भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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पृष्ठ 87
(८०)अद्भुतरामायणंचतुर्दश-

मुझसे यह जगत् पूर्ण होकर अन्तमें लय करलिया जाता है, मैंही भगवान् ईश स्वयंज्योति सनातन हूँ ॥ ४७ ॥ परमात्मा परब्रह्म हूँ मुझसे अधिक कोई नहीं है यह तुमको परज्ञान मैंने कथन किया है ॥ ४८ ॥

ज्ञात्वा विमुच्यते जंतुर्जन्म संसारबंधनात् ॥ मायामाश्रित्य जातोऽहं गृहे दशरथस्य हि ॥ ४९ ॥ रामोऽहं लक्ष्मणो ह्येष शत्रुघ्नो भरतोऽपि च ॥ चतुर्धा संप्रभूतोऽहं कथितं तेऽनिलात्मज ॥ ५० ॥

इसको जानकर प्राणी संसारके जन्ममरणसे छूट जाता है, मायाके आश्रित हो, मैं दशरथके यहां जन्म ले आया हूँ ॥ ४९ ॥ मैं ही राम लक्ष्मण शत्रुघ्न और भरत यह चार प्रकारसे अपने रूपको प्रकटकर स्थित हूँ ॥ ५० ॥

मायास्वरूपं च तव कथितं यत्प्लवंगम॥ *कृपया तद्धृदा धार्यं न विस्मर्त्तव्यमेव हि ॥ ५१ ॥ येनेयं पठ्यते नित्यं संवादो भवतो मम ॥ जीवन्मुक्तो भवेत्सोऽपि सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५२ ॥

हे महावीर ! जो मैंने यह तुमसे रूप कथन किया है यह श्रद्धासे हृदयमें धारण करना भूलना नहीं ॥ ५१ ॥ जो यह हमारा संवाद नित्य पढेंगे वह जीवन्मुक्त हो सब पापोंसे छूट जायँगे ॥ ५२ ॥

श्रावयेद्वा द्विजाञ्छुद्धांन्ब्रह्मचर्यपरायणान् ॥ यो वा विचारयेदर्थं स याति परमां गतिम् ॥ ५३ ॥ यश्चैतच्छृणुयान्नित्यं भक्तियुक्तो दृढव्रतः ॥ सर्वपापविनिर्मुक्तो ब्रह्म लोके महीयते ॥ ५४ ॥

जो ब्रह्मचर्यमें परायण ब्राह्मणोंको सुनावेंगे, वा जो इसका अर्थ विचारेंगे, वे परमगतिको प्राप्त होंगे ॥ ५३ ॥ जो अभियुक्त दृढव्रत हो इसे नित्य सुनेंगे वह सब पापरहित हो ब्रह्मलोकको प्राप्त होंगे ॥ ५४ ॥

तस्मात्सर्वप्रयत्नेन पठितव्यो मनीषिभिः । श्रोतव्यश्चापि मंतव्यो विशेषाद्ब्राह्मणैः सदा ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भग-
वद्धनुमत्संवादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥

इस कारण सब प्रयत्नोंसे विद्वानोंको यह पढना और मनन करना चाहिये और विशेष कर ब्राह्मणोंको विचारना चाहिये ॥ ५५ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा० वाल्मीकीये आदि० अद्भु० भाषाटीकायां भगवद्धनुमत्सं-
वादो नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥


* श्रद्धया इति पाठ ।