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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

Digitized by Sarayu Foundation Trust, Delhi and eGangotri. Funding by IKS

(२) अद्भुतरामायण [प्रथम-

तमसातीरनिलयं निलयं तपसां गुरुम् । वचसां प्रथमस्थानं वाल्मीकिं मुनिपुंगवम् ॥ १ ॥ विनयावनतो भूत्वा भरद्वाजो महा- मुनिः । अपृच्छत्सम्मतः शिष्यः कृतांजलिपुटो वशी ॥ २ ॥

तमसातीरनिवासी तपस्वियोंके गुरु वाणीके प्रथम स्थान वाल्मीकी मुनिश्रेष्ठसे ॥ १ ॥ विनयसे नम्र हो भरद्वाज महामुनिसम्मत शिष्य जितेंद्रिय हाथ जोडकर कहने लगे ॥ २ ॥

रामायणमिति ख्यातं शतकोटिप्रविस्तरम् । प्रणीतं भवता यच्च ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ श्रूयते ब्राह्मणैर्नित्यमृषिभिः पितृभिः सुरैः । पंचविंशतिसाहस्रं रामायणमिदं भुविः ॥ ४ ॥

जो कि, सौ करोड श्लोकोंमें रामायणका विस्तार कहा है और जो आपकी बनाई ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥ जिसको ब्राह्मण पितर देवता नित्य श्रवण करते हैं, जिसमेंसे पृथ्वीमें २५००० सहस्त्र रामायण हैं ॥ ४ ॥

तदाकर्णितमस्माभिः सविशेषं महामुने । शतकोटिप्रविस्तारे रामायणमहार्णवे ॥ ५ ॥ किं गीतमिह मुष्णाति तन्मे कथय सुव्रत । आकर्ण्यादरिणः पृष्टं भरद्वाजस्य वै मुनिः ॥ ६ ॥

हे महामुनिराज ! वह हमने सुनी है, परन्तु रामायणके सौ करोड विस्तार में ॥ ५ ॥ वह क्या कथा गुप्त है, हे सुव्रत ! हमसे आप वर्णन कीजिये, इस प्रकार भरद्वाजका प्रश्न सुनकर मुनिराजने ॥ ६ ॥

हस्तामलकवत्सर्वं सस्मार शतकोटिकम् । ओमित्युक्त्वा मुनिः शिष्यं प्रोवाच वदतां वरम् ॥ ७ ॥ भरद्वाज चिरं जीव साधु स्मारित- मद्य नः । शतकोटिप्रविस्तारे रामायणमहार्णवे ॥ ८ ॥

हस्तामलकके समान सम्पूर्ण रामचरित्रका स्मरण किया, बहुत अच्छा यह वचन मुनिराजने अपने शिष्यसे कहा ॥ ७ ॥ हे भरद्वाज ! तुम बहुत दिनोंतक जीओ, हमको अच्छा चरित्र स्मरण कराया, सौ करोडके विस्तार-वाले रामायण महासागरमें ॥ ८ ॥

रामस्य चरितं सर्वमाश्चर्यं सम्यगीरितम् । पंचविंशतिसाहस्रं नृलोके यत्प्रतिष्ठितम् ॥ ९ ॥ नृणां हि सदृशं रामचरितं वर्णितं ततः । सीतामाहात्म्यसारं यद्विशेषादत्र नोक्तवान् ॥ १० ॥

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सर्ग] हिन्दीटीकासहित १(३)

रामका सब चरित्र आश्चर्य रूप है, जो पचीस सहस्र रामायणमनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ९ ॥ वह रामचरित्र मनुष्योंके समान वर्णन किया है उनमें सीतामाहात्म्य विशेष करके नहीं कहा है ॥ १० ॥

शृणुष्वावहितो ब्रह्मन्काकुत्स्थचरितं महत् । सीताया मूलभूतयाः प्रकृतेश्चरितं महत् ॥ ११ ॥ आश्चर्यमाश्चर्यमिदं गोपितं ब्रह्मणो गृहे । हिताय प्रियशिष्याय तुभ्यमावेदयामि तत् ॥ १२ ॥

हे ब्रह्मन् ! उस बड़े रामचरितको सावधान होकर सुनिये, जो मूलप्रकृति जानकीका चरित्र है ॥ ११ ॥ यह परम आश्चर्यरूप ब्रह्माजीके स्थानमें गुप्तरूप हैं, सो तुम हितकारी प्रिय शिष्यके निमित्त मैं वर्णन करता हूँ ॥ १२ ॥

जानकी प्रकृतिः सृष्टेरादिभूता महागुणा । तपःसिद्धिः स्वर्गसिद्धिर्भूतिर्मूर्तिमती सती ॥ १३ ॥ विद्याविद्या च महती गीयते ब्रह्मवादिभिः । ऋद्धिः सिद्धिर्गुणमयी गुणातीता गुणात्मिका ॥ १४ ॥

जानकी सृष्टिकी प्रकृति रूप आदिभूत महागुणसंपन्न है, तपकी सिद्धि स्वर्गकी सिद्धि ऐश्वर्यरूप मूर्तिमान् सती है ॥ १३ ॥ ब्रह्मवादी इसहीको विद्या अविद्यारूपसे गाते हैं, यही ऋद्धि सिद्धि गुणमयी गुणातीत गुणात्मिका है ॥ १४ ॥

ब्रह्मब्रह्मांडसंभूता सर्वकारणकारणम् । प्रकृतिर्विकृतिर्देवी चिन्मयी चिद्विलासिनी ॥ १५ ॥ महाकुण्डलिनी सर्वानुस्यूता ब्रह्मसंज्ञिता । यस्या विलसितं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ १६ ॥

ब्रह्म ब्रह्माण्डका इसहीसे सम्भव है, यही सर्व कारणकी कारण है, यही देवी प्रकृतिविकृतिस्वरूपा चिन्मयी चिद्विलासिनी है ॥ १५ ॥ यही सबही प्रगट करनेवाली महाकुण्डलिनी है, ब्रह्मसंज्ञा इसीकी है, यह चराचर जगत् इसीसे विलसित है ॥ १६ ॥

यामाधाय हृदि ब्रह्मन्योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । विघट्टयंति हृद्ग्रंथिं भवंति सुख मूर्तिकाः ॥ १७ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति सुव्रत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा प्रकृति संभवः ॥ १८ ॥

हे ब्रह्मन् ? तत्त्वदर्शी योगी जिसको हृदयमें धारणकर हृदयकी अज्ञानग्रंथि नष्ट कर सुखी होते हैं ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! जब जब धर्मकी ग्लानि होती है, तब तब अधर्मके नष्ट करनेको प्रकृतिका सम्भव होता है ॥ १८ ॥

(४) अद्भुतरामायण [ प्रथम-

रामः साक्षात्परं ज्योतिः परं धाम परः पुमान् ॥ आकृतौ परमो भेदो न सीतारामयोर्यतः ॥ १९ ॥ रामः सीता जानकी रामभद्रो नाणुर्भेदो नैतयोरस्ति कश्चित् । सन्तो बुद्ध्वा तत्त्वमेतद्विबुद्धाः पारं याताः संसृतेर्मृत्युवक्त्रात् ॥ २० ॥

राम साक्षात् परं ज्योति परंधाम परपुरुष हैं, मूर्तिमें सीतारामका कुछ भी भेद नहीं है ॥ १९ ॥ राम, सीता, जानकी, रामभद्र इनमें अणुमात्र भी भेद नहीं है सन्त इस तत्वको जानकर ज्ञानको प्राप्त होते हैं मृत्युके मुखजन्म मरणसे छूट तत्त्वज्ञानको प्राप्त होते हैं ॥ २० ॥

रामोऽर्चिन्त्यो नित्यचित्सर्वसाक्षी सर्वान्तः स्थः सर्वलोकैककर्ता । भर्त्ता हर्त्तानंदमूर्तिर्विभूमा सीतायोगाच्चिन्त्यते योगिभिःसः ॥ २१ ॥ अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः । स वेत्ति विश्वं नहि तस्य वेत्ता तमाहुरन्यं पुरुषं पुराणम् ॥ २२ ॥

राम अचिन्त्य, चित्स्वरूप सर्वके साक्षी सबके अंतःकरणमें स्थित सब लोकके एक कर्ता है, भर्त्ता हर्त्ता आनंदमूर्ति विभूमा सीताके योगसे जिनका चिंतन होता है ॥ २१ ॥ भौतिक चरण हस्तादिसे रहित होकर यह सर्वत्र व्याप्तरूप गमन और सर्वत्र ग्रहण करनेवाले हैं यह विश्वको जानते हैं परन्तु उनका जाननेवाला कोई नहीं है, उनको अन्य और पुराणपुरुष कहते हैं ॥२२॥

तयोः परं जन्म उदाहरिष्ये ययोर्यथाकारणदेहधारिणोः । अरूपिणो रूपविधारणं पुनर्नृणां महानुग्रह एव केवलम् ॥ २३ ॥ पठन् द्विजो वागॄषभत्वमीयात्क्षत्रान्वयो भूमिपतित्वमीयात् । वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयाच्छृण्वन्हि शूद्रोहि महत्त्वमीयात् ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामयाणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकांडे आदिकाव्ये प्रथमः सर्गः ॥१॥

उन दोनोंके परम जन्मको कहूँगा, जिस कारण उन दोनोंने देह धारण किया है उन अरूपीका देह धारण करना केवल मनुष्योंके हितके ही निमित्त है ॥ २३ ॥ इसके पढनेसे ब्राह्मण श्रेष्ठवाणीको प्राप्त होता है क्षत्रिय पृथ्वीपति होता है, वैश्य पण्यफलको प्राप्त होता है, शूद्र सुनकर महत्त्वको प्राप्त होता है ॥ २४ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामयाणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे आदिकाव्ये पंडित–ज्वालाप्रसादजी मिश्रकृतभाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥१॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५)

द्वितीय सर्ग

अम्बरीषराजा को नारायण का वर देना

भरद्वाज शृणुष्वाथ रामचन्द्रस्य धीमतः ।। जन्मनः कारणं विप्र इक्ष्वाकुकुलवारिधौ ।। १ ।। सीतायाश्च महादेव्याः पृथिव्यां जन्महेतुकम् । तत्र रामकथामादौ वक्ष्यामि मुनिपुंगव ।। २ ।।

हे भरद्वाज ! इक्ष्वाकुकुलसागरमें जिस प्रकार रामचन्द्रका जन्म हुआ सो आप सुनो ॥ १ ॥ और महादेवी सीताका भी पृथ्वीमें जन्म लेनेका कारण सुनो; हे मुनिश्रेष्ठ ! उसमें प्रथम मैं रामकथा वर्णन करता हूँ ॥ २ ॥

श्रूयतां मुनिशार्दूल अंबरीषकथालयम् । पुरुषोत्तममाहात्म्यं सर्वपापहरं परम् ।। ३ ।। त्रिशंकोर्दयिता भार्या सर्वलक्षणशोभिता । अंबरीषस्य जननी नित्यं शौचसमन्विता ।। ४ ।।

हे मुनिश्रेष्ठ ! अम्बरीषसंबंधी कथानकको आप हमसे श्रवण कीजिये यह पुरुषोत्तम माहात्म्य सब पापका हरनेवाला है ॥ ३ ॥ त्रिशंकुकी प्रिया (भार्या) सब लक्षणोंसे शोभित थी वह अम्बरीषकी जननी नित्य पवित्रतासे युक्त थी ॥ ४ ॥

योगनिद्रां समारूढं शेषपर्यंकशायिनम् । नारायणं महात्मानं ब्रह्मांडकमलोद्भवम् ।। ५ ।। तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकांडजम् । सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं सर्वदेवनमस्कृतम् ।। ६ ।।

योगनिद्रामें आरूढ शेषशय्यापर शयन करनेवाले महात्मा नारायण ब्रह्माण्ड और ब्रह्माके निर्माताको ॥ ५ ॥ जो तमोगुणयुक्त हो कालरुद्र कहाते हैं, रजोगुणसे ब्रह्मारूप होते हैं, सतोगुणसे सबके नमस्कारयोग्य विष्णुरूप होते हैं ॥ ६ ॥

अर्चयामास सततं वाङ्मनःकायवृत्तिभिः । माल्यदामादिकं सर्वं स्वयमेव व्यचीकरत् ।। ७ ।। गंधादिपेषणं चैव धूपद्रव्यादिकं तथा तत्सर्वं कौतुकाविष्टा स्वयमेव चकार सा ।। ८ ।।

उनको वचन मन कर्मसे निरन्तर अर्चना करती थी और माला आदि अपने हाथ लेकर सेवा करती थी ॥ ७ ॥ गंधादिका पेषण धूप दीपादिका करना यह कौतुकाक्रान्त होकर सब आपही करती थी ॥ ८ ॥

(६) अद्भुतरामायण [ द्वितीय-

शुभा पद्मावती नित्यं वचो नारायणेति च । अनंतेति च सा नित्यं भाषमाणा यतव्रता ॥ ९ ॥ दशवर्षसहस्राणि तत्परेणांतरात्मना । अर्चयामास गोविंदं गंधपुष्पादिभिः शुभैः ॥ १० ॥

और यह पद्मावती नित्य "नमो नारायणाय" ऐसा उच्चारण करती थी और अनन्त नाम उच्चारण करती थी ॥ ९ ॥ दससहस्रवर्षतक परमप्रेमसे गन्धपुष्पादिसे गोविन्दकी पूजा करती रही ॥ १० ॥

विष्णुभक्तान्महाभागान्सर्वपाप विवर्जितान् । दानमानार्चनैर्नित्यं धनै रत्नैर्तोषयत् ॥ ११ ॥ ततः कदाचित्सा देवी द्वादश्यां समुपोष्य वै । हरेरग्रे महाभागा सुष्वाप पतिना सह ॥ १२ ॥

पापरहित महात्मा विष्णु भक्तोंको दान मान धन रत्नसे नित्य सन्तुष्ट करती थी ॥ ११ ॥ एक समय वह देवी द्वादशीमें व्रत कर पतिके सहित नारायणके आगे सो रही ॥ १२ ॥

तत्र नारायणो देवस्तामाह पुरुषोत्तमः । किमिच्छसि वरं भद्रे मत्ततः किं ब्रूहि भामिनि ॥१३॥ सा दृष्ट्वा तं वरं वव्रे पुत्रस्त्वद्भक्तिमान्भवेत् । सार्वभौमो महातेजाः स्वकर्मनिरतः शुचिः ॥ १४ ॥

तब नारायण पुरुषोत्तमने उसे कहा हे भामिनी ! तुम क्या इच्छा करती हो ॥ १३ ॥ उसने कहा अपनी भक्तिवाला पुत्र दीजिये और सार्वभौम महातेजस्वी अपने कर्ममें निरत तथा पवित्र हो ॥ १४ ॥

तथेत्युक्त्वा ददौ तस्यै फलमेकं जनार्दनः । सा प्रबुद्धा फलं दृष्ट्वा भर्त्रे सर्वं निवेद्य च ॥ १५ ॥ भक्षयामास संदर्श्य फलं तद्धृष्टमानसा । ततः कालेन सा देवी पुत्रं कुलविवर्द्धनम् ॥ १६ ॥

यह सुन जनार्दनने उसके निमित्त एक फल दिया वह फलको देख जाग उठी और यह सब कुछ स्वामीसे निवेदन करके ॥ १५ ॥ प्रसन्न हो उस फलको खागई; तब समय पर देवीने कुलवर्द्धन पुत्र ॥ १६ ॥

असूयत शुभाचारं वासुदेवपरायणम् । शुभलक्षणसम्पन्नं चक्रांकितमनुत्तमम् ॥ १७ ॥ जातं दृष्ट्वा पिता पुत्रं क्रियाः सर्वाश्चकार वै । अम्बरीष इति ख्यातो लोके समभवत्प्रभुः ॥ १८ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (७)

सुन्दर आचरणयुक्त वासुदेवपरायणको उत्पन्न किया । जो शुभलक्षणसे सम्पन्न पौरुओंमें चक्रादि अंकित श्रेष्ठ था ॥ १७ ॥ पुत्रको उत्पन्न हुआ देखकर राजाने सम्पूर्ण क्रिया की और लोकमें अम्बरीष नामसे वह विख्यात हुआ ॥ १८

पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तोमहात्मभिः । मंत्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः ॥ १९ ॥ संवत्सर सहस्रं वै जगन्नारायणं प्रभुम् । हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यगम् ॥ २० ॥

पिताके उपराम होनेमें उसका राज्याभिषेक हुआ, तब अम्बरीषने मन्त्रीजनोंको राज्य सौंपकर वनमें जाकर तप किया ॥ १९ ॥ सहस्रसंवत्सरतक नारायणका जप किया, हृदयकमलके मध्यमें तथा सूर्यमें नारायणका जप करते हुए ॥ २० ॥

शंखचक्रगदापद्मं धारयंतं चतुर्भुजम् । शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ॥ २१ ॥ सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम्। श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम् ॥ २२ ॥

तब शंख चक्र गदा पद्म धारण करनेवाले चतुर्भुज शुद्ध सुवर्णके समान कान्तिमान् ब्रह्मा विष्णु शिवात्मकरूप ॥ २१ ॥ सम्पूर्ण आभरणोंसे युक्त पीतांबरधारी प्रभु श्रीवत्स वक्षस्थलमें धारण किये पुरुषोत्तम देव ॥ २२ ॥

ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः । आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमसकृतः ॥ २३ ॥ ऐरावतमिवार्चित्ये कृत्वा वै गरुडं हरिः । स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम् ॥ २४ ॥

गरुडपर चढे देवर्षियोंसे स्तुतिको प्राप्त सब लोकोंसे नमस्कारको प्राप्त हुए नारायण आये ॥ २३ ॥ और गरुडको अचिन्त्य ऐरावतके समान करके और इन्द्रका रूप स्वयं धारण कर उसके निकट आकर यह कहने लगे ॥ २४ ॥

इंद्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि तवाद्य वै । सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः ॥ २५ ॥ अम्बरीषस्तु तं दृष्ट्वा शक्रमैरावतस्थितम् । उवाच वचनं धीमान्विष्णुभक्तिपरायणः ॥ २६ ॥

हे राजन् ! मैं इन्द्र हूं तुम्हारा मंगल हो तुम्हारे निमित्त मैं क्या वस्तु दूं मैं सर्वलोकेश्वर तुम्हारी रक्षा करनेको आया हूं ॥ २५ ॥ अम्बरीष राजा ऐरावतपर स्थित हुए इन्द्रको देखकर विष्णुभक्तिमें परायण इस प्रकारके वचन कहने लगे ॥ २६ ॥

(८) . अद्भुतरामायण [ द्वितीय-

नाहं त्वामभिसंधाय तप आस्थितवानिह । त्वया दत्तं च नेच्छामि गच्छ शक्र यथासुखम् ॥ २७ ॥ मम नारायणो नाथस्त्वां न तोष्येऽ- मराधिप । व्रजेन्द्र मा वृथास्त्वत्र ममाश्रमविलोपनम् ॥ २८ ॥

कि, मैंने आपके उद्देशसे तप नहीं किया है । आपकी दीहुई वस्तुकी मुझे इच्छा नहीं, आप यथेच्छ गमन करिये ॥ २७ ॥ हे इन्द्र ! मेरे स्वामी नारायण हैं मैं आपसे कुछ नहीं चाहता, आप पधारिये इस आश्रममें वृथा कालका व्यय न कीजिये ॥ २८ ॥

ततः प्रहस्य भगवान्स्वरूपमकरोद्धरिः । शार्ङ्गचक्रगदापाणिः शंखहस्तो जनार्दनः ॥ २९ ॥ गरुडोपरि विश्वात्मा नीलाचल इवा- परः । देवगन्धर्वसंघैश्च स्तूयमानः समंततः ॥ ३० ॥

तब नारायणने हँसकर अपना स्वरूप प्रगट किया । शार्ङ्ग, चक्र, गदा और शंख, हाथमें लिये ॥ २९ ॥ जनार्दन विश्वात्मा गरुडपर दूसरे नीलाचलके समान देव और गन्धर्वोके समूहोंसे सब और स्तुतिको प्राप्त हुए भगवान्को देख ॥ ३० ॥

प्रणम्य राजा संतुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम् । प्रसीद लोकनाथस्त्वं मम नाथ जनार्दन ॥ ३१ ॥ कृष्ण कृष्ण जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत । त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः ॥ ३२ ॥

राजा प्रणाम कर गरुडध्वजको सन्तुष्ट करने लगा, मेरे नाथ ! जनार्दन, लोकनाथ ! आप हमारे ऊपर प्रसन्न हूजिये ॥ ३१ ॥ हे कृष्ण, हे कृष्ण ! हे जगन्नाथ हे सर्वलोकसे नमस्कृत, आदि अनादि, अनंत, प्रभु हो ॥ ३२ ॥

अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः । महेश्वरांशजो मध्यः पुष्करः खगगः खगः ॥ ३३ ॥ कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः प्रभंजनः । आदिदेवः क्रियानंदः परमात्मनि संस्थितः ॥ ३४ ॥

अप्रमेय विभु विष्णु गोविन्द कमलोचन महेश्वर अंशोत्पन्न मध्यपुष्कर और अनन्त पुरुष प्रभु हो ॥ ३३ ॥ आप कव्यवाह, कपाली हव्यवाह प्रभंजन हो, आप आदिदेव, क्रियानन्द परमात्मामें स्थित हो ॥ ३४ ॥

त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविंद पाहि मां पुष्करेक्षण । नान्या गति- स्त्वदन्या मे त्वामेव शरणं गतः ॥ ३५ ॥ तमाह भगवान्विष्णुः किं ते हृदि चिकीर्षितम् । तत्सर्वं संप्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत ॥ ३६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (९)

हे गोविन्द मैं आपकी शरण हूँ; आप मेरी रक्षा कीजिये, आपके सिवाय मेरी अन्यगति नहीं है मैं आपकी शरण हूँ ॥ ३५ ॥ तब भगवान् विष्णुने कहा तुम्हारी क्या इच्छा है ? वह मैं सब तुम्हें दूंगा कारण कि, तुम मेरे भक्त हो ॥ ३६ ॥

भक्तप्रियोऽस्मि सततं तस्माद्दातुमिहागतः । अंबरीषस्तु तच्छ्रुत्वा हर्षगद्गदयागिरा ॥ ३७॥ प्रोवाच परमात्मानं नारायणमनामयम् । त्वयि विष्णौ परानंदे नित्यं मे वर्त्ततां मतिः ॥ ३८ ॥

मैं निरन्तर भक्तप्रिय हूँ इस कारण तुमको यथेच्छ फल देनेको आया हूँ, तुम मेरे भवत हो, यह वचन सुन अम्बरीष हर्षसे गद्गद हो ॥ ३७ ॥ परमात्मा अनामय नारायणसे कहने लगे हे विष्णो ! आपमें निरन्तर मेरी भक्ति हो । ३८ ।

भवेयं त्वत्परो नित्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः । पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत् ॥ ३९ ॥ यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पिष्यामि सुरोत्तमान् । वैष्णवान्पालयिष्यामि हनिष्यामि च शात्रवान् ॥ ४० ॥

मन वचन कर्मसे नित्य मैं आपकी सेवा करके पृथिवीको विष्णुभक्त करदूंगा ॥ ३९ ॥ यज्ञ होम अर्चनसे देवताओंको तृप्त कर वैष्णवोंको पालकर असुरोंको नष्ट करूंगा ॥ ४० ॥

एवमुक्तस्तु भगवान्प्रत्युवाच नृपोत्तमम् । एवमस्तु तवेच्छा वै चक्रमेतत्सुदर्शनम् ॥४१॥ पुरारुद्रप्रभावेण लब्धं वै दुर्लभं मया । ऋषिशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा ॥ ४२ ॥

यह सुनकर भगवान्ने राजासे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है वह होगा और यह सुदर्शन चक्र ॥ ४१ ॥ जो प्रथम हमने रुद्रके प्रभावसे प्राप्त किया है यह ऋषिके शाप, दुःख, शत्रु, रोगादि ॥ ४२ ॥

निहनिष्यति ते दुःखमित्युक्त्वांतरधीयत । ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम् ॥ ४३ ॥ प्रविश्य नगरीं दिव्यामयोध्यां पर्यपालयत् । ब्राह्मणादींस्तथा वर्णान्स्वेस्वे कर्मण्ययोजयत् ॥ ४४ ॥

आपके दुःख दूर करेगा ऐसा कहकर अन्तर्धान होगये, तब प्रसन्न हो राजा नारायण प्रभुको प्रणाम कर ॥ ४३ ॥ दिव्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके उसकी पालना करने लगा ब्राह्मणादि वर्णोंको भी अपने २ कर्ममें लगाता हुआ ॥ ४४ ॥

(१०) अद्भुतरामायण [तृतीय-

नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान् । पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः ॥ ४५ ॥ अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतैानि च । पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम् ॥ ४६ ॥

नित्य नारायणमें तत्पर विष्णुभक्तोंको विशेष कर पालन करता हुआ ॥४५॥ सौ अश्वमेध और सौ वाजपेय यज्ञ करके सागरपर्यन्त पृथ्वीका पालन करता हुआ ॥ ४६ ॥

गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे । नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च ॥ ४७ ॥ अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन्त्राज्यं प्रशासति ॥ नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता ॥ ४८ ॥

उस समय घर घर नारायण और वेदका उच्चारण होता था, नारायणका नाम और यज्ञका शब्द घर घर होता था ॥ ४७ ॥ उसके राज्यमें इस प्रकारसे कार्य होते थे, उसके राज्यमें भूमि तृण अन्नसे युक्त थी, दुर्भिक्षादि नहीं था ॥ ४८ ॥

रोगहीना प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिता । अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४९ ॥ स वै महात्मा सततं च रक्षितः सुदर्शनेनातिसुदर्शनेन । शुभां समुद्रावधि संततां महीं सुपालयामास महीमहेन्द्रः ॥ ५० ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीयेऽद्भुतोत्तरकांडे अम्बरीषवरप्रदानं
नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

नित्य प्रजा रोगहीन और सब उपद्रवोंसे रहित थी, इस प्रकार महाराज अम्बरीष पृथिवीका पालन करते थे ॥ ४९ ॥ इस प्रकार वह महात्मा सुदर्शनचक्रसे रक्षित हो कर सागरपर्यन्त इस पृथिवीको पालन करता हुआ ॥५०॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां अम्बरीषवरप्रदानं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

तृतीय सर्ग

नारदपर्वतका राजसभामें आना

तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना । श्रीमतीनामविख्याता सर्वलक्षणशोभिता ॥ १ ॥ तस्मिन्काले मुनिःश्रीमान्नारदोऽभ्यागतो गृहम् । अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महाद्युतिः ॥ २ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (११)

इस प्रकार उनके वर्तमान होनेमें कमललोचनी कन्या लक्षणोंसे शोभित श्रीमतीनाम उत्पन्न हुई ॥ १ ॥ उसी समय नारदजी उसके घर आये और पर्वतऋषि भी आये ॥ २ ॥

तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि । अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तौ नृपः ॥ ३ ॥ कन्यां तु प्रेक्ष्य भगवान्नारदः प्राह विस्मितः । केयं राजन्महाभागा कन्या सुरसुतोपमा ॥ ४ ॥

उन दोनोंको आया देख विधिपूर्वक महातेजस्वी अम्बरीषने उनका पूजन किया ॥ ३ ॥ उस कन्याको देख भगवान् नारद विस्मयको प्राप्त हो बोले—हे राजन् यह महाभागा कन्या किसकी है ? ॥ ४ ॥

ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता । निशम्य वचनं तस्य राजा प्राह कृतांजलिः ॥ ५ ॥ दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः ॥ प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषती शुभा ॥ ६ ॥

यह सर्वलक्षणलक्षित है, यह ऋषिके वचन सुन हाथ जोड राजा बोला ॥ ५ ॥ हे विभो ! यह श्रीमती नाम मेरी कन्या है; अब यह प्रदानसमयको प्राप्त हुई वरकी खोजमें है ॥ ६ ॥

इत्युक्तो मुनि शार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजः । पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे सर्षिसत्तमः ॥ ७ ॥ अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत् । रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम् ॥ ८ ॥

यह कहनेपर नारदजीने उसकी इच्छा की और पर्वत मुनिने भी उसकी इच्छा की ॥ ७ ॥ राजाको अनुज्ञा करके नारदजी बोले अर्थात् उन धर्मात्माने एकान्तमें बुलाकर यह कन्या मुझे दीजिये ॥ ८ ॥

पर्वतोऽपि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुम् । तावुभौ प्राह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः ॥ ९ ॥ उभौ भवंतौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम् । करिष्यामि महाप्राज्ञौ शृणु नारद मे वचः ॥ १० ॥

तब पर्वतने भी एकान्तमें राजासे कहा, तब राजा भयव्याकुल हो दोनोंसे बोले ॥ ९ ॥ तुम दोनों कन्याकी प्रार्थना करते हो तो मैं आपके वचन किस प्रकारसे पूर्ण कर सकता हूँ ? हे नारद ! ॥ १० ॥

(१२) अद्भुतरामायण [तृतीय-

त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो। कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा।।११।। तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्ति रस्ति मे ।तथेत्युक्त्वा तु तौ विप्रौ श्व आयास्याव ए हि ॥१२॥ हे पर्वतजी ! आप मेरे वचन श्रवण कीजिये मैं कहता हूँ तुम दोनोंमें यह कन्या जिसका वरण करे ।। ११ ।। उसीको मैं दे दूंगा अन्यथा देनेकी मुझे शक्ति नहीं है ! बहुत अच्छा यह कह दोनों ब्राह्मण दूसरे दिन आनेको कहकर ।। १२ ।।

इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतमानसौ । वासुदेवपरौ नित्य- मुभौ ज्ञानवतां वरौ ।। १३ ।। विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिस- त्तमः । प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह ।। १४ ।। प्रसन्नतासे चले गये यह दोनों ज्ञानी नित्य वासुदेवपरायण थे ।। १३ ।। तब मुनिश्रेष्ठ नारदजी विष्णुलोकमें जाकर नारायणको प्रणाम कर इस प्रकारके वचन बोले ।। १४ ।।

वृत्तान्तं सर्वमाख्याय नाथ नारायणव्यय । रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर ।। १५ ।।ततः प्रहस्य गोविंदः सर्वात्मा कर्मठंमु- निम् । ब्रूहीत्याह स विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ।। १६ ।। और सब वृत्तान्त कथन करके बोले हे नारायण अविनाशी ! एकान्तमें आपसे कुछ कहूंगा आपको प्रणाम है ।। १५ ।। तब सर्वात्मा गोविन्द हँसकर उन कर्म करनेवाले मुनिसे बोले, कहिये तब यह केशव से बोले ।। १६ ।।

त्वदीयो नृपतिः श्रीमानंबरीषो महामतिः । तस्य कन्यां विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः ।। १७ ।। परिणेतुमहं तां वा इच्छामि वचनं शृणु । पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ।। १८ ।। आपका भक्त एक अम्बरीष राजा है उसकी विशाल लोचनी श्रीमती कन्या है ।। १७ ।। उससे मैं विवाह करनेकी इच्छा करता हूँ सो आप सुनिये यह श्रीमान् पर्वत भी आपके बडे भक्त हैं ।। १८ ।।

तामैच्छत्सोऽपि भगवंस्तमाह च जनाधिपः ।। अंबरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम् ।। १९ ।। लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददा- म्यहम् । इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाप्यहं ततः ।। २० ।।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३)

यह भी उसकी इच्छा करते हैं और राजाने कहा है कि, यह कन्या तुम दोनोंमें जिसको ।। १९ ।। अधिक रूपवान् जानकर वरण करेगी उसीको मैं देदूंगा यह राजाने कहा तब मैं बहुत अच्छा ऐसा कहकर ।। २० ।।

आगमिष्यामि ते राजञ्छ्वः प्रभाते गृहं प्रति । आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ।। २१ ।। वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा । तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम् ।। २२ ।।

कि, प्रातःकाल तुम्हारे घर आऊँगा तो महाराज ! अब मैं आपके पास आया हूँ आप मेरा प्रिय कीजिये ।। २१ ।। पर्वतका मुख तो वानरके समान होजाय ऐसा आप कीजिये जो हमारे प्रियकी इच्छा है तो ।। २२ ।।

श्रीमती तु तदा पश्येन्नान्यः पश्येत्तथाविधम् । तथेत्युक्त्वा स गोविंदः प्रहस्य मधुसूदनः ।। २३ ।। त्वयोक्तं तत्करिष्यामि गच्छ सौम्य यथासुखम् । एवमुक्तो मुनिर्हृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम् ।। २४ ।।

और उस रूपको वह श्रीमती कन्याही देख सके और कोई नहीं, यह सुन मधुसूदन गोविंद हँसकर बोले ।। २३ ।। जो आपने कहा वह मैं सब करूंगा आप सुखपूर्वक पधारिये यह सुन मुनि प्रसन्न हो जनार्दनको प्रणाम कर ।। २४ ।।

मन्यमानः कृतात्मानमयोध्यां वै जगाम सः । गते मुनिवरे तस्मिन्पर्वतोऽपि महामुनिः ।। २५ ।। प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह । वृत्तांतं च निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः ।। २६ ।।

अपनेको कृतार्थ मान अयोध्यामें गये उनके जानेपर महामुनि पर्वत ।। २५ ।। प्रणाम कर एकान्तमें माधवसे कहने लगे और नारदका वृत्तान्त जगत्पतिके आगे कहा ।। २६ ।।

गोलांगुलमुख यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु । श्रीमती तु तथा पश्येन्नान्यः पश्येत्तथा विधम् ।। २७ ।। तच्छ्रुत्वा भगवान्विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै । गच्छ शीघ्रमयोध्यां त्वं मा वादीर्नारदस्य वै ।। २८ ।।

कि, नारदका मुख गोलांगुलके समान जिस प्रकार हो जाय वह करो, परन्तु वह राजकन्याही देखे दूसरा नहीं ऐसा करो ।। २७ ।। यह सुन भगवान् विष्णु बोले-मैं तुम्हारे कहे वचन करूंगा, शीघ्र अयोध्याको जाओ और नारदसे न कहो ।। २८ ।।

(१४) अद्भुतरामायण [तृतीय-

त्वया मे मन्त्रितं यच्च तथेत्युक्त्वा जगाम सः। ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा ॥ २९ ॥ मङ्गलैर्विविधैर्भद्रैरयोध्यां ध्वज- मालिनीम् । मंडयामास लाजैश्च पुष्पैश्चैव समंततः ॥ ३० ॥

जो आपने मंत्रित किया है वह वैसाही होगा, तब राजाने देखा कि, मुनीश्वर आकर प्राप्त हुए ॥ २९ ॥ कि, अनेक प्रकारके मङ्गलोंसे युक्त अयोध्यापुरी हो रही है चारों ओरसे खीलों और पुष्पोंसे उसको मंडित किया ॥ ३० ॥

अभिशिक्तगृहद्वारां सिक्तांगणमहापथाम् । दिव्यगंधरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः ॥ ३१ ॥ कृत्वा च नगरीं राजा मंडयामास तां सभाम् । दिव्यगंधैस्तथा धूपै रत्नैश्र्च विविधैस्तथा ॥ ३२ ॥

और वडे बडे महापथमें छिडकाव किये गये, दिव्य गन्ध और रससे युक्त दिव्य धूपोंसे धूपित किया ॥ ३१ ॥ इस प्रकार नगरीको करके राजाने सभाको शोभित किया, दिव्य गंध धूप और विविध प्रकारके रत्नोंसे अलंकृत किया। ३२ ।

अलंकृतां मणिस्तंभैर्नानामाल्योपशोभितैः । पराध्यास्तरणो- पेतैर्दिव्यभद्रासनैर्वृताम् ॥ ३३ ॥ नानाजनसमावेशैर्नरेन्द्रैरभि- संवृताम् । कृत्वा नृपेंद्रस्तां कन्यामादाय प्रविवेश ह ॥ ३४ ॥

अनेक प्रकारकी मालाओंसे स्तंभोंको शोभित किया और अनेक मणियोंको उसमें जटिल किया और अनेक प्रकारके श्रेष्ठ विछौने और आसन विछाये गये ॥ ३३ ॥ अनेक प्रकारके राजा और बड़े बड़े मनुष्य वहां आकर स्थित हुए तब राजा उस कन्याको लेकर सभामें आये ॥ ३४ ॥

सर्वाभरणसंपन्नां श्रीरिवायतलोचना। करसंमितमध्यांगी पंचास्नि- ग्धा शुभानना । स्त्रीभिः परिवृता दिव्या श्रीमती संस्थिता सती॥३५॥ सभा तु सा भूमिपतेः समृद्धा मणिप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा । न्यस्तासना माल्यवती सुगंधा तामन्वयुस्ते सुरराजवर्याः ॥ ३६ ॥

जो सम्पूर्ण गहने पहरे साक्षात् दीर्घलोचना लक्ष्मीके समान थी । मुट्ठीभर कमरवाली, पांच स्थानमें चिकने शरीरवाली सुन्दर मुखवाली दिव्य स्त्रीजनोंसे संवृत श्रीमती स्थित हुई ॥ ३५ ॥ वह राजाकी सभा अनेक मणिरत्नोंसे संयुक्त थी, वहां आसनके ऊपर बैठी माला हाथमें लिये सुरराजकन्याके समान उसके साथ हुई ॥ ३६ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५)

अथाययौ ब्रह्मवरात्मजो महांस्त्रैविद्य वृद्धोभगवान्महात्मा ।
सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो महामुनिर्नारद आजगाम ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे नारदपर्वत-
सभाप्रवेशो नाम तृतीयः सर्ग ॥ ३ ॥

उसी समय ब्रह्मवरात्मज महान् त्रिविद्यावृद्ध महात्मा नारदजी पर्वतको साथ लेकर उस स्थानमें आये ॥ ३७ ॥

इत्यार्षे श्रीम० वाल्मी० आ० अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषायां नारदपर्वत-
सभाप्रवेशो नाम तृतीय सर्ग ॥ ३ ॥


चतुर्थ सर्ग

रामचन्द्रके जन्म लेनेका कारण

तवागतौ समीक्ष्याथ राजा संभ्रांतमानसः । दिव्यमासनमा दिश्य पूजयामास तावुभौ ॥ १ ॥ उभौ देवऋषी दिव्यौ नित्यज्ञानवतां वरौ । सभासीनौ महात्मानौ कन्यार्थे मुनिसत्तमौ ॥ २ ॥

उन दोनोंको आया देखकर राजा संभ्रान्तमन होकर दिव्य आसनपर बैठाकर दोनोंकी पूजा करता हुआ ॥ १ ॥ वे दोनों दिव्य देवऋषि नित्य ज्ञानवालोंमें श्रेष्ठ महात्मा कन्याके निमित्त उस आसनमें बैठते हुए ॥ २ ॥

तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम् । स्थितां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ३ ॥ अनयोर्यं वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि । तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथा विधि ॥ ४ ॥

उन दोनोंको प्रणाम कर राजा कमललोचनी यशस्विनी अपनी कन्यासे बोले ॥ ३ ॥ हे भद्रे ! इन दोनोंमें जिसे मनसे वरण करो उसीको यथाविधि प्रणाम कर यह माला पहरा दो ॥ ४ ॥

एवमुक्ता तु सा कन्या स्त्रीभिः परिवृता तदा । मालां हिरण्मयीं दिव्यामादाय शुभलोचना ॥ ५॥ तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ६ ॥

स्त्रियोंसे युक्त जब उस कन्यासे यह वचन कहा गया तब वह शुभ लोचना दिव्य सुवर्णकी मालाको लेकर ॥ ५ ॥ खडी रही तब राजाने कहा हे वत्से ! तू क्या करेगी ॥ ६ ॥

(१६) अद्भुतरामायण [ चतुर्थ-

अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे । सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तु वानराननौ ॥ ७ ॥ मुनिश्रेष्ठौ न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा । अनयोर्मध्यतस्त्वेकं वरं षोडशवार्षिकम् ॥ ८ ॥

इन दोनोंमें किसी एकको माला प्रदान कर। तब वह पितासे बोली इन दोनोंका तो वानरका मुख है ॥ ७ ॥ मुझे तो मुनिश्रेष्ठ नारद और पर्वत दीखते नहीं परंतु इन दोनोंके बीचमें एक सोलह वर्षका युवा ॥ ८ ॥

सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्पसंनिभम् । दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुंगो रःस्थलमुत्तमम् ॥ ९ ॥ चामीकराभं करणपटयुग्मकशोभितम् । विभक्तत्रिवलीयुक्तनाभि व्यक्तकृशोदरम् ॥ १० ॥

सम्पूर्ण गहनोंसे युक्त अलसीके फूलके समान दीर्घ बाहु विशाल नेत्र ऊँच । श्रेष्ठ उरस्थल ॥ ९ ॥ सुवर्णके समान तेजवाले दो वस्त्रोंसे शोभित विभक्त त्रिवलीसे युक्त नाभि प्रगट कृश उदरवाला ॥ १० ॥

हिरण्याभरणोपेतं सुरंगनखं शुभम् । पद्माकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम् ॥ ११ ॥ पद्मांग्घ्रि पद्महृदयं पद्मनाभं श्रियावृतम् । दंतपंक्तिभिरत्यर्थं कुन्दकुङ्मलसन्निभम् ॥ १२ ॥

सुवर्णके गहनोंसे युक्त सुन्दर नख, कमलकेसे हाथ कमलमुख कमल लोचन ॥ ११ ॥ कमलकेसे चरण कमलहृदय पद्मनाभ लक्ष्मीसे युक्त चमेलीके कलीके समान दंतपंक्तिसे शोभित ॥ १२ ॥

हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै । पाणिं स्थितमिमं छन्नं पश्यामि शुभमूर्धजम् ॥ १३ ॥ एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः । कियंतो बाहवस्तस्य कन्ये वद यथातथम् ॥ १४ ॥

मुझे देखकर हास्यकर दक्षिण हाथ फैलाये हैं इसहीको मैं सुन्दर सिर आदिसे युक्त देखती हूँ ॥ १३ ॥ यह कहनेपर नारदमुनि सन्देहको प्राप्त हो बोले हे कन्या ! यथार्थ कह उसके कितनी भुजा हैं ॥ १४ ॥।

बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या सुविस्मिता । प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे ॥ १५ ॥ किंच पश्यसि मे ब्रूहि करे किं धारय- त्यपि । कन्या तमाह मालां वै चंचद्रूपामनुत्तमाम् ॥ १६ ॥

सर्ग ] । हिन्दीटीकासहित (१७)

सर्ग ] । हिन्दीटीकासहित (१७)

तब कन्या विस्मयको प्राप्त हो बोली दो भुजा देखती हूं, तब पर्वत बोले हे शुभे ! उसके वक्षस्थलमें ॥ १५ ॥ क्या है जो यह पुरुष धारण कर रहा है, सो बता, तब कन्याने कहा वह पुरुष बहुत सुन्दर माला धारण किये है ॥ १६ ॥

वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकौ । एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १७ ॥ मनसा चिंतयंतौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत् । मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः ॥ १८ ॥

और हाथमें धनुषबाण धारण किये हैं, जब यह कहा तब वे दोनों मुनि श्रेष्ठ ॥ १७ ॥ मनमें विचारने लगे यह किसीकी माया है, यह मायावी तस्कर अवश्यही श्रीकृष्ण हैं ॥ १८ ॥

आगतो नान्यथा कुर्यात्कथं मेऽन्यो मुखं त्विदम् । गोलांगूली-यमित्येवं चिंतयामास नारदः ॥ १९ ॥ पर्वतोऽपि तथैवैतद्वानरत्वं कथं मया । प्राप्तमित्येव सहसा चिंतामापेदिवांस्तथा ॥ २० ॥

वही आगये हैं नहीं तो इस प्रकारका हमारा मुख किस प्रकारका हों सकता है, कि गोलांगुलका मुख हो गया, यह नारदजी चिन्ता करने लगे ॥ १९ ॥ पर्वत कहने लगे हमारा वानरका मुख किस प्रकार हो गया ? इस प्रकार बडी चिन्ता हुई ॥ २० ॥

ततो राजा प्रणम्याऽसौ नारदं पर्वतं तथा । भवद्भूचां किमिदं भद्रौ कृतं बुद्धि विमोहनम् ॥ २१ ॥ स्वस्थौ भवंतौ तिष्ठेतां यदि कन्यार्थ-मुद्यतौ । एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ ॥ २२ ॥

तब राजा प्रणाम कर नारद और पर्वतसे बोले, यह तुम्हारी बुद्धिमें मोह किस प्रकारसे हुआ है ॥ २१ ॥ यदि कन्याके स्वीकारकी इच्छा है तो आप स्वस्थ होकर स्थित पूजिये, यह सुनकर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ राजासे कहने लगे ॥ २२ ॥

त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथंचन । आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव भामिनी ॥ २३ ॥ ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्य च देवताम् । पित्रा नियुक्ता सहसा मुनिशापभयाद्द्विज ॥ २४ ॥

राजन् तुमने ही मोह किया है, और हम भी किसी प्रकारसे मोह नहीं करते हैं, यह कन्या हम दोनोंमें किसी एकको वरण कर ले ॥ २३ ॥ तब वह कन्या फिर देवताको प्रणाम करके शापके डरसे पितासे नियुक्त की गई ॥ २४ ॥

(१८) अद्भुतरामायण [ चतुर्थ-

मालामादाय तिष्ठन्ती तयोर्मध्ये समाहिता । पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा माल्ये तस्मै ददौ हि सा ॥ २५ ॥ अनंतरं च सा कन्या दृष्ट्वा न मनुजैः पुरः । ततो नादः समभवत्किमेतदिति विस्मयात् ॥ २६ ॥ सावधान हो उन दोनोंके बीचमें माला लेकर स्थित हुई और पूर्ववत् उस पुरुषको देखकर वह माला उसहीको पहरा दी ॥ २५ ॥ फिर उस कन्याको मनुष्योंने नहीं देखा तब यह क्या हुआ इस प्रकारका शब्द होने लगा ॥ २६ ॥

तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः । पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वरांगना ॥ २७ ॥ श्रीमतीयं समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम् । तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्त्वामित्येव दुःखितौ ॥ २८ ॥ उसको लेकर पुरुषोत्तम विष्णु भगवान् अपने स्थानको चले गये, पहले भगवान्के निमित्त बड़ा तप करके यह श्रेष्ठ स्त्री उत्पन्न हुई थी और नारायणको प्राप्त हुई और वह मुनिश्रेष्ठ परस्पर तुमको धिक्कार है इस प्रकार कहकर दुःखी हुए ॥ २७ ॥ २८ ॥

वासुदेवं प्रति सदा जग्मतुर्भवनं हरेः । तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान्हरिः ॥ २९ ॥ मुनि श्रेष्ठौ समायातौ गूढस्वात्मानमत्र वै । तथेत्युक्ता च सा देवी प्रहसंती चकार ह ॥ ३० ॥ और वासुदेवके स्थानको गये । उन दोनोंको आया देखकर भगवान्ने श्रीमतीसे कहा ॥ २९ ॥ दोनों मुनिश्रेष्ठ आते हैं, तू अपनी आत्मा को छिपा ले, यह कहनेपर वह देवी हँसकर रूप छिपाती भई ॥ ३० ॥

नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम् । किमिदं कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य च ॥ ३१ ॥ त्वमेव नूनं गोविंद कन्यां तां हृतवानसि । तच्छ्रुत्वा पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युतः ॥ ३२ ॥ तब नारदजी प्रणाम कर दामोदर हरिसे कहने लगे हे भगवन् ! आपने मेरा और पर्वतका यह क्या रूप कर दिया ॥ ३१ ॥ हे गोविन्द ! निश्चयही आपने उस कन्या का हरण किया है ! यह सुनकर पुरुषोत्तम अपने हाथ दोनों कानोंपर धरकर ॥ ३२ ॥

पाणिभ्यां प्राह भगवन्भवता किमुदीरितम् । कामवादो न भावोऽयं मुनिवृत्तेरहो किल ॥ ३३ ॥ एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः । कर्णमूले मम कथं गोलांगूलमुखं त्विति ॥ ३४ ॥

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१९)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१९)

बोले, हे भगवन् ! आपने क्या कहा है, यह कामवादका भाव नहीं हे मुनि ! यह आपकी मुनिवृत्ति है क्या ? ॥३३॥ यह वचन सुन नारदजी भगवान् वासुदेवसे कर्णमूलमें बोले मेरे गोलांगूलमुख कर दिया ॥ ३४ ॥

तदाकर्ण्य महाबुद्धिर्देवो नारायणो हरिः । कर्णमूले तमाहेदं वानरास्यं कृतं मया ॥ ३५ ॥ पर्वतस्य तथा विप्र गोलांगूलमुखं तव । यथा भवांस्तथा सोऽपि प्रार्थयामास निर्जने ॥ ३६ ॥

यह वचन सुन महाबुद्धिमान् नारायण कर्णमूलमें कहने लगे कि, मैंने तुम्हारे गोलांगूलमुख कर दिया था ॥ ३५ ॥ और हे विप्र ! इसी प्रकार पर्वतका वानरका मुख कर दिया था जैसे तुमने एकान्तमें प्रार्थना की थी इसी प्रकार इन्होंने प्रार्थना की थी ॥ ३६ ॥

मामेव भक्तिवशगस्तथास्म्यकरवं मुने । न स्वेच्छया कृतं तद्वां प्रियार्थं नान्यथा त्विति ॥ ३७ ॥ याचते यच्च यश्चैव तच्च तस्य ददाम्यहम् । न दोषोऽत्र गुणो वापि युवयोर्मम वा द्विज ॥ ३८ ।

हे मुने ! दोनोंकी भक्तिमें तत्पर होनेके कारण मैंने ऐसा किया था; मैंने स्वेच्छासे नहीं किया आपकी प्रीतिके निमित्तही ऐसा किया है ॥३७॥ हमारा भक्त जो कुछ याचना करता है वही वस्तु में उसको देता हूं ब्राह्मणो ! इसमें मेरा वा तुम्हारा गुण दोष नहीं है ॥ ३८ ॥

पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः । शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः ॥३९॥ प्रियं भवतोः कृतवान्सत्येनायुधमालभे । नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः ॥ ४० ॥

यही बात पर्वतके पूछनेपर नारायणने कही थी और दोनोंके श्रवण करते दामोदर वचन कहने लगे ॥ ३९ ॥ मैं सत्य तथा आयुधकी सौगन्ध करता हूँ कि आपका प्रिय ही किया है तब धर्मात्मा नारदजी कहने लगे हम दोनोंके मध्यमें ॥ ४० ॥

धनुष्मान्द्विभुजःको नु तां हृत्वा गतवान्किल । तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह नौ मुनिसत्तमौ ॥४१॥ * मायाविनौ महात्मानौ बहवः संति सत्तमौ । तत्र सा श्रीमती देवी हृता केनापि सुव्रतौ ॥ ४२ ॥

* अत्र द्विवचनांतानि सम्बोधनानि ।

(२०) अद्भुतरामायण [चतुर्थं-

धनुष धारण किये दो भुजवाले पुरुष कौन थे जो उसको हरण कर ले गये, यह वचन सुन मुनिश्रेष्ठ उन दोनोंसे बोले ॥ ४१ ॥ हे महात्माओ ! हे सत्तमो ! संसारमें बहुतसे मायावाले हैं सो उनमें किसीने हरण कर ली होगी ॥४२॥

चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितिः । तस्मान्नाहमतथ्यो वै भवद्भूयांविदितं हि तत् ॥ ४३ ॥ इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतमानसौ । कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते ॥ ४४ ॥

और मैं तो चक्रपाणि तथा चार भुजावाला हूं यह स्थिति है सो मैं वहां नहीं हूंगा यह वार्ता आपको विदित ही है ॥ ४३ ॥ यह कहनेपर वे दोनों प्रणाम कर कहने लगे हे जगत्पते ! इसमें आपका क्या अपराध है ॥ ४४ ॥

दौरात्म्यं तु नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ । इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ ॥ ४५ ॥ अंबरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत् । नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ ॥ ४६ ॥

यह राजाहीकी दुरात्मता है उसने अवश्य माया की है यह कहकर वहांसे पर्वत और नारद चले ॥ ४५ ॥ और अम्बरीके निकट जाकर उसको शाप दिया जब कि नारद और हम पर्वत इस स्थानपर आये थे ॥ ४६ ॥

आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि । मायायोगेन तस्मात्त्वां *तमोऽज्ञाभिभविष्यति ॥४७॥ तेन नात्मानतथ्यं यथावत्त्वं हि वेत्स्यसि । एवं शापे प्रवृत्ते तु तमोराशि रथोत्थितः ॥ ४८ ॥

तब तुमने हमको बुलाकर दुसरेके निमित्त कन्यादान की इस कारण हमारे शापसे तू अज्ञानी होजायगा ॥ ४७ ॥ अपने आत्माका तुझको यथावत् विचार न रहेगा, इस प्रकार शाप देनेपर महान तमोराशि उपस्थित हुई ॥ ४८ ॥

नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोःप्रादुरभूत्क्षणात् । चक्रवित्र्रासितं घोरं तावुभावभ्यगात्तमः ॥ ४९ ॥ ततः संत्रस्तसर्वांगौ धावमानौ महामुनी । पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं च दुर्मदम् ॥ ५० ॥

जब वह अन्धकार राजाकी ओरको चला उसी समय विष्णुका चक्र प्रगट हुआ तब वह अन्धकार चक्रसे विद्रावित होकर उन दोनोंके प्रति धावमान हुआ ॥ ४९ ॥ तब सब अंगसे व्याकुल हो वे महामुनि धावमान हुए, पीछे चक्र और उस तमोराशिको देखकर ॥ ५० ॥


* तमअज्ञेतिच्छेदः ।

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (२१)

कन्यासिद्धि्रहो प्राप्तस्त्यावयोरिति वेगितौ। लोकालोकतमर्निशं भावमानौ तमोऽर्दितौ ॥ ५१ ॥ त्राहि त्राहीति गोविंदं भाषमाणौ भयार्दितौ । विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ ५२ ॥ बोले अहो ! कन्याकी यह सिद्धि हमको प्राप्त हुई, इस प्रकार दिनरात लोकालोक पर्वतके प्रति धावमान हुए ॥ ५१ ॥और भयसे कहने लगे हे गोविन्द ! हमारी रक्षा करो ! इस प्रकार जगत्पति नारायण विष्णुके पास जाकर ॥५२ ॥

वासुदेव हृषीकेश पद्म नाभ जनार्दन । त्राह्यावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ ५३ ॥ इत्यूचतुर्वासुदेवं मुनी नारदपर्वतौ। ततो नारायणोऽचिन्त्यः श्रीमाञ्छीवत्सलांछनः ॥ ५४ ॥ हे जगत्पते ! हे वासुदेव, हृषीकेश, पद्मनाभ, जनार्दन, पुण्डरीकाक्ष, नाथ पुरुषोत्तम ! आप हमारी रक्षा करो ॥ ५३ ॥ नारद और पर्वत मुनि इस प्रकार वासुदेवसे कहने लगे तब अचिन्त्य नारायण श्रीमान् भक्तवत्सल ॥५४॥

निवार्य चक्रं ध्वांतं च भक्तानुग्रहकाम्यया । अंबरीषश्च मद्भू- *क्तस्तत्थेमौ मुनिसत्तमौ ॥ ५५ ॥ अनयोर्नृपस्य च तथा हितं कार्य मया पुनः । आहूय तौ ततः श्रीमान्गिरा प्रह्लादयन्हरिः५६ भक्तोंके ऊपर अनुग्रहकी इच्छासे चक्रको निवारण कर बोले जैसे तुम मेरे भक्त हो इसी प्रकार वह राजा मेरा भक्त है ॥ ५५ ॥ इन दोनोंका तथा राजाका भी हित मुझको करना है तब भगवान्ने उनको बुलाकर वाणीसे प्रसन्न करते हुए ॥ ५६ ॥

उवाच भगवान्विष्णुः श्रूयतामिति मे वचः । क्षमेतां मुनिशा- र्दूलौ भक्तसंरक्षणाय मे ॥ ५७ ॥ अपराधं च चक्रेण क्षमाशीला हि साधवः । ततस्तौ मुनिशार्दूलौ मायां तस्यावबुध्य च ॥५८॥ कहा आप दोनों हमारे वचन सुनिये हे मुनिश्रेष्ठो भक्तरक्षाके निमित्त जो कुछ कहा है वह क्षमा करिये ॥ ५७ ॥ यह चक्रका अपराध है साधु क्षमा- शील होते हैं सो आप क्षमा करिये तब वे दोनों मुनि उसकी मायाको जान- कर ॥ ५८ ॥


* इति विचार्यति शेषः ।