अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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| सर्ग ९ ] | अयोध्याकाण्ड | ९७ |
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| त्वं साक्षाद्विष्णुरव्यक्तः परमात्मा सनातनः।<br>मायामानुषरूपेण मोहयस्यखिलं जगत्।<br>त्वयैव प्रेरितो लोकः कुरुते साध्वसाधु वा ॥५७॥<br><br>त्वदधीनमिदं विश्वमस्वतन्त्रं करोति किम्।<br>यथा कृत्रिमनेर्तक्यो नृत्यन्ति कुहकेच्छया ॥५८॥<br><br>त्वदधीना तथा माया नर्तकी बहुरूपिणी।<br>त्वयैव प्रेरिताऽहं च देवकार्यं करिष्यता ॥५९॥<br><br>पापिष्ठं पापमनसा कर्माचरमरिन्दम।<br>अद्य प्रतीतोऽसि मम देवानामप्यगोचरः ॥६०॥<br><br>पाहि विश्वेश्वरानन्त जगन्नाथ नमोऽस्तु ते।<br>छिन्धि स्नेहमयं पाशं पुत्रवित्तादिगोचरम् ॥६१॥<br><br>त्वज्ज्ञानानलखङ्गेन त्वामहं शरणं गता।<br><br>कैकेय्या वचनं श्रुत्वा रामः सस्मितमब्रवीत् ॥६२॥<br><br>यदाह मां महाभागे नानृतं सत्यमेव तत्।<br>मयैव प्रेरिता वाणी तव वक्त्राद्विनिर्गता ॥६३॥<br><br>देवकार्यार्थसिद्धयर्थमत्र दोषः कुतस्तव।<br>गच्छ त्वं हृदि मां नित्यं भावयन्ती दिवानिशम् ॥<br><br>सर्वत्र विगतस्नेहा मद्भक्त्या मोक्ष्यसेऽचिरात्।<br>अहं सर्वत्र समदृग् द्वेष्यो वा प्रिय एव वा ॥६५॥<br><br>नास्ति मे कल्पकस्येव भजतोऽनुभजाम्यहम्।<br>मन्मायामोहितधियो मामम्ब मनुजाकृतिम् ॥६६॥<br><br>सुखदुःखाद्यनुगतं जानन्ति न तु तत्त्वतः।<br>दिष्टया मद्गोचरं ज्ञानमुत्पन्नं ते भवापहम् ॥६७॥<br><br>स्मरन्ती तिष्ठ भवने लिप्यसे न च कर्मभिः। | विष्णु भगवान्, अव्यक्त परमात्मा और सनातन पुरुष हैं। अपने मायामय मनुष्यरूपसे आप समस्त संसारको मोहित कर रहे हैं। आपकी ही प्रेरणासे लोग शुभ अथवा अशुभ कर्म करते हैं॥ ५७॥ यह सम्पूर्ण विश्व आपहीके अधीन है, अस्वतन्त्र होनेके कारण यह स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता; जिस प्रकार कृत्रिम नर्त्तकियां (कठपुतलियाँ) सूत्रधार (बाजीगर) की इच्छानुसार ही नाचती हैं॥ ५८॥ उसी प्रकार नाना आकार धारण करनेवाली यह मायारूपिणी नटी आपहीके अधीन है। और हे शत्रुदमन! देवताओंका कार्य सिद्ध करनेकी इच्छावाले आपहीके द्वारा प्रेरित होकर मुझ पापिनीने अपनी दुष्टबुद्धिसे यह पापकर्म किया था। आज मैंने आपको जान लिया, आप देवताओंके भी मन और वाणी आदिसे परे हैं॥ ५९-६०॥ हे विश्वेश्वर ! हे अनन्त ! आप मेरी रक्षा कीजिये। हे जगन्नाथ ! आपको नमस्कार है। हे प्रभो ! मैं आपकी शरण हूँ। आप अपने ज्ञानाग्निरूप खड्गसे मेरे पुत्र और धन आदिके स्नेह-बन्धनको काट डालिये।"<br><br>कैकेयीके ये वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने मुसकराकर कहा—॥ ६१-६२॥ "हे महाभागे ! तुमने जो कुछ कहा है वह ठीक ही है, मिथ्या नहीं। मेरी प्रेरणासे ही देवताओंकी कार्यसिद्धिके लिये तुम्हारे मुखसे वे शब्द निकले थे। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। अब तुम जाओ; अहर्निश निरन्तर मेरी ही भावना करनेसे तुम सर्वत्र स्नेहरहित होकर मेरी भक्तिद्वारा शीघ्र ही मुक्त हो जाओगी। मैं सर्वत्र समदर्शी हूँ, मेरा कोई भी प्रिय या अप्रिय नहीं है ॥ ६३-६५॥ मायावी पुरुष जिस प्रकार अपनी ही मायासे रचे पदार्थोंमें राग-द्वेष नहीं करता उसी प्रकार मेरा भी किसीमें राग-द्वेष नहीं है। जो पुरुष जिस प्रकार मेरा भजन करता है मैं भी वैसे ही उसका ध्यान रखता हूँ। हे मात: ! मेरी मायासे मोहित होकर लोग मुझे सुख-दुःखके वशीभूत साधारण मनुष्य जानते हैं। वे मेरे वास्तविक स्वरूपको नहीं जानते। तुम्हारा बड़ा भाग्य है जो तुम्हें संसार-भयको दूर करनेवाला मेरा तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ है॥ ६६-६७॥ तुम मेरा स्मरण करती हुई घरहीमें रहो, इससे तुम कर्म-बन्धनमें नहीं बँधोगी।" |