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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)

सर्गं ] हिन्दीटीकासहित (७७)

वह ईशके नियोगसे ही सबको संजीवित करता है जो निरंजन देव जीवोंके बाहर भीतर स्थित है ॥ १७ ॥ मेरीही आज्ञासे यह प्राणियोंके शरीरको भरण पोषण करता है जो देवताओंके संजीवनमें अमृत रूप है ॥ १८ ॥]

सोमः स मन्नियोगेन चोदितः किल वर्तते ॥ यः स्वभासा जगत्कृत्स्नं प्रकाशयति सर्वदा ॥ १९ ॥ सूर्यो वृष्टिं वितनुते शास्त्रेणैव स्वयंभुवः ॥ योऽप्यशेषजगच्छास्ता शक्रः सर्वामरेश्वरः ॥ २० ॥

चन्द्रमा मेरेही आज्ञासे वर्तता है, जो स्वभावसे सारे जगत्को प्रवृत्त कर देता है ॥ १९ ॥ सूर्य ब्रह्माजीकी आज्ञासे वृष्टि करता है, जो संपूर्ण जगत्का शास्ता नियमसे साधुतापूर्वक वर्तता है, सब देवताओंका अधिपति है ॥ २० ॥

यज्ञानां फलदो देवो वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यः प्रशास्ता ह्यसाधूनां वर्तते नियमादिह ॥ २१ ॥ यमो वैवस्वतो देवो देवदेवनियोगत ॥ योऽपि सर्वधनाध्यक्षो धनानां संप्रदायकः ॥ २२ ॥

वह देव यज्ञोंके फलका देनेवाला मेरी आज्ञासे वर्तता है, असाधुओंका शास्ता नियमसे वर्तता है ॥ २१ ॥ वैवस्वत यमदेव मेरीही आज्ञासे वर्तता है, जो सम्पूर्ण धनाध्यक्ष और धनोंके देनेवाले हैं ॥ २२ ॥

सोऽपीश्वरनियोगेन कुबेरो वर्तते सदा ॥ यः सर्व रक्षसां नाथस्तापसानां फलप्रदः ॥ २३ ॥ मन्नियोगादसौ देवो वर्तते निर्ऋतिः सदा ॥ वैतालगणभूतानां स्वामी भोगफलप्रदः ॥ २४ ॥

वह कुवेरभी ईश्वरकी आज्ञासे सदा वर्तता हैं जो सम्पूर्ण राक्षसोंका नाथ तपस्वियोंका फल देनेवाला है ॥ २३ ॥ वह निर्ऋतिभी सदा मेरी आज्ञासे वर्तता है, वेतालगण भूतोंका स्वामी भोगफल देनेवाला है ॥ २४ ॥

ईशानः सर्वभक्तानां सोऽपि तिष्ठेन्ममाज्ञया॥यो वामदेवौंगिरसः शिष्यो रुद्रगणाग्रणीः ॥ २५ ॥ रक्षको योगिनां नित्यं वर्ततेऽसौ मदाज्ञया ॥ यश्च सर्वजगत्पूज्यो वर्तते विघ्नकारकः ॥ २६ ॥

सब भक्तोंके ईशानभी मेरी आज्ञासे वर्तता है,जो वामदेव आंगिरस रुद्रगणोंका अग्रणी शिष्य है ॥ २५ ॥ नित्य योगियोंका रक्षक है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो सर्व जगत्के पूज्य विघ्नकारक गणेशजी हैं ॥ २६ ॥

विनायको धर्मनेता सोऽपि मद्वचनात्किल ॥ योऽपि वेदविदां श्रेष्ठो देवसेनापतिः प्रभुः ॥ २७ ॥ स्कन्दोऽसौ वर्तते नित्यं स्वयंभूप्रतिचोदितः ॥ ये च प्रजानां पतयो मरीच्याद्या महर्षयः ॥ २८ ॥

(७८) अद्भुतरामायण [ चतुर्दश-

विनायक धर्मनेता है वहभी मेरी आज्ञासे वर्तता है, जो वेद जाननेवालोंमें श्रेष्ठ देवताओंके सेनापति प्रभु हैं ।। २७-।। वह स्कन्दभी प्रभुकी आज्ञामेंही वर्तते हैं, जो प्रजाओंके पति मरीच्यादि महर्षि हैं ।। २८ ।।

सृजंति विविधं लोकं परस्यैव नियोगतः ।। या च श्रीः सर्वभूतानां ददाति विपुलां श्रियम् ।। २९ ।। पत्नी नारायणस्यासौ वर्तते मदनुग्रहात् ।। वाचं ददाति विपुलां या च देवी सरस्वती ।। ३० ।।

विविधलोक नारायणकी आज्ञासेही रचते हैं, जो लक्ष्मी सब भूतोंको महाश्री देती है ।। २९ ।। वह नारायणकी पत्नी मेरी आज्ञासे वर्तती है, जो देवी सरस्वती विपुल वाणी देती है ।। ३० ।।

सापीश्वरनियोगेन चोदिता संप्रवर्तते ।। याऽशेष पुरुषाघोरान्नरकात्तारयत्यपि ।। ३१ ।। सावित्री संस्मृता देवी देवाज्ञानुविधायिनी ।। पार्वती परमा देवी ब्रह्मविद्याप्रदायिनी ।। ३२ ।। यापि ध्याता विशेषेण सापि मद्धच नानुगा ।। योजनंतो महिमानंतः शेषोऽशेषा ऽमरप्रभुः ।। ३३ ।। दधाति शिरसा लोकं सोऽपि देवनियोगतः ।। योऽग्निः संवर्तको नित्यं वडवारूपसंस्थितः ।। ३४ ।।

वहभी ईश्वरके नियोगसे प्रेरित हो वर्तती है जो अनेक पुरुषोंको नरकसे तारती है ।। ३१ ।। वह सावित्री देवी वशीभूत होतीहै जो पार्वती परमादेवी ब्रह्मविद्याकी विधान करनेवाली है ।। ३२ ।। ध्यान करनेवालोंको फल मेरेही आज्ञासे देती है जो अनन्त महिमावाले शेषजी देवाधिपति हैं।।३३।। वहभी देवदेवकी आज्ञासे पृथिवीको शिरपर धारण करते हैं जो नित्य संवर्तक अग्नि वडवारूपसे स्थित है ।। ३४ ।।

पिबत्यखिलमंभोधिमीश्वरस्य नियोगत ।। आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्च तथाश्विनौ ।। ३५ ।। अन्याश्च देवताः सर्वा मच्छासनमधिष्ठिताः ।। गंधर्वा उरगा यक्षाः सिद्धाः साध्याश्च चारणाः ।। ३६ ।।

वहभी ईश्वरहीकी आज्ञासे सब सागरको शोषता है, आदित्य वसु रुद्र मरुत अश्विनीकुमार ।। ३५ ।। और भी सब देवता मेरे शासनमें स्थित रहते हैं, गन्धर्व उरग यक्ष सिद्ध साध्य चारण ।। ३६ ।।

भूतरक्षःपिशाचाश्च स्थिताः शास्त्रे स्वयंभुवः ।। कलाकाष्ठानिमेषाश्च मुहूर्ता दिवसाः क्षणाः ।। ३७ ।। ऋत्वब्दमासपक्षाश्च स्थिताः शास्त्रे प्रजापते ।। युगमन्वंतराण्य्येव ममतिष्ठंति शासने । ३८।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)

भूत राक्षस पिशाच सब स्वयंभूकी आज्ञामें स्थित हैं कला काष्ठा निमेष मुहूर्त दिवस ॥ ३७ ॥ ऋतु वर्ष महीना पखवारा युग मन्वन्तर सब परमात्माके शासनमें स्थित हैं ॥ ३८ ॥

पराश्चैव परार्द्धाश्च कालभेदास्तथापरे ॥ चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ३९ ॥ नियोगादेव वर्तंते सर्वाण्येव स्वयंभुवः ॥ पत्तनानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात् ॥ ४० ॥

परा परार्द्ध जितने कालके भेद हैं, चार प्रकारके भूत स्थावर चर ॥ ३९ ॥ सब स्वयंभूके नियोगसे वर्तते हैं, सब पत्तन और भुवन उसीकी आज्ञासे वर्तते हैं ॥ ४० ॥

ब्रह्मांडानि च वर्तंते देवस्य परमात्मनः ॥ अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्मांडानि महाज्ञया ॥ ४१ ॥ प्रवृत्तानि पदार्थाघैः सहितानि समं ततः ॥ ब्रह्मांडानि भविष्यंति सह वस्तुभिरात्मगैः ॥ ४२ ॥

असंख्य ब्रह्माण्ड भी उस परमात्माकी आज्ञासे ही वर्तते हैं ॥ ४१ ॥ सब प्रवृत्त हुए पदार्थसमूहोंके साथै ब्रह्मांड अपनी २ वस्तुओंके साथ होते हैं ॥ ४२ ॥

हरिष्यंति सहैवाज्ञां परस्य परमात्मनः ॥ भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥ ४३ ॥ भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगान्मम वर्तते ॥ याऽशेषसर्वजगतां मोहिनी सर्वदेहिनाम् ॥ ४४ ॥

वह सब परमात्माकी आज्ञाको वहन करते हैं, भूमि जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि ॥ ४३ ॥ भूतादि आदि प्रकृति यह सब मेरी आज्ञासेही वर्तते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् और देहधारियोंकी मोहिनी है ॥ ४४ ॥

मायापि वर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः ॥ विधूय मोहकलिलं यथा पश्यति तत्पदम् ॥ ४५ ॥ सापि विद्या महेशस्य नियोगाद्वशवर्तिनी ॥ बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत् ॥ ४६ ॥

मायाभी नित्य ईश्वरकी आज्ञासे वर्तती है जिसके द्वारा मोहको दूर कर तत्पद देखा जाता है ॥ ४५ ॥ यह विद्या महेशके नियोगसे वशवर्तिनी है, बहुत कहनेसे क्या है यह जगत् मेरी शक्त्यात्मक हैं ॥ ४६ ॥

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं व्रजेत् ॥ अहंहि भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः ॥ ४७ ॥ परमात्मा परंब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ इत्येतत्परमं ज्ञानं भवते कथितं मया ॥ ४८ ॥

(८०)अद्भुतरामायणंचतुर्दश-

मुझसे यह जगत् पूर्ण होकर अन्तमें लय करलिया जाता है, मैंही भगवान् ईश स्वयंज्योति सनातन हूँ ॥ ४७ ॥ परमात्मा परब्रह्म हूँ मुझसे अधिक कोई नहीं है यह तुमको परज्ञान मैंने कथन किया है ॥ ४८ ॥

ज्ञात्वा विमुच्यते जंतुर्जन्म संसारबंधनात् ॥ मायामाश्रित्य जातोऽहं गृहे दशरथस्य हि ॥ ४९ ॥ रामोऽहं लक्ष्मणो ह्येष शत्रुघ्नो भरतोऽपि च ॥ चतुर्धा संप्रभूतोऽहं कथितं तेऽनिलात्मज ॥ ५० ॥

इसको जानकर प्राणी संसारके जन्ममरणसे छूट जाता है, मायाके आश्रित हो, मैं दशरथके यहां जन्म ले आया हूँ ॥ ४९ ॥ मैं ही राम लक्ष्मण शत्रुघ्न और भरत यह चार प्रकारसे अपने रूपको प्रकटकर स्थित हूँ ॥ ५० ॥

मायास्वरूपं च तव कथितं यत्प्लवंगम॥ *कृपया तद्धृदा धार्यं न विस्मर्त्तव्यमेव हि ॥ ५१ ॥ येनेयं पठ्यते नित्यं संवादो भवतो मम ॥ जीवन्मुक्तो भवेत्सोऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥

हे महावीर ! जो मैंने यह तुमसे रूप कथन किया है यह श्रद्धासे हृदयमें धारण करना भूलना नहीं ॥ ५१ ॥ जो यह हमारा संवाद नित्य पढेंगे वह जीवन्मुक्त हो सब पापोंसे छूट जायँगे ॥ ५२ ॥

श्रावयेद्वा द्विजाञ्छुद्धांन्ब्रह्मचर्यपरायणान् ॥ यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ ५३ ॥ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्म लोके महीयते ॥ ५४ ॥

जो ब्रह्मचर्यमें परायण ब्राह्मणोंको सुनावेंगे, वा जो इसका अर्थ विचारेंगे, वे परमगतिको प्राप्त होंगे ॥ ५३ ॥ जो अभियुक्त दृढव्रत हो इसे नित्य सुनेंगे वह सब पापरहित हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होंगे ॥ ५४ ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः । श्रोतव्यश्चापि मंतव्यो विशेषाद्ब्राह्मणैः सदा ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भग-
वद्धनुमत्संवादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस कारण सब प्रयत्नोंसे विद्वानोंको यह पढना और मनन करना चाहिये और विशेष कर ब्राह्मणोंको विचारना चाहिये ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा० वाल्मीकीये आदि० अद्भु० भाषाटीकायां भगवद्धनुमत्सं-
वादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥


* श्रद्धया इति पाठ ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)

पंचदश सर्ग

हनुमान्‌जीका रामचन्द्रकी स्तुति करना

ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना बद्धांजलिर्वायुसुतो महात्मा ॥
ओंकारमुच्चार्य विलोक्य देवमंतः शरीरे निहितं गुहायाम् ॥ १ ॥
रामं महात्मानम कुंठशक्तिं सनंदमुख्यैः स्तुतमप्रमेयम् ॥ पुष्टाव च
ब्रह्ममयैर्वचोभिरानंदपूर्णायितमानसः सन् ॥ २ ॥

वह महात्मा महावीरजी हृदयमें ध्यान कर शिरसे प्रणामकर हाथजोडकर ओंकारका उच्चारण देवको देखकर जो प्राणियोंके हृदय की गुहामें स्थित हैं ॥ १ ॥ राम महात्मा अकुंठशक्ति सनन्दादि मुख्योंसे स्तुतिको प्राप्त होते हुए, अप्रमेय भगवान्‌को आनन्दसे पूर्णमन होकर ब्रह्ममय वचनोंसे प्रसन्न स्तुति करने लगे ॥ २ ॥

त्वामेकमीशं पुराणं प्राणेश्वरं राममनन्तयोगम् ॥ नमामि सर्वान्तर-
सन्निविष्टं प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम् ॥ ३ ॥ पश्यंति त्वां मुनयो
ब्रह्मयोनिं दांताः शांता विमलं रुक्मवर्णम् ॥ ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे
शरीरे कविं परेभ्यः परमं परं च ॥ ४ ॥

तुमही एक ईश पुरुष पुराण प्राणेश्वर अनन्तयोग सबके अन्तरमें स्थित हो, प्रचेतस पवित्र ब्रह्ममय पवित्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ ब्रह्मयोनि आपको मुनिजन देखते हैं आप दान्त शान्त विगल रुक्मवर्ण हो, आत्मामें स्थित, परेसे परे तुमको महात्मा देखते हैं ॥ ४ ॥

त्वत्तःप्रसूता जगतःप्रसूतिः सर्वात्मसृष्टेः परमाणुभूतः ॥ अणो-
रणीयान्महतोमहीयांस्त्वामेव सर्वे प्रवदंति संतः ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भो
जगदंतरात्मा त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः ॥ स जायमानो भवता
विसृष्टो यथाविधानं सकलं ससर्ज ॥ ६ ॥

आपसे सारा जगत् उत्पन्न होता है, आप सर्वात्मा, सृष्टिके परमात्मा भूत हो, सूक्ष्म, बडेसे बड़े, आपको सन्त महात्मा कहते हैं ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भ जगत्के अन्तरात्मा आप पुराणपुरुषसे सब जगत् उत्पन्न होता है, विराटने -

(८२) अद्भुतरामायण [पञ्चदश-

आपसेही उत्पन्न होकर सब जगत्को उत्पन्न करके सब विधानको उत्पन्न किया है ॥ ६ ॥

त्वत्तो वेदाः सकलाः संप्रवृत्तास्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभंते । पश्यामि त्वां जगतो हेतुभूतं नृत्यं तं स्वे हृदये संनिविष्टम् ॥ ७ ॥ त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्म चक्रं मायावी त्वं जगतामेकनाथः ॥ नमामि त्वां शरणं संप्रपद्ये योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम् ॥ ८ ॥

तुमसे ही सब वेद उत्पन्न हुए हैं, आपमें ही अन्तमें स्थितिको प्राप्त होते हैं, आपको जगत्का हेतुभूत में देखता हूँ, मेरे हृदयमें आप सदैव स्थित हों ॥ ७ ॥ आपहीसे सब ब्रह्माण्डचक्र घुमाया जाता है, आपही जगत्के एक नाथ हो, मैं आपके शरणमें प्राप्त हूँ, आप योगात्मा चित्पति दिव्य नृत्य रूप हो ॥ ८ ॥

पश्यामि त्वां परमाकाशमध्ये नृत्यंतं ते महिमानं स्मरामि ॥ सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं ब्रह्मानंदमनुभूयानुभूय ॥ ९ ॥ ओंकारस्ते वाचको मुक्तिबीजं त्वामक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम् ॥ त्वं त्वां सत्यंप्रवदंतीह संतः स्वयंप्रभं भवतो यत्प्रकाशम् ॥ १० ॥

परमाकाशके मध्यमें विराजमान आपको देखता हूं, आप सर्वात्मा अनेक प्रकारसे संनिविष्ट ब्रह्मानन्दको अनुभव करके आपको स्मरण करता हूँ ॥ ९ ॥ ओंकार आपका वाचक मुक्तिबीज है, आप अक्षर प्रकृतिमें गूढरूप हैं, उसे आप सत्यरूपका सन्त वर्णन करते हैं, आप स्वयं रूप प्रकाशमान हो ॥ १० ॥

स्तुवंति त्वां सततं सर्वदेवा नमंति त्वामृषयः क्षीणदोषाः ॥ शांतात्मानः सत्यसंधं वरिष्ठं विशंति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः ॥ ११ ॥ एको वेदो बहुशाखो ह्यनंतस्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम् ॥ संवेद्यं त्वां शरणं ये प्रपन्नास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १२ ॥

आपकी निरन्तर सब देवता स्तुति करते हैं, क्षीणदोष ऋषि आपको नमस्कार करते हैं, शान्ताराम सत्यसन्ध वरिष्ठ आपमें ब्रह्मनिष्ठ यति प्रवेश करते हैं ॥ ११ ॥ एकही वेद बहु शाखावाला अनन्त है, आपको ही एक रूप बोधित करते हैं, जानने योग्य आपकी शरणमें जो हुए हैं उन्हींको सदा शान्ति है अन्योंको नहीं ॥ १२ ॥

भवानीशोऽणिमादिमां स्तेजोराशिर्ब्रह्महृद्विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः ॥ आत्मानंदं चानुसूयानुशेते स्वयंज्योतिवचनो नित्यमुक्तः ॥ १३ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८३)

एको देवस्त्वं करोषीह विश्वं त्वं पालयस्यखिलं विश्वरूपः ॥ त्वय्ये- वास्ते विलयं विदतीदं नमामि त्वां शरणं त्वां प्रपन्नः ॥ १४ ॥ भवानीपति अणिमादिमान तेजकी राशि विश्व परमेष्ठी वरिष्ठ आत्मा- नन्द अनुभव करता स्वयंज्योति वचन नित्य सबमें स्थित है ॥ १३ ॥ एकही आप देव सब विश्वको करते हो आप अखिल विश्वरूपकी पालना करते हो अन्तमें विश्व आपहीमें लीन होता है, मैं शरणमें प्राप्त हुआ आपको नमस्कार करता हूँ ॥ १४ ॥

त्वामेकमाहुः परमं च रामं प्राणं वहंतं हरिमित्रमीशम् ॥ इन्दूं मृत्युमनलं चेकितानं धातारमादित्यमनेकरूपम् ॥ १५ ॥ त्वमक्षरं परं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ॥ त्वमव्ययः शाश्वतो धर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषोत्तमोऽसि ॥ १६ ॥

हे राम आपहीको परम प्राणदाता हरि मित्र ईश कहते हैं, चन्द्रमा पवन चेकितान धाता आदित्य अनेकरूप हो ॥ १५ ॥ आपही परम, अक्षर जानने योग्य हो, आपही इसके परिधान हो, आपही अविनाशी शाश्वत धर्मके गोप्ता सनातन उत्तम पुरुष हो ॥ १६ ॥

त्वमेव विष्णुश्चतुराननस्त्वं त्वमेव रुद्रो भगवानपीशः ॥ त्वं विश्वनाभिः प्रकृतिः प्रतिष्ठा सर्वेश्वरस्त्वं परमेश्वरोऽसि ॥ १७ ॥ त्वामेकमाहुः पुरुषं पुराणमादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥ चिन्मात्र- मव्यक्तमर्चिन्त्यरूपं खं ब्रह्मशून्यं प्रकृतिं निर्गुणं च ॥ १८ ॥

आपही विष्णु चतुरानन हो आप रुद्र भगवान् ईश हो, आप विश्वकी नाभी प्रकृति प्रतिष्ठा सर्वेश्वर परमेश्वर हो ॥ १७ ॥ आपही पुराणपुरुष एक सूर्यवर्ण अन्धकार से परे हो चिन्मात्र अव्यक्त अचिन्त्यरूप खं ब्रह्म शून्य प्रकृति निगुण हो ॥ १८ ॥

यदन्तरा सर्वमिदं विभाति यदव्ययं निर्मलमेकरूपम् ॥ किमप्यचिन्त्यं तव रूपमेकं यदंतरा यत्प्रतिभाति तत्त्वम् ॥ १९ ॥ योगेश्वरं रूपमन- न्तशक्तिं परायणं ब्रह्मतनुं पवित्रम् ॥ नमाम सर्वे शरणार्थिनस्त्वां प्रसीद भूताधिपते प्रसीद ॥ २० ॥

जिसके अन्तरमें यह सब जगत् प्रकाश करता है जो अविनाशी निर्मल एकरूप है, यह आपका रूप अचिन्त्य तत्त्ववाला है, और प्रकाशवान् है ॥ १९ ॥

(८४) अद्भुतरामायण [ पंचदश-

योगेश्वररूप अनन्तशक्ति परायण ब्रह्मतनु पवित्रको शरणकी इच्छावाले हम सब नमस्कार करते हैं, हे भूताधिपते ! प्रसन्न हूजिये ॥ २० ॥

त्वत्पादपद्मस्मरणादशेषं संसारबीजं विलयं प्रयाति ॥ मनो नियम्य प्रणिधाय कार्यं प्रसाद्याम्येकरसं भवंतम् ॥ २१ ॥ नमोऽस्तु रामाय भवोद्भवाय कालाय सर्वैकहराय तुभ्यम् ॥ नमोऽस्तु रामाय कपर्दिने ते नमोऽग्नये दर्शय रूपमग्र्यम् ॥ २२ ॥

आपके चरणकमलके स्मरणसे सब संसारके बीज जन्ममरण नष्ट हो जाते हैं, मनको रोक कायाको प्रणिधान कर एकरस आपको मैं प्रसन्न करता हूं ॥ २१ ॥ संसारके उत्पत्तिकारण, सबके उत्पन्न करनेवाले कालरूप एक हरनेवाले आपको प्रणाम है, राम कदर्पि अग्निरूप आपको प्रणाम है, आप अग्न्यरूप हो ॥ २२ ॥

ततः स भगवान्रामो लक्ष्मणेन सह प्रभुः ॥ संहृत्य परमं रूपं प्रकृतिस्थोऽभवत्स्वयम् ॥ २३ ॥ स तस्य स्तवमाकर्ण्य वायुपुत्रस्य धीमतः ॥ प्राह गम्भीरया वाचा हनूमन्तं रघूत्तमः ॥ २४ ॥

तब भगवान् राम अपना लक्ष्मणसहित रूप छिपाकर प्रकृतिमें स्थित होते हुए ॥ २३ ॥ तब वायुपुत्रका यह वचन सुनकर रामचन्द्र गम्भीर वचनसे कहने लगे ॥ २४ ॥

स्तोष्यांति येऽनया स्तुत्या ते यास्यंति परां गतिम् ॥ स्थिरो भव हनूमंस्त्वं कार्यमौपायिकं कुरु ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणेवाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे हनुमत्कृतस्तवराजे पञ्चदशः सर्गः ॥ १५ ॥

जो इस स्तोत्रसे स्तुति करेंगे वे परमगतिको प्राप्त होंगे, हे महावीर ! आप स्थित होकर उपाययुक्त कार्य करो ॥ २५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मी. आदि. अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रभाषाटीकायां हनुमत्कृतस्तवराजे पंचदशः सर्गः ॥ १५ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८५)

षोडश सर्ग

रामचन्द्रका रावणको मार राज्य पाना

रामः प्रत्याह च पुनर्हनूमन्तं महाद्युतिः ।। रक्षसा मे हृता भार्या रावणेन दुरात्मना ।। १ ।। सुग्रीवेण रांमं सख्यं कारयाद्य-प्लवङ्गम ।। हसित्वा मधुरं वीरो हनूमानब्रवीद्वचः ।। २ ।।

तब फिर रामचन्द्रजी महावीरसे कहने लगे, कि हे महावीर ! दुरात्मा रावणने हमारी भार्याको हरण कर लिया है ।। १ ।। हे वानरश्रेष्ठ ! सुग्रीवके साथ हमारी मित्रता करा दो, तब मधुर हँसकर महावीरजी कहने लगे ।। २ ।।

तव भार्या महाभाग रावणेन हृतेति यत् ।। विश्वं यथेदमाभाति तथेदं प्रतिभाति मे ।। ३ ।। तथापि प्रभुणादिष्टं कार्यमेव हि किंकरैः ।। इत्युक्त्वा हनुमांस्तूर्णं प्रसन्नेनांतरात्मना ।। ४ ।।

हे महाभाग ! आपकी भार्याको रावणने हरण किया है जैसा यह विश्व विदित होता है इसी प्रकारसे हो ।। ३ ।। तौभी जो आपने आज्ञा दी है वह दासोंको अवश्य करनी चाहिये, यह कह प्रसन्न हो शीघ्रतासे महावीर ।। ४ ।।

आरोप्य स्कंधयोर्वीरौ सुग्रीवांतिकमानयत् ।। तौ दृष्ट्वा पुरुष-व्याघ्रो सुग्रीवो वानरोत्तमः ।। ५ ।। वालिनं तं जितं मेने प्राप्त मेने रुमां स्त्रियम् ।। सख्यं चकाररामेण दिष्ट्यादिष्ट्येति चाब्रवीत् ।। ६ ।।

दोनोंको कंधेपर चढाकर सुग्रीवके समीप ले आये, वानरोत्तम सुग्रीव उन दोनोंको देखकर ।। ५ ।। अपनी रुमास्त्रीको प्राप्त और वालीको जीता हुआ मानने लगा, और अपने भाग्यकी सराहना कर रामके साथ मित्रता की ।। ६ ।।

वालिनो विलयं कृत्वाराज्यं चास्मै निवेद्य च ।। नानादेश्यान्वानरांश्च आनाय्य रघुनन्दनौ ।। ७ ।। हनूमदंगदारूढौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।। सिंधौस्तटं तौ ययतुः सुग्रीवेण सह प्रभुः ।। ८ ।।

वालीको मार सुग्रीवको राज्य दे, देश-देशान्तरोंसे वानरोंको बुलाया ।। ७ ।। हनुमान् और अंगदके ऊपर राम लक्ष्मण चढकर सुग्रीवके साथ सागरके तटपर गये ।। ८ ।।

( ८६ ) अद्भुतरामायण षोडश-

पारेसमुद्रं लंकां च निरूप्याह रघू त्तमः ।। वानरा हि यथा यांति लंकांलक्ष्मण तत्कुरु ।। ९ ।। रामस्य वचनं श्रुत्वा समुद्रं प्राह लक्ष्मणः । सिंधो त्वं स्तभ यात्मानं यथा यास्यति वानराः ।।१०।।

सागरके पार लंकापुरीको देखकर रामचन्द्र कहने लगे, हे लक्ष्मण ! जिस प्रकारसे हम लंकाके निकट पहुँचे तैसा करो ॥९॥ रामचन्द्रके वचन सुनकर लक्ष्मण समुद्रसे कहने लगे, हे सागर ! अपनी आत्माको स्तंभित कर तो तेरे ऊपर वानर चले जायँगे ॥ १० ॥

सिन्धुस्तु प्रभुणादिष्टं न शुश्राव यदा। तदा लक्ष्मणः क्रोधसंदीप्तः पपाताब्धेर्जलांतरे ।। ११ ।। तद्देह-वह्निशिखया शुशोष जलधेर्जलम्। यादांसि स्थलभाजीनि देवा भीत दिशोऽद्रवन् ।। १२ ।।

जब सागर प्रभुके वचनोंको न सुनता हुआ तब लक्ष्मणजी क्रोधकर सागरमें कूद पडे ॥ ११ ॥ और अपने देहकी ज्वालासे सागरका जल सोखने लगे, सब जलजीव व्याकुल होगये और देवता भयभीत हो दिशाओंके अन्तमें पलायन कर गये ॥ १२ ॥

तद्दृष्ट्वा महदाश्चर्यं वानरा विस्मयं गताः । हाहाकारं प्रचुक्रुस्ते लोकाः सर्व चराचराः ।। १३ ।। ऋषयो भूतसंघाश्च स्वस्तिस्वस्तीति चाब्रुवन् । राघवो लक्ष्मणं प्राह नैतद्युक्तं त्वया कृतम् ।। १४ ।।

उस महा आश्चर्यको देखकर वानर आश्चर्यको प्राप्त हुए और सब चराचर लोक हाहाकार करने लगे ॥ १३ ॥ ऋषि और दूसरे प्राणी स्वस्ति २ कहने लगे तब राम लक्ष्मणसे कहने लगे यह तुमने अच्छा नहीं किया ॥ १४ ॥

पुनरेनं पूरयाम सीताविरहजेन वै । अश्रुणेति प्रतिज्ञाय तं तथा-पूरयत्प्रभुः ।। १५ ।। रामोपरि तदाकाशात्पुष्पवृष्टिः पपात ह लोकाश्च सुस्थिता आसंश्चिन्तयित्वा पुनः पुनः ।। १६ ।।

अब सीताके वियोगसे उत्पन्न हुए आंसुओंसे फिर इसको पूर्ण करूँगा तब यह कहकर प्रभुने उसको पूर्ण कर दिया ॥ १५ ॥ तब आकाशसे रामचन्द्रके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी, लोक स्वस्थ हुए और बारम्बार विचार करने लगे ॥ १६ ॥

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सर्ग हिन्दीटीकासहित (८७)

सिंधुना संस्तुतो रामः सेतुं सिंधौ बबंध ह । लंकायां रावणं हत्वा सगणं मधुसूदनः ॥ १७ ॥ आरोप्य पुष्पकं सीतां विभीषणसहायवान् । अयोध्यांमगमद्रामः सुग्रीवहनुमदादिभिः ॥ १८ ॥

फिर सिंधुसे स्तुतिको प्राप्त हो रामचन्द्रने सागरमें सेतु बांधा और लंकापुरी जाय गणोंसहित रावणको मारकर ॥ १७ ॥ विभीषणको साथ ले पुष्पक विमानमें सीताको बैठाया सुग्रीव हनुमदादिके सहित रामचन्द्र अयोध्याको चले ॥ १८ ॥

आनंदे योजयामास भ्रातॄन्मातॄंश्च बांधवान् । राजा सर्वस्य लोकस्य प्रजानामनुरंजनः ॥ १९ ॥ रामं राजानमासाद्य तिर्यञ्चोऽपि ययुर्मुदम् । देवदुन्दुभयो नेदुः सर्वदा हि नभस्तले । ववृषुर्जंलदाः काले पुष्पवृष्टिः पपात च ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे ज्वालाप्रसाद मिश्रकृत भाषाटीकायां रामराज्योपलंभनं नाम षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

भ्राता माता और बांधवोंको आनन्दमें युक्त किया, वह सब लोकके राजा प्रजाके आनन्द देनेवाले हुए ॥ १९ ॥ रामचन्द्र राजाको प्राप्त होकर पशु पक्षी भी प्रसन्न हुए, सर्वदा आकाशमें देवदुन्दुभी बजने लगी, समयपर मेघवर्षा और फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ २० ॥

इत्यार्षे श्रीम. वाल्मी. आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे रामराज्योपलंभनं नामषोडशः सर्गः ॥ १६ ॥


सप्तदश सर्ग

जानकीवचन सहस्रमुख रावणका वृत्तान्त

प्राप्तराज्यस्य रामस्य राक्षसानां क्षये कृते ॥ आजग्मुर्मुनयस्तत्र राघवं प्रति नंदितुम् ॥ १ ॥ विश्वामित्रो यवक्रीतो रैभ्यश्चच्यवन एव च ॥ कण्वश्च मुनिशार्दूलो ये पूर्वा दिशमाश्रिताः ॥ २ ॥

जिस समय राक्षसोंका वध हो चुका और रामचन्द्रको राज्य मिला तब रामचन्द्रको अभिनन्दन करनेके निमित्त मुनिजन आये ॥ १ ॥ विश्वामित्र-

(८८) अद्भुतरामायण [सप्तदश-

यवक्रीत, रैभ्य, च्यवन, मुनिश्रेष्ठ कण्व जो पूर्वदिशाके रहनेवाले ऋषि थे वे आये ॥ २ ॥

स्वस्त्यात्रेयश्च नमुचोऽरिमुचोगस्त्य एव च ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये श्रिता दक्षिणां दिशम् ॥ ३ ॥ उपगुः कामठो धूम्रो रौद्राश्वो मुनिपुंगवः ।। आजग्मुर्मुनयस्तत्र ये प्रतीचीं समाश्रिताः ॥ ४ ॥

स्वस्तिआत्रेय, नमुच, अरिमुच, अगस्त्य यह दक्षिणदिशाके रहनेवाले मुनि आकर प्राप्त हुए ॥ ३ ॥ उपगु, कामठ, धूम्र, रौद्राश्व, मुनिश्रेष्ठ यह पश्चिम दिशाके रहनेवाले महात्मा ऋषि आकर प्राप्त हुए ॥ ४ ॥

शिष्योपशिष्यसहिता वसिष्ठप्रमुखर्षयः ।। आजग्मुर्हि महात्मानं उत्तरां दिशमाश्रिताः ॥ ५ ॥ प्राप्य ते तु महात्मानो राघवस्य निवेशनम् ।। गृहीत्वा फलमूलानि हुताशसमविग्रहाः ॥ ६ ॥

शिष्य उपशिष्य आदिके सहित वसिष्ठ आदि ऋषि उत्तरादिशाके रहनेवाले आकर प्राप्त हुए ॥ ५ ॥ यह सब महात्मा रामचन्द्रके स्थानमें आकर प्राप्त हुए फल मूल ग्रहण किये अग्निके समान शरीरवाले ॥ ६ ॥

राघवं प्रतिनंद्याथ विविशुः परमासने ।। राघवश्च महातेजाः सीतया सह सुव्रत ॥ ७ ॥ भ्रातृभिर्मंत्रिभिः सार्द्धं पौरैः श्रेणिमुखैस्तथा ।। विनीत उपसंगम्य पूजयामास तान्मुनीन् ॥ ८ ॥

रामचन्द्रको अभिनंदन कर परमासनमें स्थित हुए, महातेजस्वी रामचन्द्रजी जानकीके सहित ॥ ७ ॥ भाई और मंत्रियोंके साथ तथा पुरवासी जनोंके साथ नम्रतासे उन मुनियोंसे मिल उनकी पूजा करते हुए ॥ ८ ॥

अगस्त्यप्रमुखा विप्रा दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन् ।। राघवं प्रशशंसुस्ते मुनयो वाग्विदां वराः ॥ ९ ॥ त्वं हि देवो जगन्नाथो जगतामुपकारकः ।। रावणस्य सपुत्रस्य सामात्यस्य बधात्प्रभो ॥ १० ॥

और वाणी बोलनेमें चतुर से अगस्त्यादि महर्षि धन्य हो धन्य हो इस प्रकार कहकर रामचंद्रकी प्रशंसा करने लगे ॥ ९ ॥ हे देव जगन्नाथ ! तुमही जगत्‌के उपकार करनेवाले हो, हे प्रभो ! पुत्र अमात्य जनोंके सहित रावणका वध करनेसे ॥ १० ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८९)

जगदेतन्महाबाहो पुनर्जातमिवाभवत् ॥ न रावणादभ्यधिको दुष्टो लोकभयंकरः ॥ ११ ॥ दशास्यैर्दशदिक्कार्यमाज्ञापयति राक्षसः ॥ स दशास्यो हतो राम दिष्ट्या च जगदुद्धृतम् ॥ १२ ॥ मानो यह जगत् फिर उत्पन्न हुआ है, रावणसे अधिक लोगोंको भयदायक कोई दुष्ट नहीं था ॥ ११ ॥ इस राक्षसकी दशोंदिशाओंमें आज्ञा प्रचलित होती थी, भाग्यसे उसको मारकर आपने जगत्का उद्धार किया ॥ १२ ॥

भगवानसि भूपाल ब्रह्मणा प्रार्थितः पुरा ॥ पुंडरीकविशालाक्षः श्याम आजानुबाहुकः ॥ १३ ॥ अयोध्यायां प्रादुरभूदिक्ष्वाकुकुल नंदनः ॥ त्वद्दर्शनान्महाबाहो निवृत्ताःस्मो वयं प्रभो ॥ १४ ॥ हे राम ! आप प्रथम ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेसे भूपालरूप धारण कर आये हो, आपके कमलकेसे बडे नेत्र हैं, श्यामशरीर जानुपर्यन्त लम्बी भुजा हैं। १३ । इक्ष्वाकुकुलके आनन्द देनेको आप आयोध्यामें प्रगट हुए हो, हे प्रभो ! आपके दर्शनसेही हम आनन्दित हो गये ॥ १४ ॥

तपश्चरामः सहितास्त्वत्प्रसादाद्वनेवने ॥ किंतु सीता महादेवी प्राप दुखं महत्प्रभो ॥ १५ ॥ तदेव स्मर्यमाणं सच्चित्तमुद्वेजयेद्धि नः ॥ एवमुक्ते तु मुनिभिः सानुक्रोशं पुनः पुनः ॥ १६ ॥ आपके प्रसादसे वन वनमें निर्भयतप करते हैं, हे प्रभो ! परन्तु सीतादेवीने महादुःख पाया है ॥ १५ ॥ यही स्मरण करनेसे हमारा चित्त उद्वेजित है, जब दयासे वारम्वार मुनिजनोंने यह वचन कहे ॥ १६ ॥

जहास मधुरं साध्वी सीता जनक नंदिनी ॥ उवाच सस्मितं देवी तान्मुनीन्मितभाषिणी ॥ १७ ॥ मुनयो यद्यदुक्तं हि रावणस्य वधं प्रति ॥ परिहास इवाभाति प्रशंसनमिदं द्विजाः ॥ १८ ॥ तब जनकनंदिनी साध्वी सीता हँस पडी और हँसती हुई देवी उन मुनियोंसे कहने लगी ॥ १७ ॥ जो कुछ मुनियोंने रावणके वधके प्रति कहा है हे ब्राह्मणो ! यह प्रशंसा परिहास कहलाती है ॥ १८ ॥

रावणो हि दुराचारः सत्यमेतन्न संशयः ॥ दशभिर्वदनैर्वीरो जगदुद्वेजको हि सः ॥ १९ ॥ दशास्यस्य वधो विप्रा न प्रशंसामिहा- र्हति ॥ एतच्छ्रुत्वा तु मुनयो विस्मयं परमं गताः ॥ २० ॥

(९०) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-

रावण बडा दुराचारी था यह सत्य है और इसमें सन्देह नहीं है, वह अपने दशवदनोंसे जगत्का उद्वेजन करनेवाला था ।। १९ ।। परन्तु हे ब्राह्मणो ! रावणका वध कुछ विशेष प्रशंसाके योग्य नहीं है यह वचन सुनकर मुनि परम विस्मयको प्राप्त हुए ।। २० ।।

किमेतदिति होचुस्ते परस्परमुखेक्षणाः ।। अयोनिसां भवा सीता काकुत्स्थकुलमाश्रिता ।। २१ ।। अस्मानपिंजहासेयं किमेतन्नैव विद्महे ।। तच्छ्रु.त्वा वचनं तेषां मुनीनां भावितात्मनाम् ।। २२ ।।

और यह क्या है ऐसा कह परस्पर एक दूसरेका मुख देखने लगे, अयोनिसे उत्पन्न हुई सीता इक्ष्वाकुवंशके आश्रित हुई ।। २१ ।। हमारे वचनोंपर हास्य करती है इसका कारण हम नहीं जानते हैं तब उन ज्ञानात्मा मुनियोंके यह वचन सुनकर ।। २२ ।।

सीता भीता प्रणम्योचे कृतांज्जलिपुटा सती । पृथग्जनेव ❊ मुनयो नाहमनृतभाषिणी ।। २३ ।। यदि चाज्ञापयथ मां तदा वक्ष्यामि चादितः ।। अगस्त्यप्रमुखा विप्राः सीताया विनयान्वितम् ।। २४ ।।

जानकी डरती हुई प्रणाम कर कहने लगी हे मुनियो ! मैं पामर मनुष्योंके समान असत्यभाषिणी नहीं हूँ ।। २३ ।। जो आप मुझे आज्ञा दें तो मैं आदिसे कहती हूँ, तब अगस्त्यादि ऋषि जानकीके यह विनययुक्त वचन ।। २४ ।।

आकर्ण्य वचनं प्रीताः प्रोचुस्ते कथ्यतामिति ।। ततः सीता महाभागा प्रवक्तुमुपचक्रमे ।। २५ ।। पतिं मुनीन्देवरंश्च मंत्रिणः श्रेणिमुख्य-कान् ।। विनयेनाभ्यनुज्ञाप्य पूर्ववृत्तांतमादरात् ।। २६ ।।

सुनकर जानकीसे कहने लगे वर्णन करो तब महाभागा जानकी कहनेकी इच्छा करने लगी ।। २५ ।। पति मुनि देवर मन्त्री और और श्रेणीके मुख्य लोगोंसे आज्ञा ले पूर्ववृत्तान्त वर्णन करने लगी ।। २६ ।।

पूर्वं विवाहान्मुनयो यदास पितृमंदिरे ।। तदैकोऽतिथिरूपेण ब्राह्मणः समुपागतः ।। २७ ।। आगत्य पितरं मह्यं तमुवाच द्विजोत्तमः ।। चतुरो वार्षिकान्मासान्स्थास्यामि तव मंदिरे ।। २८ ।।

हे मुनियो ! विवाहसे पूर्व जब मैं अपने पिताके मंदिरमें रहती थी तब


* पामर इव संधिरार्षः ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९१)

अतिथिरूप वहां एक ब्राह्मण आया ॥ २७ ॥ वह ब्राह्मण आकर मेरे पितासे कहने लगा मैं चौमासेके चारं महीने तुम्हारे मंदिरमें रहूंगा ॥ २८ ॥

यदि सेवापरो नित्यं भवस्यमरसन्निभः ॥ जनको मत्पिता देवद्विजभक्तिपरायणः ॥ २९ ॥ ब्राह्मणं वासयामास नानाभक्ष्यं समादिशत् । अहं च तस्य सेवायै नियुक्ता धर्मभीरुणा ॥ ३० ॥

हे राजन् ! जो नित्य मेरी सेवामें तत्पर रहोगे तो, देवताहो जावोगे हमारे पिता जनकजी द्विज और देवताकी भक्तिमें परायण हैं ॥ २९ ॥ उस ब्राह्मणको नाना प्रकारके भक्ष्य भोज्यकी सामग्री प्रदान की गई; और धर्मभीरु हमारे महाराजने मुझे उसकी सेवा करनेको नियुक्त किया ॥ ३० ॥

यदा यथाज्ञापयति द्विजः स परमार्थवित् । तं तथा ह्यकरवं तत्र रात्रिन्दिवमतन्द्रिता ॥ ३१ ॥ नानातीर्थाभिगमनं कृतं तेन महात्मना। तत्रत्याश्च यथाश्चित्राः श्रावयामास मां द्विजः ॥ ३२ ॥

परमार्थका जाननेवाला वह ब्राह्मण जो जो आज्ञा देता, वह मैं रातदिन निरालस्य होकर सम्पादन करती थी ॥ ३१ ॥ उस महात्माने अनेक तीर्थोंमें अभिगमन किया था, वहां उस ब्राह्मणने मुझे अनेक प्रकारकी कथा श्रवण कराई ॥ ३२ ॥

सेवया मम धैर्येण चानुकूल्येन तर्पितः । कदाचिद्ब्राह्मणश्रेष्ठः प्रियभाषी यदात्थ माम् ॥ ३३ ॥ तद्वोऽहमभिधास्यामि शृणुत द्विजपुंगवाः । एकदा प्रातरुत्थाय कृतमैत्रः कृताह्निकः ॥ ३४ ॥

मेरी सेवा, धैर्य और अनुकूलतासे तृप्त होकर एक समय वह प्रियभाषी श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे कहने लगा ॥ ३३ ॥ हे ब्राह्मणो ! वह मैं तुमसे वर्णन करती हूं एक समय ब्राह्मण प्रातःकाल उठकर सूर्यार्घादि कर्म कर ॥ ३४ ॥

सीते इति समाभाष्य प्रवक्तुमुप चक्रमे । शृणु सीते मया दृष्टमाश्चर्यं कमलानने ॥ ३५ ॥ दधिमंडोदकाब्धेश्चय परः स्वादूदकोब्धिकः । पुष्करद्वीपमावृत्य वर्तते वलया कृतिः ॥ ३६ ॥

हे सीते ! ऐसा संबोधन देकर कहनेकी इच्छा करने लगा, हे कमलानने जानकी, जो आश्चर्य मैंने देखा है वह सुन ॥ ३५ ॥ दही मांड और जलके सागरसे परे स्वादु जलका समुद्र है, वह पुष्करद्वीपको घेरकर वलयाकार स्थित हुआ है ॥ ३६ ॥

(९२) अद्भुतरामायण [ सप्तदश-

पुष्करं पुष्करे दृष्टं महावह्निशिखोज्ज्वलम् । पत्रायुतायुतयुतं ब्रह्मणः परमासनम् ॥ ३७ ॥ तद्द्वीपवर्षयोर्मध्ये मानसोत्तरसंज्ञकः । मर्यादापर्वतो दैर्घ्ये चायामेऽयुतयोजनः ॥ ३८ ॥

वहां महाकमल अग्निशिखाके समान प्रकाशित है दश सहस्र कर्णिकायुक्त ब्रह्माजीका परमासन है ॥ ३७ ॥ उस द्वीप और वर्षके बीचमें मानसोत्तर संज्ञावाले मर्यादापर्वत लम्बाई चौडाईमें दशसहस्र योजनके हैं ॥ ३८ ॥

तच्छैलस्य चतुर्दिक्षु इंद्रादीनां पुराणि हि । क्रीडार्थं निर्मितान्येषां महांति विश्वकर्मणा ॥ ३९ ॥ सुमाली राक्षसश्रेष्ठ कैकसी नाम तत्सुता । मुनेर्विश्रवसः पत्नी सासूत रावणद्वयम् ॥ ४० ॥

उस पर्वतकी चारों दिशाओंमें इन्द्रादि लोकपालोंके पुर हैं विश्वकर्माने उनको क्रीडाके निमित्त निर्माण किया है ॥ ३९ ॥ एक राक्षस श्रेष्ठ सुमाली जिसकी कैकसी नाम कन्या थी, वह विश्रवस मुनिकी पत्नी दो रावण उत्पन्न करती हुई ॥ ४० ॥

एकः सहस्रवदनो द्वितीयो दशवक्त्रकः । जन्मकाले सुरैरुक्तमाकाशे रावणद्वयम् ॥ ४१ ॥ लोकानां रावणाज्जातं नामयौगिकमेतयोः । कनिष्ठो दशकंठोऽयं शितिकंठप्रसादतः ॥ ४२ ॥

एक सहस्रमुखका, दूसरा, दशमुखका था, जन्मकालमें आकाशमें देवताओंने कह दिया था कि रावण दो हैं ॥ ४१ ॥ लोकमें दो रावण हुए हैं इस कारण उनका एकही नाम था उनमें छोटा यह शिवजीके प्रसादसे ॥ ४२ ॥

लंकामधिवसत्येष धनदेन विनिर्मिताम् । ब्रह्मणो वरदानेन त्रिलोकीमवमन्यते ॥ ४३ ॥ श्रेष्ठः सहस्रवदनो रावणो लोकरावणः । स्वाभाविकबलेनासौ पुष्करद्वीपमाश्रितः ॥ ४४ ॥

कुबेरकी निर्मित की हुई लंकापुरीमें निवास करता है और ब्रह्माके वरदानसे त्रिलोकीका तिरस्कार करता है ॥ ४३ ॥ इसमें जो लोकका रुवानेवाला था उसने स्वाभाविक बलसे पुष्करद्वीपका आश्रय किया है ॥ ४४ ॥

सूर्य्याचन्द्रमसौ गृह्य क्रीडेत्कंदुकलीलया ॥ कुलाचलान्समुद्गृह्य कंदुकं क्रीडते हि सः ॥ ४५ ॥ मानसोत्तरशैलस्य चतुर्दिक्षु पुराणि हि ॥ आच्छिद्य संगृहीतानि दिगीशानां महात्मनाम् ॥ ४६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९३)

यह चन्द्र सूर्यको ग्रहण कर कंदुकलीला कर सकता है तथा कुलाचल पर्वतोंको लेकर कंदुकक्रीडा करता है ॥ ४५ ॥ जो मानस सरोवरके उत्तर चारों ओर पुर हैं उनको छेदनकर महात्मा दिक्पालोंको ग्रहण किया है ॥ ४६ ॥

तत्रैव रमते राजा मातामहकुलैः सह ॥ तत्रेंद्री या पुरी रम्या स स्वयं तत्र तिष्ठति ॥ ४७ ॥ अन्यान्यन्येभ्य एवादान्मंत्रिभ्यो राक्षसाधिपः ॥ विशेषतोऽलंकृता सा पुरी परमदुर्लभा ॥ ४८ ॥

वहां वह राजा मातामहके कुलसहित रमण करता है वहां एक इंद्रकी पुरी है जहां वह स्वयं स्थित हो रमता है ॥ ४७ ॥ उस राक्षसराजने अनेकोंको मंत्रिपद प्रदान किया है, विशेष करके वह पुरीं प्राणियोंको परम दुर्लभ है । ४८ ।

जगतां सारमाकृष्य यथास्थानं सुमंडिता ॥ चंपकाशोकमन्दारकदलीप्रियकार्जुनैः ॥ ४९ ॥ पाटलाशोकजंबूभिः कोविदारैश्च चंदनैः ॥ पनसैः सालतालैश्च तमालैर्देवदारुभिः ॥ ५० ॥

जगत्के सार खेंचकर उसको निर्माण किया है, चम्पक अशोक मन्दार कदली प्रिय अर्जुन ॥ ४९ ॥ पाटल अशोक जम्बू कोविदार चन्दन पनस साल तमाल ताल देवदारु ॥ ५० ॥

बकुलैः पारिजातैश्च कल्पवृक्षैरलंकृता ॥ अन्यैश्च विविधैर्वृक्षैः सर्वर्तुकुसुस्मोज्ज्वलैः ॥ ५१ ॥ दिव्यगन्धरसैर्दिव्यैः सर्वर्तुफलसंयुतैः ॥ भ्रमरैः कोकिलैर्नानावर्णपक्षिभिरुज्ज्वला ॥ ५२ ॥

वकुल पारिजात तथा कल्पवृक्षोंसे अलंकृत और भी सब ऋतुओंके फूलोंसे युक्त ॥ ५१ ॥ दिव्य गन्धरसोंसे युक्त सम्पूर्ण ऋतुओंके फलसे संयुक्त भौंरे कोयल और जहां नाना पक्षी बोल रहे हैं ॥ ५२ ॥

शातकौंभमयैः कैश्चित्कैश्चिदग्निशिखोपमैः ॥ नीलांजलनिभैश्चान्यैः शोभिता वरपादपैः ॥ ५३ ॥ दीर्घिकाः संति बह्व्योऽत्र जल पूर्णा महोदयाः ॥ महार्हमणिसोपानाः स्फाटिकांतर्कुट्तिमाः ५४

कहीं सुवर्णके बने कहीं अग्निके शिखाके समान कहीं नीलांजन पर्वत उज्ज्वल पर्वतोंसे शोभित हैं ॥ ५३ ॥ जहां जलसे अनेक बावडी शोभित हैं जहां महा महामणियोंकी जटिल सीढी बनी हैं ॥ ५४ ॥

फुल्लपद्मोत्पलवनाश्चक्रवाकोपशो-भिताः दात्यूहगणसंघृष्टा

(९४) अद्भुतरामायण [सप्तदश-

हंससारसनादिताः ॥ ५५ ॥ तत्र तत्रावनेर्देशा वैदूर्यमणिसन्निभाः ॥
शार्दूलैः परमोपेताः सुखार्थमुपकल्पिताः ॥ ५६ ॥
फूले पद्म उत्पलके वनके वन है, उनपर चकवाचकवी शोभित हैं, पक्षीगणोंसे नादित है ॥ ५५ ॥ उस वनके देश जहां तहां वैदूर्यमणियोंसे शोभित, शार्दूललोंसे युक्त जो सुखके निमित्त कल्प किये हैं ॥ ५६ ॥

सर्वर्तुसुखदा रम्याः पुंस्कोकिलकला रवाः ॥ ये वृक्षा नंदनेऽ-
तिष्ठन् ये च चैत्रवने स्थिताः ॥ ५७ ॥ मन्दरेऽन्येषु शैलेषु ते वृक्षास्तत्र
संस्थिताः ॥ नानामणिमयी भूमिर्मुक्ताजालमयी तथा ॥ ५८ ॥
सबऋतुओंमें सुख देनेवाले पुंस्कोकिलाके शब्दोंसे युक्त जो वृक्ष नन्दनवनमें स्थित हैं जो चैत्रवनमें स्थित हैं ॥ ५७॥ जो वृक्ष मन्दराचलपर स्थित हैं जो भूमि नानामणिमय मुक्ताजालमयी ॥ ५८ ॥

विचित्रबद्धसोपानप्रासादैरुपशोभिता ॥ पुरद्वारसमाकीर्णा पुरी
परमशोभना ॥ ५९ ॥ न देवैरनुभूयेत स्वर्गिभिर्नोनुभूयते ॥ तत्पुरी-
स्थितिमाकांक्ष्य तपः कुर्वन्ति सत्तमाः ॥ ६० ॥
विचित्र सीढ़ियोंसे महलोंसे शोभित पुरद्वारोंसे आकीर्ण पुरी शोभित है ॥ ५९॥ जिसका देवता और स्वर्गी भी अनुभव नहीं कर सकते उस पुरीमें स्थितिके निमित्त महात्मा तप करते हैं ॥ ६० ॥

तस्यां सहस्त्रवदनो रावणो राक्षसाधिपः ॥ आस्ते जगद्वशीकृत्य
हेलया बाहु लीलया ॥ ६१ ॥ इंद्रादींस्त्रिदशान्सर्वान्गले बद्ध्वा स
किन्नरान् ॥ गन्धर्वान्निन्दानवान्भीमान्सर्पान्विद्याधरांस्तथा ॥ ६२ ॥
उसका राजा वह सहस्त्र मुखका रावण है, और सब जगत्को अपनी भुजाओंसे वश करके स्थित होता है ॥ ६१ ॥ वह इन्द्रादि देवताओंको किन्नरों गन्धर्वों दानव भयंकर सर्प और विद्याधरोंको पराजय कर ॥ ६२ ॥

बालक्रीडनया क्रीडन्मेरुं मन्येत सर्षपम् ॥ गोष्पदं मन्यते चाब्धि
सर्वलोकांस्तृणोपमान् ॥ ६३ ॥ द्वीपांल्लोष्टसमान्वीरो न किंचिद्गणय-
न्दृशा ॥ स यदा सर्वलोकानां त्रासने समुपारभत् ॥ ६४ ॥
उनसे बालक्रीडाके समान खेल करता हुआ मेरुको सरसोंके समान मानता है सागरको गौके पदके समान और सब लोक को तृणके समान ॥६३॥ द्वीपोंको

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९५)

मट्टीके ढेलेके समान मानता है और वीरोंको तो कुछ गिनताही नहीं है जब उसने सब लोकोंको त्रास देना आरंभ किया ॥ ६४ ॥

तदा पितामहोऽभ्येत्य पुलस्त्यो विश्रवास्तथा ॥ न्यवारयन्यत्न- स्ततं तातवत्सेति भाषकः ॥ ६५ ॥ एवं स रावणो देवि सहस्र वदनो महान् ॥ पुष्करद्वीपमासाद्य वर्तते जनकात्मजे ॥ ६६ ॥

तब पितामह पुलस्त्य और विश्रवाने आकर तात, वत्स आदि सम्बोधन देकर यत्नसे उसे निवारण किया ॥ ६५ ॥ हे देवी ! इस प्रकारका वह सहस्र वदन रावण पुष्करद्वीपमें निवास करता है ॥ ६६ ॥

तस्यानुजो दशास्योऽयं लंकायां जानकि स्थितः ॥ ६७ ॥ चित्राणीत्यादीनि मे शंसयित्वा विप्रो मासांश्चतुरो यापयित्वा ॥ राजानं मां चाशिषा योजयित्वा जगामैकः प्रोषितस्तीर्थयात्राम् ॥ ६८।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वा. आ. अद्भुतोत्तरकाण्डे सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥

हे जानकि ! उसका छोटा भाई लंकापुरीमें निवास करता है ॥ ६७ ॥ इस प्रकार और भी विचित्र कथा कह चार महीने निवास कर राजा और मुझको आशीर्वाद देकर वह ब्राह्मण तीर्थयात्राको चला गया ॥ ६८ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. वा. आदि. अद्भु. ज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां सीताभाषणं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥


अष्टादश सर्ग

रावणकी सेनाका निकलना

एवं स रावणो विप्राः सहस्रवदनो महान् ॥ प्रोक्तस्तेन द्विजेनाहं श्रुत्वाश्चर्यं च विस्मिता ॥ १ ॥ अद्यापि तन्मय हृदि जागरूकं हि वर्तते ॥ पत्या मे बाहुवीर्येण दशास्यो रावणो हतः ॥ २ ॥

हे ब्राह्मणो ! इस प्रकार उस ब्राह्मणने मुझसे सहस्र मुखवाले रावणकी कथा कही थी, जिसे सुनकर मुझे बडा विस्मय हुआ ॥ १ ॥ अबतक वह मेरे हृदयमें जागते हुएके समान वर्तता है मेरे स्वामीने भुजबलसे दशशिरवाले रावणको मारा है ॥ २ ॥

(९६) अद्भुतरामायण [अष्टादश-

सानुगः ससुतामात्यः सभ्रातृकः सबान्धवः ॥ मत्कृते च पुरी दग्धा सेतुर्बद्धश्च वारिधौ ॥ ३ ॥ सुग्रीवेण सहायेन तथा हनुमदा- दिना ॥ इदं लोकोत्तरं कर्म कृतं लोकहितं महत् ॥ ४ ॥ पुत्र अनुचर भाई बन्धुओंके सहित उसे मेरे निमित्त मारकर लंकापुरी जलायी, सागरमें पुल बांधा ॥ ३ ॥ सुग्रीव और हनुमानाजीकी सहायता लेकर यह लोकके निमित्त बडा चमत्कारी कर्म किया है ॥ ४ ॥

तथापि हृदि मे नैतदाश्चर्यं प्रतिभाति हि ॥ यदि तस्य वधं कुर्याद्रावणस्य दुरात्मनः ॥ ५ ॥ तदा संभाव्यते कीर्त्तिर्जगत्स्वास्थ्यम- वाप्नुयात् । अतो मे हसितं विप्राः क्षमध्वं ज्वलनोपमाः ॥ ६ ॥ . परन्तु तथापि मेरे हृदयमें कुछ आश्चर्य नहीं विदित होता है, जो इस दुरात्मा रावणका वध किया तब आपकी महान् कीर्ति फैलकर जगत् स्वस्थ हो जाय, हे अग्नितुल्य ब्राह्मणो ! इस कारण आप मेरे हास्यको क्षमा करो । ५ । ६

आकर्ण्य मुनयः सर्वे साधु साध्विति वादिनः । जानकीं प्रशंसंसुस्ते सर्वलोकहितैषिणीम् ॥ ७ ॥ राघवो वचनं श्रुत्वा सीताया वीर्यवर्द्धनम् सिंहनादं विनद्योच्चैः सर्वाना ज्ञापयत्प्रभुः ॥ ८ ॥ यह वचन सुनकर सब मुनि धन्य धन्य कहने लगे, और सब जगत्की हित-कारिणी जानकीकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७ ॥ रामचन्द्र सीताके वीर्यवर्द्धक वचन सुनकर सिंहनाद कर सबको आज्ञा देने लगे ॥ ८ ॥

मुनयोऽद्यैव गंतव्यं रावणस्य जयाय वै । लक्ष्मणं भरतं चैव शत्रुघ्नं चादिशत्प्रभुः ॥ ९ ॥ मित्र सुग्रीव हे राजन्सर्वे जांबवदादयः । गच्छामः सहितास्तत्र सैनिकैः सह मंत्रिभिः ॥ १० ॥ हे मुनियो ! आजही हम रावणको जीतने जाते हैं लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको प्रभुने आज्ञा दी ॥ ९ ॥ हे राजन् सुग्रीव ! मित्र और सम्पूर्ण सैनिकजनोंके सहित हम वहां जायेंगे ॥ १० ॥

इत्याज्ञाप्य महाबाहुः सस्मार पुष्पकं रथम् । स्मरणादागतस्तत्र पुष्कको रथसत्तमः ॥ ११ ॥ तत्रारुक्षन्महावीरारामाचन्द्रपुरो- गमाः । भरतो लक्ष्मणश्चैव शत्रुघ्नश्चामितद्युतिः १२ । - वह महाबाहु इस प्रकार कहकर पुष्पकको स्मरण करते हुए वह पुष्पक .