भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)

वह ईशके नियोगसे ही सबको संजीवित करता है जो निरंजन देव जीवोंके बाहर भीतर स्थित है ॥ १७ ॥ मेरीही आज्ञासे यह प्राणियोंके शरीरको भरण पोषण करता है जो देवताओंके संजीवनमें अमृत रूप है ॥ १८ ॥]

सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते ॥ यः स्वभासा जगत्कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा ॥ १९ ॥ सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयंभुवः ॥ योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः ॥ २० ॥

चन्द्रमा मेरेही आज्ञासे वर्तता है, जो स्वभावसे सारे जगत्को प्रवृत्त कर देता है ॥ १९ ॥ सूर्य ब्रह्माजीकी आज्ञासे वृष्टि करता है, जो संपूर्ण जगत्का शास्ता नियमसे साधुतापूर्वक वर्तता है, सब देवताओंका अधिपति है ॥ २० ॥

यज्ञानां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह ॥ २१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगत ॥ योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां संप्रदायकः ॥ २२ ॥

वह देव यज्ञोंके फलका देनेवाला मेरी आज्ञासे वर्तता है, असाधुओंका शास्ता नियमसे वर्तता है ॥ २१ ॥ वैवस्वत यमदेव मेरीही आज्ञासे वर्तता है, जो सम्पूर्ण धनाध्यक्ष और धनोंके देनेवाले हैं ॥ २२ ॥

सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा ॥ यः सर्व रक्षसां नाथस्तापसानां फलप्रदः ॥ २३ ॥ मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा ॥ वैतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः ॥ २४ ॥

वह कुवेरभी ईश्वरकी आज्ञासे सदा वर्तता हैं जो सम्पूर्ण राक्षसोंका नाथ तपस्वियोंका फल देनेवाला है ॥ २३ ॥ वह निर्ऋतिभी सदा मेरी आज्ञासे वर्तता है, वेतालगण भूतोंका स्वामी भोगफल देनेवाला है ॥ २४ ॥

ईशानः सर्वभक्तानां सोऽपि तिष्ठेन्ममाज्ञया॥यो वामदेवौंगिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः ॥ २५ ॥ रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः ॥ २६ ॥

सब भक्तोंके ईशानभी मेरी आज्ञासे वर्तता है,जो वामदेव आंगिरस रुद्रगणोंका अग्रणी शिष्य है ॥ २५ ॥ नित्य योगियोंका रक्षक है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो सर्व जगत्के पूज्य विघ्नकारक गणेशजी हैं ॥ २६ ॥

विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात्किल ॥ योऽपि वेदविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः ॥ २७ ॥ स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयंभूप्रतिचोदितः ॥ ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः ॥ २८ ॥