अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसर्ग ९ ] अयोध्याकाण्ड ९९
श्रुत्वा रामस्य वचनं रामं ज्ञात्वा हरिं परम् ।
पूजयामास विधिवद्भक्त्या परमया मुनिः ॥८२॥
वन्यैः फलैः कृतातिथ्यमुपविष्टं रघूत्तमम् ।
सीतां च लक्ष्मणं चैव सन्तुष्टो वाक्यमब्रवीत् ॥८३॥
भार्या मेऽतीव संवृद्धा ह्यनसूयेति विश्रुता ।
तपश्चरन्ती सुचिरं धर्मज्ञा धर्मवत्सला ॥८४॥
अन्तस्तिष्ठति तां सीता पश्यत्वरिनिपूदन ।
तथेति जानकीं प्राह रामो राजीवलोचनः ॥८५॥
गच्छ देवीं नमस्कृत्य शीघ्रमेहि पुनः शुभे ।
तथेति रामवचनं सीता चापि तथाऽकरोत् ॥८६॥
दण्डवत्पतितामग्रे सीतां दृष्ट्वाऽतिहृष्टधीः ।
अनसूयासमालिङ्ग्य वत्से सीतेति सादरम् ॥८७॥
दिव्ये ददौ कुण्डले द्वे निर्मिते विश्वकर्मणा ।
दुकूले द्वे ददौ तस्यै निर्मले भक्तिसंयुता ॥८८॥
अङ्गरागं च सीतायै ददौ दिव्यं शुभानना ।
न त्यक्ष्यतेऽङ्गरागेण शोभा त्वां कमलानने ॥८९॥
पातित्रत्यं पुरस्कृत्य राममन्वेहि जानकि ।
कुशली राघवो यातु त्वया सह पुनर्गृहम् ॥९०॥
भोजयित्वा यथान्यायं रामं सीतासमन्वितम् ।
लक्ष्मणं च तदा रामं पुनः प्राह कृताञ्जलिः ॥९१॥
राम त्वमेव भुवनानि विधाय तेषां
संरक्षणाय सुरमानुषतिर्यगादीन् ।
देहान्बिभर्षि न च देहगुणैर्विंलिप्त-
स्त्वत्तो बिभेत्यखिलमोहकरी च माया ॥९२॥
रामचन्द्रजीके ये वचन सुन मुनीश्वरने उन्हें साक्षात् परब्रह्म जान उनकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा की ॥ ८२ ॥ फिर वन्य फलोंसे उनका आतिथ्य-सत्कार कर उन्होंने आसनपर विराजमान रघुनाथजी, महारानी सीता और लक्ष्मणजीसे प्रसन्नता-पूर्वक इस प्रकार कहा—॥ ८३ ॥ "मेरी भार्या 'अनसूया' नामसे विख्यात है, वह अति वृद्धा है, बहुत दिनोंसे तपस्या करती है, धर्मको जाननेवाली है और धर्ममें प्रेम रखनेवाली है ॥ ८४ ॥ इस समय वह कुटीके भीतर है । हे शत्रुदमन राम ! सीता उससे मिल लें ।" तब कमलोचन रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह जानकीजीसे कहा—॥८५॥ "हे शुभे ! जाओ तुम शीघ्र ही देवी अनसूयाजीको प्रणाम कर आओ ।" सीताजीने 'बहुत अच्छा' कह रामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन किया ॥ ८६ ॥
अनसूयाजीने अपने सम्मुख सीताजीको दण्डके समान पड़ी देख अति हर्षित हो 'बेटी सीता !' ऐसा कहकर आदरपूर्वक आलिंगन किया और भक्तिसहित उन्हें विश्वकर्माके बनाये हुए दो दिव्य कुण्डल और दो स्वच्छ रेशमी साड़ियाँ दीं ॥ ८७-८८ ॥ सुन्दर मुखवाली अनसूयाजीने उन्हें दिव्य अंगराग भी दिया और कहा—"हे कमलमुखि ! इस अंगरागके लगानेसे तेरे शरीरकी शोभा कभी कम न होगी ॥ ८९ ॥ हे जानकि ! तुम पातिव्रत्यका पालन करती हुई सदा रामकी ही अनुगामिनी रहना । रघुनाथजी तुम्हारे साथ कुशलपूर्वक घर लौटें” ॥ ९० ॥ फिर उन्होंने विधिपूर्वक लक्ष्मण और सीताजीके सहित श्रीरामचन्द्रजी-को भोजन कराया । तत्पश्चात् उन्होंने फिर श्रीरामजी-से हाथ जोड़कर कहा—॥ ९१ ॥ “हे राम ! इन सम्पूर्ण भुवनोंकी रचना करके आप ही इनकी रक्षाके लिये देवता, मनुष्य और तिर्यगादि योनियोंमें शरीर धारण करते हैं, तथापि देहके गुणोंसे आप लिप्त नहीं होते । सम्पूर्ण संसारको मोहित करनेवाली माया भी आपसे सदा डरती रहती है" ॥ ९२ ॥
इति श्रीमदध्यात्मरामायणे उमामहेश्वरसंवादे
अयोध्याकाण्डे नवमः सर्गः ॥९॥
समाप्तमिदमयोध्याकाण्डम्