भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 173 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

(७४) अद्भुतरामायण [ त्रयोदश-

तेऽपि मां प्राप्नुवंत्येव नावर्तंते च वै पुनः ।। मया ततमिदं कृत्स्ने- मेतद्यो वेद सोऽमृतः ।। २५ ।। पश्याम्यशेषमेवेदं वर्तमानं स्वभा- वतः ।। करोति काले भगवान्महायोगेश्वरः स्वयंम् ।। २६ ।। वे भी मुझको प्राप्त होकर फिर संसारमें नहीं गिरते हैं, मैंने इस जगत्को विस्तार कर रक्खा है जो इसे जानता है सो अमृत होता है ।। २५ ।। मैं स्वभाव- से इस जगत्को वर्तमानके समान देखता हूँ, समयपर महायोगेश्वर भगवान् इसको कहते हैं ।। २६ ।।

योगं संप्रोच्यते योगी मायी शास्त्रेषु सूरिभिः ।। योगेश्वरोऽसौ भगवान्महादेवो महान्प्रभुः ।। २७ ।। महत्त्वात्सर्वसत्त्वानां परत्वा- त्परमेश्वरः ।। प्रोच्यते भगवान्ब्रह्मा महान्ब्रह्ममयो यतः ।। २८ ।। वही योगी मायी शास्त्रोंमें योगरूपसे कहा जाता है वह योगरूपसे कहा जाता है वह योगेश्वर भगवान् महायोगेश्वर महाप्रभु है ।। २७ ।। महत्तत्त्व होनेसे सब जीवोंका पर होनेसे परमेश्वर है, वह महान् ब्रह्ममय होनेसे ब्रह्मा कहलाते हैं ।। २८ ।।

यो मामेवं विजानाति महायोगेश्वरेश्वरम् ।। सोऽविकंपेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ।। २९ ।। सोऽहं प्रेरयिता देवः परमा- नन्दमाश्रिताः ।। तिष्ठामि योगी सततं यस्तद्वेद स वेदवित् ।। ३० ।। जो इस प्रकार मुझको महायोगेश्वर जानता है वह अविकम्पयोगसे युक्त होता है इसमें सन्देह नहीं ।। २९ ।। सो मैं परमानन्दरूपसे प्रेरणा किया हुआ सबके आश्रित हूँ नित्ययोगमें स्थित रहता हूँ जो इसको जानता है वह वेदको जानता है ।। ३० ।।

इति गुह्यतमं ज्ञानं सर्ववेदेषु निश्चितम् ।। प्रसन्नचेतसे देयं धार्मिका याहिताग्नये ।। ३१ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकांडे भक्तियोगो नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।

यह गुप्त ज्ञान सब वेदोंका सम्मत है, यह प्रसन्नचित्तवाले धर्मात्माओंको देना चाहिये जो अग्निहोत्र करनेवाले हैं ।। ३१ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामयणे वाल्मी. अद्भु. भाषाटी. भक्तियोगो नाम त्रयोदशः सर्गः ।। १३ ।।