भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ७ ] अयोध्याकाण्ड ८१


माभैषीरिति मां प्राह ब्रह्महत्याभयं न ते ।
मत्पित्रोः सलिलं दत्त्वा नत्वा प्रार्थय जीवितम्॥३९॥
इत्युक्तो मुनिना तेन ह्यागतो मुनिहिंसकः ।
रक्षेतां मां दयायुक्तौ युवां हि शरणागतम् ॥४०॥

इति श्रुत्वा तु दुःखार्तौ विलप्य बहु शोच्य तम् ।
पतितौ नौ सुतो यत्र नय तत्राविलम्बयन् ॥४१॥
ततो नीतौ सुतो यत्र मया तौ वृद्धदम्पती ।
स्पृष्ट्वा सुतं तौ हस्ताभ्यां बहुशोऽथ विलेपतुः॥४२॥
हाहेति क्रन्दमानौ तौ पुत्रपुत्रेत्यवोचताम् ।
जलं देहीति पुत्रेति किमर्थं न ददास्यलम् ॥४३॥
ततो मामूचतुः शीघ्रं चितिं रचय भूपते ।
मया तदैव रचिता चितिस्तत्र निवेशिताः ।
त्रयस्तत्राग्निनुत्सृष्टे दग्धास्ते त्रिदिवं ययुः ॥४४॥
तत्र वृद्धः पिता प्राह त्वमप्येवं भविष्यसि ।
पुत्रशोकेन मरणं प्राप्स्यसे वचनान्मम ॥४५॥

स इदानीं मम प्राप्तः शापकालोऽनिवारितः ।
इत्युक्त्वा विललापाथ राजा शोकसमाकुलः ॥४६॥
हा राम पुत्र हा सीते हा लक्ष्मण गुणाकर ।
त्वद्वियोगादहं प्राप्तो मृत्युं कैकेयिसम्भवम् ॥४७॥

वदन्नेवं दशरथः प्राणांस्त्यक्त्वा दिवं गतः ।
कौसल्या च सुमित्रा च तथान्या राजयोषितः ।४८।
चुक्रुशुश्च विलेपुश्च उरस्ताडनपूर्वकम् ।
वसिष्ठः प्रययौ तत्र प्रातर्मन्त्रिभिरावृतः ॥४९॥
तैलद्रोण्यां दशरथं क्षिप्त्वा दूतानथाब्रवीत् ।
गच्छत त्वरितं साश्वा युधाजिन्नगरं प्रति ॥५०॥
तत्रास्ते भरतः श्रीमाञ्छत्रुघ्नसहितः प्रभुः ।
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करो, रक्षा करो' ऐसा कहने लगा ॥ ३८ ॥ तब उन्होंने मुझसे कहा— "डरो मत, तुम्हें ब्रह्महत्याका भय नहीं है। मेरे माता-पिताको जल देकर उन्हें प्रणाम कर जीवनदान माँगो" ॥ ३९ ॥ मुनिकुमारके ऐसा कहनेपर यह मुनिहिंसक आपके पास आया है। आप दोनों बड़े दयाशील हैं, मैं आपकी शरण आया हूँ, आप मेरी रक्षा करें" ॥ ४० ॥

"यह सुनकर वे दुःखार्त होकर उसके लिये अत्यन्त शोक करते और रोते हुए पृथिवीपर गिर पड़े और बोले—"जहाँ हमारा बेटा है, हमें तुरन्त ही वहाँ ले चलो" ॥ ४१ ॥ तब, जहाँ वह लड़का पड़ा था वहीं उन वृद्ध-दम्पतिको मैं ले गया और वे उसे हाथोंसे स्पर्श कर अत्यन्त विलाप करने लगे ॥४२॥ वे 'हा पुत्र ! हा पुत्र !' कहकर रोते हुए बोले— "बेटा ! हमें जल दो, हमें जल दो ! आज जल क्यों नहीं देते हो ?" ॥ ४३ ॥ फिर उन्होंने मुझसे कहा— "राजन् ! शीघ्र ही चिता बनाओ।" मैने तुरन्त ही वहाँ चिता बना दी। तब वे तीनों उसपर चढ़ गये और अग्नि लगानेपर उसमें भस्म होकर स्वर्गलोकको चले गये ॥ ४४ ॥ उस समय वृद्ध पिताने मुझसे कहा— "तुम्हारे लिये भी ऐसा ही होगा, तुम भी मेरे वचनसे पुत्र-शोकसे ही मरोगे" ॥ ४५ ॥

"वही अनिवार्य शापकाल इस समय उपस्थित हुआ है।" ऐसा कहकर राजा दशरथ अत्यन्त शोकाकुल होकर विलाप करने लगे—॥ ४६ ॥ "हा पुत्र राम ! हा सीते ! हा गुणाकर लक्ष्मण ! तुम्हारे वियोगसे मैं कैकेयीसे उपस्थित की हुई मृत्युको प्राप्त हो रहा हूँ" ॥ ४७ ॥

इस प्रकार कहते हुए महाराज दशरथ प्राण त्याग-कर स्वर्गलोकको चले गये। उस समय कौसल्या, सुमित्रा और अन्यान्य रानियाँ छाती पीट-पीटकर रोने और विलाप करने लगीं। प्रातःकाल होनेपर वहाँ मन्त्रियोंके सहित मुनिवर वसिष्ठजी आये ॥ ४८-४९॥ और राजा दशरथके शवको एक तैल-पूर्ण नौकामें रखवाकर दूतोंसे बोले— "तुमलोग शीघ्र ही घोड़ोंपर चढ़कर युधाजित्की राजधानीको जाओ ॥५०॥ वहाँ शत्रुघ्नके सहित श्रीमान् महाराज भरत विराजमान हैं। उनसे मेरी आज्ञासे जाकर इस प्रकार कहना