भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 86

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७९)

भूत राक्षस पिशाच सब स्वयंभूकी आज्ञामें स्थित हैं कला काष्ठा निमेष मुहूर्त दिवस ॥ ३७ ॥ ऋतु वर्ष महीना पखवारा युग मन्वन्तर सब परमात्माके शासनमें स्थित हैं ॥ ३८ ॥

पराश्चैव परार्द्धाश्च कालभेदास्तथापरे ॥ चतुर्विधानि भूतानि स्थावराणि चराणि च ॥ ३९ ॥ नियोगादेव वर्तंते सर्वाण्येव स्वयंभुवः ॥ पत्तनानि च सर्वाणि भुवनानि च शासनात् ॥ ४० ॥

परा परार्द्ध जितने कालके भेद हैं, चार प्रकारके भूत स्थावर चर ॥ ३९ ॥ सब स्वयंभूके नियोगसे वर्तते हैं, सब पत्तन और भुवन उसीकी आज्ञासे वर्तते हैं ॥ ४० ॥

ब्रह्मांडानि च वर्तंते देवस्य परमात्मनः ॥ अतीतान्यप्यसंख्यानि ब्रह्मांडानि महाज्ञया ॥ ४१ ॥ प्रवृत्तानि पदार्थाघैः सहितानि समं ततः ॥ ब्रह्मांडानि भविष्यंति सह वस्तुभिरात्मगैः ॥ ४२ ॥

असंख्य ब्रह्माण्ड भी उस परमात्माकी आज्ञासे ही वर्तते हैं ॥ ४१ ॥ सब प्रवृत्त हुए पदार्थसमूहोंके साथै ब्रह्मांड अपनी २ वस्तुओंके साथ होते हैं ॥ ४२ ॥

हरिष्यंति सहैवाज्ञां परस्य परमात्मनः ॥ भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ॥ ४३ ॥ भूतादिरादिप्रकृतिर्नियोगान्मम वर्तते ॥ याऽशेषसर्वजगतां मोहिनी सर्वदेहिनाम् ॥ ४४ ॥

वह सब परमात्माकी आज्ञाको वहन करते हैं, भूमि जल अग्नि वायु आकाश मन बुद्धि ॥ ४३ ॥ भूतादि आदि प्रकृति यह सब मेरी आज्ञासेही वर्तते हैं, जो सम्पूर्ण जगत् और देहधारियोंकी मोहिनी है ॥ ४४ ॥

मायापि वर्तते नित्यं सापीश्वरनियोगतः ॥ विधूय मोहकलिलं यथा पश्यति तत्पदम् ॥ ४५ ॥ सापि विद्या महेशस्य नियोगाद्वशवर्तिनी ॥ बहुनात्र किमुक्तेन मम शक्त्यात्मकं जगत् ॥ ४६ ॥

मायाभी नित्य ईश्वरकी आज्ञासे वर्तती है जिसके द्वारा मोहको दूर कर तत्पद देखा जाता है ॥ ४५ ॥ यह विद्या महेशके नियोगसे वशवर्तिनी है, बहुत कहनेसे क्या है यह जगत् मेरी शक्त्यात्मक हैं ॥ ४६ ॥

मयैव पूर्यते विश्वं मय्येव प्रलयं व्रजेत् ॥ अहंहि भगवानीशः स्वयंज्योतिः सनातनः ॥ ४७ ॥ परमात्मा परंब्रह्म मत्तो ह्यन्यन्न विद्यते ॥ इत्येतत्परमं ज्ञानं भवते कथितं मया ॥ ४८ ॥