अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९८ | अध्यात्मरामायण | [ सर्ग ९.
इत्युक्ता सा परिक्रम्य रामं सानन्दविस्मया॥६८॥
प्रणम्य शतशो भूमौ ययौ गेहं मुदान्विता ।
भरतस्तु सहामात्यैर्मातृभिर्गुरुणा सह ॥६९॥
अयोध्यागममच्छीघ्रं राममेवानुचिन्तयन् ।
पौरजानपदान्सर्वानयोध्यायामुदारधीः ॥७०॥
स्थापयित्वा यथान्यायं नन्दिग्रामं ययौ स्वयम् ।
तत्र सिंहासने नित्यं पादुके स्थाप्य भक्तितः ॥७१॥
पूजयित्वा यथा रामं गन्धपुष्पाक्षतादिभिः ।
राजोपचारैरखिलैः प्रत्यहं नियतव्रतः ॥७२॥
फलमूलाशनो दान्तो जटावल्कलधारकः ।
अधःशायी ब्रह्मचारी शत्रुघ्नसहितस्तदा ॥७३॥
राजकार्याणि सर्वाणि यावन्ति पृथिवीतले ।
तानि पादुकयोः सम्यङ्निवेदयति राघवः ॥७४॥
गणयन् दिवसानेव रामागमनकाङ्क्षया ।
स्थितो रामार्पितमनाः साक्षाद्ब्रह्ममुनिर्यथा ॥७५॥
रामस्तु चित्रकूटाद्रौ वसन्मुनिभिरादृतः ।
सीतया लक्ष्मणेनापि किञ्चित्कालमुपावसत् ॥७६॥
नागराश्च सदा यान्ति रामदर्शनलालसाः ।
चित्रकूटस्थितं ज्ञात्वा सीतया लक्ष्मणेन च ॥७७॥
दृष्ट्वा तज्जनसम्बाधं रामस्तत्याज तं गिरिम् ।
दण्डकारण्यगमने कार्यमप्यनुचिन्तयन् ॥७८॥
अन्वगात्सीतया भ्रात्रा ह्यत्रेराश्रममुत्तमम् ।
सर्वत्र सुखसंवासं जनसम्बाधवजितम् ॥७९॥
गत्वा मुनिमुपासीनं भासयन्तं तपोवनम् ।
दण्डवत्प्रणिपत्याह रामोऽहमभिवादये ॥८०॥
पितुराज्ञां पुरस्कृत्य दण्डकानहमागतः ।
वनवासमिषेणापि धन्योऽहं दर्शनात्तव ॥८१॥
हिन्दी अनुवाद
रामचन्द्रजीके इस प्रकार कहनेपर कैकेयीने आनन्द और विस्मयपूर्वक रामकी परिक्रमा की और पृथिवीपर शिर रखकर उन्हें सैकड़ों बार प्रणाम कर प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको चली तथा भरतजी मन्त्रिगण, माताओं और वसिष्ठजीके साथ श्रीरामचन्द्रजीका ही स्मरण करते हुए शीघ्रतासे अयोध्याको चले ।
उदार-बुद्धि भरतजी समस्त पुरवासी और देशवासियोंको यथायोग्य अयोध्यापुरीमें बसाकर स्वयं नन्दिग्रामको चले गये । वहाँ एक सिंहासनपर उन दोनों पादुकाओंको रखकर वे श्रीरामचन्द्रजीके समान ही उनकी नित्यप्रति भक्तिपूर्वक गन्ध, पुष्प और अक्षतादि सम्पूर्ण राजोचित सामग्रीसे पूजा करने लगे । इस प्रकार भरतजी फल-मूल खाते, इन्द्रिय-दमन करते, जटा और वल्कल धारण किये, पृथिवीपर शयन करते और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए शत्रुघ्नके साथ रहने लगे॥ ६८-७३ ॥ पृथिवीके जितने राजकार्य होते उन सबको वे रघुश्रेष्ठ (भरतजी) पादुकाओंके सामने निवेदन कर दिया करते थे ॥ ७४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षासे अवधिके दिन-गिनते हुए वे राममें ही मन लगाकर साक्षात् ब्रह्मर्षिके समान रहने लगे ॥ ७५ ॥
इधर रामचन्द्रजीने भी मुनियोंसे घिरे रहकर सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूट-पर्वतपर कुछ दिन बिताये ॥ ७६ ॥ रामचन्द्रजीको सीता और लक्ष्मणके साथ चित्रकूटपर विराजमान सुनकर आसपासके नगर-निवासी उनके दर्शनोंकी इच्छासे सदैव आया करते थे ॥ ७७ ॥ रामचन्द्रजीने उस भीड़-भाड़को देखकर और अपने दण्डकारण्यमें जानेके कार्यको भी विचारकर उस पर्वतको छोड़ दिया ॥ ७८ ॥ वहाँसे चलकर वे सीता तथा लक्ष्मणके सहित अत्रि मुनिके अति उत्तम और जन-समूह-शून्य आश्रममें आये जो सब प्रकार सुखपूर्वक रहनेयोग्य था ॥ ७९ ॥
वहाँ पहुँचनेपर उन्होंने अपने आश्रममें विराजमान और सम्पूर्ण तपोवनको प्रकाशित करते हुए मुनीश्वरके पास जा उन्हें दण्डवत्-प्रणाम करके कहा—"मैं राम आपका अभिवादन करता हूँ ॥ ८० ॥ मैं पिताकी आज्ञासे दण्डकारण्यमें आया हूँ । इस समय वनवासके मिससे भी आपका दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया।" ॥ ८१ ॥