अध्यात्म रामायण
Adhyatma Ramayana
महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें९६ अध्यात्मरामायण [ सर्ग ९
योगमायापि सीतेति जाता जनकनन्दिनी । शेषोऽपि लक्ष्म॑णो जातो राममन्वेति सर्वदा ॥४४॥ रावणं हन्तुकामास्ते गमिष्यन्ति न संशयः। कैकेय्या वरदानादि यद्यन्निष्ठुरभाषणम् ॥४५॥ सर्वं देवकृतं नोचेदेवं सा भाषयेत्कथम् । तस्मात्त्यजाग्रहं तात रामस्य विनिवर्तने ॥४६॥ निवर्तस्व महासैन्यैर्मातृभिः सहितः पुरम् । रावणं सकुलं हत्वा शीघ्रमेवागमिष्यति ॥४७॥ इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं भरतो विस्मयान्वितः । गत्वा समीपं रामस्य विस्मयोत्फुल्ललोचनः ॥४८॥ पादुके देहि राजेन्द्र राज्याय तव पूजिते । तयोः सेवां करोम्येव यावदागमनं तव ॥४९॥ इत्युक्त्वा पादुके दिव्ये योजयामास पादयोः। रामस्य ते ददौ रामो भरतायातिभक्तितः ॥५०॥ गृहीत्वा पादुके दिव्ये भरतो रत्नभूषिते । रामं पुनः परिक्रम्य प्रणनाम पुनः पुनः ॥५१॥ भरतः पुनराहेदं भक्त्या गद्गदया गिरा । नवपञ्चसमान्ते तु प्रथमे दिवसे यदि ॥५२॥ नागमिष्यसि चेद्राम प्रविशामि महानलम् । बाढमित्येव तं रामो भरतं संन्यवर्तयत् ॥५३॥ ससैन्यः सवसिष्ठश्च शत्रुघ्नसहितः सुधीः । मातृभिर्मन्त्रिभिः सार्धं गमनायोपचक्रमे ॥५४॥ कैकेयी राममेकान्ते स्रवन्नेत्रजलाकुला । प्राञ्जलिः प्राह हे राम तव राज्यविघातनम् ॥५५॥ कृतं मया दुष्टधिया मायामोहितचेतसा । क्षमस्व मम दौरात्म्यं क्षमासारा हि साधवः ॥५६॥
रूपसे जन्म लिया है ॥४३॥ इसी प्रकार योगमाया- ने जनकनन्दिनी सीताके रूपसे अवतार लिया है। और शेषजी लक्ष्मणके रूपसे उत्पन्न होकर उनका अनुगमन कर रहे हैं ॥४४॥ वे रावणको मारना चाहते हैं इसलिये निस्सन्देह वनको ही जायेंगे। कैकेयी- के जो कुछ भी वरदान आदि और निष्ठुर भाषण आदि कार्य हैं वे सब देवताओंकी प्रेरणासे ही हुए हैं, नहीं तो वह ऐसे वचन कैसे बोल सकती थी ? इस- लिये हे तात ! तुम रामको लौटानेका आग्रह छोड़ दो ॥४५-४६॥ और भाई शत्रुघ्न तथा सेनाके सहित अयोध्याको लौट चलो; राम भी कुलसहित रावणका संहार करके वहाँ शीघ्र ही आ जायेंगे" ॥४७॥
गुरुजीके ये वचन सुनकर भरतको अति विस्मय हुआ और उन्होंने आश्चर्यचकित होकर श्रीरामचन्द्र- जीके पास जाकर कहा-॥४८॥ "हे राजेन्द्र ! आप मुझे राज्य-शासनके लिये अपनी जगत्पूज्य चरण- पादुकाएँ दीजिये । जबतक आप लौटेंगे तबतक मैं उन्हींकी सेवा करता रहूँगा ।" ॥४९॥
ऐसा कह भरतजीने उन्हें उनके चरणोंमें दो दिव्य पादुकाएँ (खड़ाऊँ) पहना दीं । श्रीरामचन्द्र- जीने भरतका भक्ति-भाव देखकर वे खड़ाऊँ उन्हें दे दीं ॥५०॥ भरतजीने वे रत्नजटित दिव्य पादुकाएँ लेकर श्रीरामचन्द्रजीकी परिक्रमा की और उन्हें बारम्बार प्रणाम किया ॥५१॥
तदनुसार, वे भक्तिवश गद्गद्-वाणीसे बोले, "हे राम ! यदि चौदह वर्षके व्यतीत होनेपर आप पहले दिन ही अयोध्या न पहुँचे तो मैं महान् अग्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ।" तब रामचन्द्रजीने 'बहुत अच्छा' कह भरतजीको विदा किया ॥ ५२-५३ ॥
तदुपरान्त बुद्धिमान् भरतजीने सम्पूर्ण सेना, वसिष्ठ, शत्रुघ्न, समस्त माताओं तथा मन्त्रियोंके साथ चलनेकी तैयारी की ॥५४॥
इसी समय कैकेयीने एकान्त स्थानमें नेत्रोंमें जल भरकर हाथ जोड़कर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा-"हे राम ! मायासे मुग्धचित्त हो जानेके कारण मुझ कुबुद्धिने तुम्हारे राज्याभिषेकमें विघ्न डाल दिया सो तुम मेरी इस कुटिलताको क्षमा करना क्योंकि साधुजन सर्वदा क्षमाशील ही होते हैं ॥ ५५-५६ ॥ आप साक्षात्