होकर सब जगत्को उत्पन्न करके सब विधानको उत्पन्न किया है ॥ ६ ॥

त्वत्तो वेदाः सकलाः संप्रवृत्तास्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभंते । पश्यामि त्वां जगतो हेतुभूतं नृत्यं तं स्वे हृदये संनिविष्टम् ॥ ७ ॥ त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्म चक्रं मायावी त्वं जगतामेकनाथः ॥ नमामि त्वां शरणं संप्रपद्ये योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम् ॥ ८ ॥

तुमसे ही सब वेद उत्पन्न हुए हैं, आपमें ही अन्तमें स्थितिको प्राप्त होते हैं, आपको जगत्का हेतुभूत में देखता हूँ, मेरे हृदयमें आप सदैव स्थित हों ॥ ७ ॥ आपहीसे सब ब्रह्माण्डचक्र घुमाया जाता है, आपही जगत्के एक नाथ हो, मैं आपके शरणमें प्राप्त हूँ, आप योगात्मा चित्पति दिव्य नृत्य रूप हो ॥ ८ ॥

पश्यामि त्वां परमाकाशमध्ये नृत्यंतं ते महिमानं स्मरामि ॥ सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं ब्रह्मानंदमनुभूयानुभूय ॥ ९ ॥ ओंकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं त्वामक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम् ॥ त्वं त्वां सत्यंप्रवदंतीह संतः स्वयंप्रभं भवतो यत्प्रकाशम् ॥ १० ॥

परमाकाशके मध्यमें विराजमान आपको देखता हूं, आप सर्वात्मा अनेक प्रकारसे संनिविष्ट ब्रह्मानन्दको अनुभव करके आपको स्मरण करता हूँ ॥ ९ ॥ ओंकार आपका वाचक मुक्तिबीज है, आप अक्षर प्रकृतिमें गूढरूप हैं, उसे आप सत्यरूपका सन्त वर्णन करते हैं, आप स्वयं रूप प्रकाशमान हो ॥ १० ॥

स्तुवंति त्वां सततं सर्वदेवा नमंति त्वामृषयः क्षीणदोषाः ॥ शांतात्मानः सत्यसंधं वरिष्ठं विशंति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः ॥ ११ ॥ एको वेदो बहुशाखो ह्यनंतस्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम् ॥ संवेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्नास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

आपकी निरन्तर सब देवता स्तुति करते हैं, क्षीणदोष ऋषि आपको नमस्कार करते हैं, शान्ताराम सत्यसन्ध वरिष्ठ आपमें ब्रह्मनिष्ठ यति प्रवेश करते हैं ॥ ११ ॥ एकही वेद बहु शाखावाला अनन्त है, आपको ही एक रूप बोधित करते हैं, जानने योग्य आपकी शरणमें जो हुए हैं उन्हींको सदा शान्ति है अन्योंको नहीं ॥ १२ ॥

भवानीशोऽणिमादिमां स्तेजोराशिर्ब्रह्महृद्विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः ॥ आत्मानंदं चानुसूयानुशेते स्वयंज्योतिवचनो नित्यमुक्तः ॥ १३ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

एको देवस्त्वं करोषीह विश्वं त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः ॥ त्वय्ये- वास्ते विलयं विदतीदं नमामि त्वां शरणं त्वां प्रपन्नः ॥ १४ ॥ भवानीपति अणिमादिमान तेजकी राशि विश्व परमेष्ठी वरिष्ठ आत्मा- नन्द अनुभव करता स्वयंज्योति वचन नित्य सबमें स्थित है ॥ १३ ॥ एकही आप देव सब विश्वको करते हो आप अखिल विश्वरूपकी पालना करते हो अन्तमें विश्व आपहीमें लीन होता है, मैं शरणमें प्राप्त हुआ आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥

त्वामेकमाहुः परमं च रामं प्राणं वहंतं हरिमित्रमीशम् ॥ इन्दूं मृत्युमनलं चेकितानं धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ १५ ॥ त्वमक्षरं परं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ त्वमव्ययः शाश्वतो धर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ १६ ॥

हे राम आपहीको परम प्राणदाता हरि मित्र ईश कहते हैं, चन्द्रमा पवन चेकितान धाता आदित्य अनेकरूप हो ॥ १५ ॥ आपही परम, अक्षर जानने योग्य हो, आपही इसके परिधान हो, आपही अविनाशी शाश्वत धर्मके गोप्ता सनातन उत्तम पुरुष हो ॥ १६ ॥

त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं त्वमेव रुद्रो भगवानपीशः ॥ त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ १७ ॥ त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराणमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ चिन्मात्र- मव्यक्तमर्चिन्त्यरूपं खं ब्रह्मशून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ १८ ॥

आपही विष्णु चतुरानन हो आप रुद्र भगवान् ईश हो, आप विश्वकी नाभी प्रकृति प्रतिष्ठा सर्वेश्वर परमेश्वर हो ॥ १७ ॥ आपही पुराणपुरुष एक सूर्यवर्ण अन्धकार से परे हो चिन्मात्र अव्यक्त अचिन्त्यरूप खं ब्रह्म शून्य प्रकृति निगुण हो ॥ १८ ॥

यदन्तरा सर्वमिदं विभाति यदव्ययं निर्मलमेकरूपम् ॥ किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेकं यदंतरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ १९ ॥ योगेश्वरं रूपमन- न्तशक्तिं परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम् ॥ नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां प्रसीद भूताधिपते प्रसीद ॥ २० ॥

जिसके अन्तरमें यह सब जगत् प्रकाश करता है जो अविनाशी निर्मल एकरूप है, यह आपका रूप अचिन्त्य तत्त्ववाला है, और प्रकाशवान् है ॥ १९ ॥

(८४) अद्भुतरामायण [ पंचदश-

योगेश्वररूप अनन्तशक्ति परायण ब्रह्मतनु पवित्रको शरणकी इच्छावाले हम सब नमस्कार करते हैं, हे भूताधिपते ! प्रसन्न हूजिये ॥ २० ॥

त्वत्पादपद्मस्मरणादशेषं संसारबीजं विलयं प्रयाति ॥ मनो नियम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसाद्याम्येकरसं भवंतम् ॥ २१ ॥ नमोऽस्तु रामाय भवोद्भवाय कालाय सर्वैकहराय तुभ्यम् ॥ नमोऽस्तु रामाय कपर्दिने ते नमोऽग्नये दर्शय रूपमग्र्यम् ॥ २२ ॥

आपके चरणकमलके स्मरणसे सब संसारके बीज जन्ममरण नष्ट हो जाते हैं, मनको रोक कायाको प्रणिधान कर एकरस आपको मैं प्रसन्न करता हूं ॥ २१ ॥ संसारके उत्पत्तिकारण, सबके उत्पन्न करनेवाले कालरूप एक हरनेवाले आपको प्रणाम है, राम कदर्पि अग्निरूप आपको प्रणाम है, आप अग्न्यरूप हो ॥ २२ ॥

ततः स भगवान्रामो लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवत्स्वयम् ॥ २३ ॥ स तस्य स्तवमाकर्ण्य वायुपुत्रस्य धीमतः ॥ प्राह गम्भीरया वाचा हनूमन्तं रघूत्तमः ॥ २४ ॥

तब भगवान् राम अपना लक्ष्मणसहित रूप छिपाकर प्रकृतिमें स्थित होते हुए ॥ २३ ॥ तब वायुपुत्रका यह वचन सुनकर रामचन्द्र गम्भीर वचनसे कहने लगे ॥ २४ ॥

स्तोष्यांति येऽनया स्तुत्या ते यास्यंति परां गतिम् ॥ स्थिरो भव हनूमंस्त्वं कार्यमौपायिकं कुरु ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे हनुमत्कृतस्तवराजे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

जो इस स्तोत्रसे स्तुति करेंगे वे परमगतिको प्राप्त होंगे, हे महावीर ! आप स्थित होकर उपाययुक्त कार्य करो ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मी. आदि. अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रभाषाटीकायां हनुमत्कृतस्तवराजे पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८५)

षोडश सर्ग

रामचन्द्रका रावणको मार राज्य पाना

रामः प्रत्याह च पुनर्हनूमन्तं महाद्युतिः ।। रक्षसा मे हृता भार्या रावणेन दुरात्मना ।। १ ।। सुग्रीवेण रांमं सख्यं कारयाद्य-प्लवङ्गम ।। हसित्वा मधुरं वीरो हनूमानब्रवीद्वचः ।। २ ।।

तब फिर रामचन्द्रजी महावीरसे कहने लगे, कि हे महावीर ! दुरात्मा रावणने हमारी भार्याको हरण कर लिया है ।। १ ।। हे वानरश्रेष्ठ ! सुग्रीवके साथ हमारी मित्रता करा दो, तब मधुर हँसकर महावीरजी कहने लगे ।। २ ।।

तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् ।। विश्वं यथेदमाभाति तथेदं प्रतिभाति मे ।। ३ ।। तथापि प्रभुणादिष्टं कार्यमेव हि किंकरैः ।। इत्युक्त्वा हनुमांस्तूर्णं प्रसन्नेनांतरात्मना ।। ४ ।।

हे महाभाग ! आपकी भार्याको रावणने हरण किया है जैसा यह विश्व विदित होता है इसी प्रकारसे हो ।। ३ ।। तौभी जो आपने आज्ञा दी है वह दासोंको अवश्य करनी चाहिये, यह कह प्रसन्न हो शीघ्रतासे महावीर ।। ४ ।।

आरोप्य स्कंधयोर्वीरौ सुग्रीवांतिकमानयत् ।। तौ दृष्ट्वा पुरुष-व्याघ्रो सुग्रीवो वानरोत्तमः ।। ५ ।। वालिनं तं जितं मेने प्राप्त मेने रुमां स्त्रियम् ।। सख्यं चकाररामेण दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत् ।। ६ ।।

दोनोंको कंधेपर चढाकर सुग्रीवके समीप ले आये, वानरोत्तम सुग्रीव उन दोनोंको देखकर ।। ५ ।। अपनी रुमास्त्रीको प्राप्त और वालीको जीता हुआ मानने लगा, और अपने भाग्यकी सराहना कर रामके साथ मित्रता की ।। ६ ।।

वालिनो विलयं कृत्वाराज्यं चास्मै निवेद्य च ।। नानादेश्यान्वानरांश्च आनाय्य रघुनन्दनौ ।। ७ ।। हनूमदंगदारूढौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।। सिंधौस्तटं तौ ययतुः सुग्रीवेण सह प्रभुः ।। ८ ।।

वालीको मार सुग्रीवको राज्य दे, देश-देशान्तरोंसे वानरोंको बुलाया ।। ७ ।। हनुमान् और अंगदके ऊपर राम लक्ष्मण चढकर सुग्रीवके साथ सागरके तटपर गये ।। ८ ।।

( ८६ ) अद्भुतरामायण षोडश-

पारेसमुद्रं लंकां च निरूप्याह रघू त्तमः ।। वानरा हि यथा यांति लंकांलक्ष्मण तत्कुरु ।। ९ ।। रामस्य वचनं श्रुत्वा समुद्रं प्राह लक्ष्मणः । सिंधो त्वं स्तभ यात्मानं यथा यास्यति वानराः ।।१०।।

सागरके पार लंकापुरीको देखकर रामचन्द्र कहने लगे, हे लक्ष्मण ! जिस प्रकारसे हम लंकाके निकट पहुँचे तैसा करो ॥९॥ रामचन्द्रके वचन सुनकर लक्ष्मण समुद्रसे कहने लगे, हे सागर ! अपनी आत्माको स्तंभित कर तो तेरे ऊपर वानर चले जायँगे ॥ १० ॥

सिन्धुस्तु प्रभुणादिष्टं न शुश्राव यदा। तदा लक्ष्मणः क्रोधसंदीप्तः पपाताब्धेर्जलांतरे ।। ११ ।। तद्देह-वह्निशिखया शुशोष जलधेर्जलम्। यादांसि स्थलभाजीनि देवा भीत दिशोऽद्रवन् ।। १२ ।।

जब सागर प्रभुके वचनोंको न सुनता हुआ तब लक्ष्मणजी क्रोधकर सागरमें कूद पडे ॥ ११ ॥ और अपने देहकी ज्वालासे सागरका जल सोखने लगे, सब जलजीव व्याकुल होगये और देवता भयभीत हो दिशाओंके अन्तमें पलायन कर गये ॥ १२ ॥

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं वानरा विस्मयं गताः । हाहाकारं प्रचुक्रुस्ते लोकाः सर्व चराचराः ।। १३ ।। ऋषयो भूतसंघाश्च स्वस्तिस्वस्तीति चाब्रुवन् । राघवो लक्ष्मणं प्राह नैतद्युक्तं त्वया कृतम् ।। १४ ।।

उस महा आश्चर्यको देखकर वानर आश्चर्यको प्राप्त हुए और सब चराचर लोक हाहाकार करने लगे ॥ १३ ॥ ऋषि और दूसरे प्राणी स्वस्ति २ कहने लगे तब राम लक्ष्मणसे कहने लगे यह तुमने अच्छा नहीं किया ॥ १४ ॥

पुनरेनं पूरयाम सीताविरहजेन वै । अश्रुणेति प्रतिज्ञाय तं तथा-पूरयत्प्रभुः ।। १५ ।। रामोपरि तदाकाशात्पुष्पवृष्टिः पपात ह लोकाश्च सुस्थिता आसंश्चिन्तयित्वा पुनः पुनः ।। १६ ।।

अब सीताके वियोगसे उत्पन्न हुए आंसुओंसे फिर इसको पूर्ण करूँगा तब यह कहकर प्रभुने उसको पूर्ण कर दिया ॥ १५ ॥ तब आकाशसे रामचन्द्रके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, लोक स्वस्थ हुए और बारम्बार विचार करने लगे ॥ १६ ॥

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सिंधुना संस्तुतो रामः सेतुं सिंधौ बबंध ह । लंकायां रावणं हत्वा सगणं मधुसूदनः ॥ १७ ॥ आरोप्य पुष्पकं सीतां विभीषणसहायवान् । अयोध्यांमगमद्रामः सुग्रीवहनुमदादिभिः ॥ १८ ॥

फिर सिंधुसे स्तुतिको प्राप्त हो रामचन्द्रने सागरमें सेतु बांधा और लंकापुरी जाय गणोंसहित रावणको मारकर ॥ १७ ॥ विभीषणको साथ ले पुष्पक विमानमें सीताको बैठाया सुग्रीव हनुमदादिके सहित रामचन्द्र अयोध्याको चले ॥ १८ ॥

आनंदे योजयामास भ्रातॄन्मातॄंश्च बांधवान् । राजा सर्वस्य लोकस्य प्रजानामनुरंजनः ॥ १९ ॥ रामं राजानमासाद्य तिर्यञ्चोऽपि ययुर्मुदम् । देवदुन्दुभयो नेदुः सर्वदा हि नभस्तले । ववृषुर्जंलदाः काले पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकायां रामराज्योपलंभनं नाम षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

भ्राता माता और बांधवोंको आनन्दमें युक्त किया, वह सब लोकके राजा प्रजाके आनन्द देनेवाले हुए ॥ १९ ॥ रामचन्द्र राजाको प्राप्त होकर पशु पक्षी भी प्रसन्न हुए, सर्वदा आकाशमें देवदुन्दुभी बजने लगी, समयपर मेघवर्षा और फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामराज्योपलंभनं नामषोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


सप्तदश सर्ग

जानकीवचन सहस्रमुख रावणका वृत्तान्त

प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां क्षये कृते ॥ आजग्मुर्मुनयस्तत्र राघवं प्रति नंदितुम् ॥ १ ॥ विश्वामित्रो यवक्रीतो रैभ्यश्चच्यवन एव च ॥ कण्वश्च मुनिशार्दूलो ये पूर्वा दिशमाश्रिताः ॥ २ ॥

जिस समय राक्षसोंका वध हो चुका और रामचन्द्रको राज्य मिला तब रामचन्द्रको अभिनन्दन करनेके निमित्त मुनिजन आये ॥ १ ॥ विश्वामित्र-