भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(७६) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-

हिरण्यगर्भो मार्तंडः सोऽपि मद्देहसंभवः ॥ तस्मै दिव्यं स्वमैश्वर्यं ज्ञानयोगं सनातनम् ॥ ९ ॥ दत्तवानात्मजावेदान् कल्पादौ चतुरः किल ॥ स मन्नियोगतो ब्रह्मा सदा मद्भाव भावितः ॥ १० ॥ हिरण्यगर्भ मार्तण्ड है वह मेरे देहसे प्रगट है, उसको मैंने अपना दिव्य ऐश्वर्यको सनातन ज्ञानयोग ॥ ९ ॥ और कल्पकी आदिमें चारों वेदोंको दिया है, वह मन्नियोगसे भगवान् सदा सद्भावमें स्थित हुए ॥ १० ॥

दिव्यं तन्मामकैश्वर्यं सर्वदा वहति स्वयम् ॥ स सर्वलोकनिर्माता मन्नियोगेन सर्ववित् ॥ ११ ॥ भूत्वा चतुर्मुखः सर्वं सृजत्येवात्मसं- भवः ॥ योऽपि नारायणोऽनन्तो लोकानां प्रभवाव्ययः ॥ १२ ॥ उस मेरे दिव्य ऐश्वर्यको सदा धारण करते हैं, यह सबके निर्माता सबके ज्ञाता मेरी आज्ञासे ॥ ११ ॥ चतुर्मुखी होकर सृष्टिको निर्माण करते हैं, जो नारायण अनन्त लोकोंके प्रभु अविनाशी हैं ॥ १२ ॥

ममैव परमा मूर्तिः करोति परिपालनम् ॥ योऽन्तकः सर्वभूतानां रुद्रः कालात्मकः प्रभुः ॥ १३ ॥ मदाज्ञयाऽसौ सततं संहरत्येव मे तनुः ॥ हव्यं वहति देवानां कव्यं कव्याशिनामपि ॥ १४ ॥ वह मेरीही परमा मूर्ति होकर जगत्का पालन करते हैं, जो सब भूतोंका अन्तक रुद्र कालात्मा प्रभु है ॥ १३ ॥ वह मेरा शरीर मेरी आज्ञासे ही यह सब संहार करता है, देवताओंके निमित्त हव्य वहन करता हुआ ॥ १४ ॥

पाकं च कुरुते वह्निः सोऽपि मच्छक्तिचोदितः ॥ भुक्तमाहारजातं यत्पचत्येतदहर्निशम् ॥ १५ ॥ वैश्वानरोऽग्निर्भगवानीश्वरस्य नियो- गतः ॥ यो हि सर्वांभसां योनिर्वरुणो देवपुंगवः ॥ १६ ॥ अग्नि जो पाक करता है वह भी मेरी शक्तिसे प्रेरित हुआ करता है, जो कुछ भोजन किया आहार है मेरे बलसे जठराग्नि उसे पचाती है ॥ १५ ॥ भगवान् वैश्वानर अग्नि मेरी आज्ञासे यह करता है, जो सम्पूर्ण जलोंकी योनि वरुणदेवता है ॥ १६ ॥

स संजीवयते सर्वमीशस्यैव नियोगतः ॥ योऽन्तस्तिष्ठति भूतानां बहिर्देवो निरंजनः ॥ १७ ॥ मदाज्ञयासौ भूतानां शरीराणि बिभर्ति हि ॥ योऽपि संजीवनो नॄणां देवानाममृताकरः ॥ १८ ॥

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