अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
पृष्ठ 80, कुल 173 में से
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अहं वै सर्व संसारान्मोचको योगिनामिह ॥ संसारहेतुरेवाहं सर्वसंसारवर्जितः ॥ १७ ॥ अहमेव हि संहर्ता स्रष्टाहं परिपालकः ॥ मायावी मामिका शक्तिर्माया लोकविमोहिनी ॥ १८ ॥
में ही योगियोंके साथ सब संसारका मोचक हूँ, मैं ही सब संसारसे रहित सब संसारका हेतु हूँ ॥ १७ ॥ मैंही संहार करनेवाला और निर्माता तथा परिपालन करनेवाला हूँ मायावी मेरी शक्ति सब लोकको मोहित करती है ॥ १८ ॥
ममैव च परा शक्तिर्या सा विद्येति गीयते । नाशयामि तया मायां योगिनां हृदि संस्थितः ॥ १९ ॥ अहं हि सर्वशक्तीनां प्रवर्तकनिवर्तकः ॥ आधारभूतः सर्वासां निधानममृतस्य च ॥ २० ॥
वह मेरीही शक्ति विद्यानामसे गायी जाती है, योगियोंके हृदयमें स्थित हो मैं उस मायाको दूर करता हूँ ॥ १९ ॥ मैं ही सब शक्तियोंका प्रवृत्त करनेवाला हूँ, सबका आधारभूत हो अमृतका निधान हूँ ॥ २० ॥
एका सर्वांतरा शक्तिः करोति विविधं जगत् ॥ भूत्वा नारायणोऽनंतो जगन्नाथो जगन्मयः ॥ २१ ॥ तृतीया महती शक्तिर्निहंति सकलं जगत् ॥ तामसी मे समाख्याता कालात्मा रुद्ररूपिणी ॥ २२ ॥
एकही सर्वांतरा शक्ति जगत्को अनेक प्रकारसे करती है, वह जगन्नाथ अविनाशी नारायण जगन्नाथ है ॥ २१ ॥ तीसरी महान् शक्ति सो जगत्को निर्माण करती है वह तामसी रुद्ररूपिणी कलात्मा रुद्ररूपवाली है ॥ २२ ॥
ध्यानेन मां प्रपश्यंति केचिज्ज्ञानेन चापरे ॥ अपरे भक्तियोगेन कर्मयोगेन चापरे ॥ सर्वेषामेव भक्तानामेष प्रियतरो मम ॥ २३ ॥ यो विज्ञानेन मां नित्यमाराधयति नान्यथा ॥ अन्येच ये त्रयो भक्ता मदाराधनकांक्षिणः ॥ २४ ॥
कोई मुझे ध्यानसे और कोई ज्ञानसे देखते हैं, कोई भक्तियोग और कोई कर्मयोगसे मुझको देखते हैं सब भक्तोंमें मुझे यह सबसे अधिक प्रिय है ॥ २३ ॥ जो ज्ञानसे मेरी नित्य आराधना करता है और जो दूसरे तीन प्रकार भक्त मेरी आराधनाके करनेवाले हैं ॥ २४ ॥