भारतकोश
अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

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(२) अद्भुतरामायण [प्रथम-

तमसातीरनिलयं निलयं तपसां गुरुम् । वचसां प्रथमस्थानं वाल्मीकिं मुनिपुंगवम् ॥ १ ॥ विनयावनतो भूत्वा भरद्वाजो महा- मुनिः । अपृच्छत्सम्मतः शिष्यः कृतांजलिपुटो वशी ॥ २ ॥

तमसातीरनिवासी तपस्वियोंके गुरु वाणीके प्रथम स्थान वाल्मीकी मुनिश्रेष्ठसे ॥ १ ॥ विनयसे नम्र हो भरद्वाज महामुनिसम्मत शिष्य जितेंद्रिय हाथ जोडकर कहने लगे ॥ २ ॥

रामायणमिति ख्यातं शतकोटिप्रविस्तरम् । प्रणीतं भवता यच्च ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ श्रूयते ब्राह्मणैर्नित्यमृषिभिः पितृभिः सुरैः । पंचविंशतिसाहस्रं रामायणमिदं भुविः ॥ ४ ॥

जो कि, सौ करोड श्लोकोंमें रामायणका विस्तार कहा है और जो आपकी बनाई ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥ जिसको ब्राह्मण पितर देवता नित्य श्रवण करते हैं, जिसमेंसे पृथ्वीमें २५००० सहस्त्र रामायण हैं ॥ ४ ॥

तदाकर्णितमस्माभिः सविशेषं महामुने । शतकोटिप्रविस्तारे रामायणमहार्णवे ॥ ५ ॥ किं गीतमिह मुष्णाति तन्मे कथय सुव्रत । आकर्ण्यादरिणः पृष्टं भरद्वाजस्य वै मुनिः ॥ ६ ॥

हे महामुनिराज ! वह हमने सुनी है, परन्तु रामायणके सौ करोड विस्तार में ॥ ५ ॥ वह क्या कथा गुप्त है, हे सुव्रत ! हमसे आप वर्णन कीजिये, इस प्रकार भरद्वाजका प्रश्न सुनकर मुनिराजने ॥ ६ ॥

हस्तामलकवत्सर्वं सस्मार शतकोटिकम् । ओमित्युक्त्वा मुनिः शिष्यं प्रोवाच वदतां वरम् ॥ ७ ॥ भरद्वाज चिरं जीव साधु स्मारित- मद्य नः । शतकोटिप्रविस्तारे रामायणमहार्णवे ॥ ८ ॥

हस्तामलकके समान सम्पूर्ण रामचरित्रका स्मरण किया, बहुत अच्छा यह वचन मुनिराजने अपने शिष्यसे कहा ॥ ७ ॥ हे भरद्वाज ! तुम बहुत दिनोंतक जीओ, हमको अच्छा चरित्र स्मरण कराया, सौ करोडके विस्तार-वाले रामायण महासागरमें ॥ ८ ॥

रामस्य चरितं सर्वमाश्चर्यं सम्यगीरितम् । पंचविंशतिसाहस्रं नृलोके यत्प्रतिष्ठितम् ॥ ९ ॥ नृणां हि सदृशं रामचरितं वर्णितं ततः । सीतामाहात्म्यसारं यद्विशेषादत्र नोक्तवान् ॥ १० ॥

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