भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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सर्ग ९ ]अयोध्याकाण्ड९५
स जीवन्नेव मृतको देहान्ते निरयं व्रजेत् ।<br>तस्माद्राज्यं प्रशाधि त्वं वयं दण्डकपालकाः ॥३२॥अतः तुम राज्य-शासन करो, हम दण्डकवनकी रक्षा करेंगे ॥ ३१-३२ ॥
भरतस्त्वब्रवीद्रामं कामुको मूढधीः पिता ।<br>स्त्रीजितो भ्रान्तहृदय उन्मत्तो यदि वक्ष्यति ।<br>तत्सत्यमिति न ग्राह्यं भ्रान्तवाक्यं यथा सुधीः ३३तब भरतजीने श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—"यदि पिताजीने कामी, मूढ़बुद्धि, स्त्रीके वशीभूत, भ्रान्तचित्त और उन्मत्त होनेके कारण ऐसा कह भी दिया है तो भी उसे सत्य न मानना चाहिये; जिस प्रकार बुद्धिमान् लोग भ्रान्त पुरुषोंके वाक्यका आदर नहीं करते ॥३३॥
श्रीराम उवाच<br>न स्त्रीजितः पिता ब्रूयान्न कामी नैव मूढधीः ।<br>पूर्वं प्रतिश्रुतं तस्य सत्यवादी ददौ भयात् ॥३४॥<br>असत्याद्भीतिरधिका महतां नरकादपि ।<br>करोमीत्यहमप्येतत्सत्यं तस्यै प्रतिश्रुतम् ॥३५॥<br>कथं चाक्यमहं कुर्यामसत्यं राघवो हि सन् ।<br>इत्युदीरितमाकर्ण्य रामस्य भरतोऽब्रवीत् ॥३६॥<br>तथैव चीरवसनो वने वत्स्यामि सुव्रत ।<br>चतुर्दश समास्त्वं तु राज्यं कुरु यथासुखम् ॥३७॥**श्रीरामजी बोले—**पिताजीने स्त्रीवश, कामवश अथवा मूढ़बुद्धि होकर ऐसा नहीं कहा। उन सत्यवादीने अपनी पूर्व-प्रतिज्ञानुसार ही प्रतिज्ञा-भंगके भयसे ये वर दिये थे ॥ ३४ ॥ महान् पुरुषोंको असत्यसे नरककी अपेक्षा भी अधिक भय हुआ करता है। मैं भी 'ऐसा ही करूँगा' यह कहकर उनसे सत्य-प्रतिज्ञा कर चुका हूँ ॥ ३५ ॥ फिर, मैं रघुवंशमें जन्म लेकर अपना वचन कैसे उलट सकता हूँ ?<br><br>रामजीका ऐसा कथन सुनकर भरतजी बोले—॥३६॥ “हे सुव्रत ! पिताजीके कथनानुसार मैं तो आपके समान चौदह वर्षतक वल्कल-वस्त्र धारणकर वनमें रहूँगा और आप सुखपूर्वक राज्य भोगिये" ॥ ३७ ॥
श्रीराम उवाच<br>पित्रा दत्तं तवैवैतद्राज्यं मह्यं वनं ददौ ।<br>व्यत्ययं यद्यहं कुर्यामसत्यं पूर्ववत् स्थितम् ॥३८॥**श्रीरामजी बोले—**पिताजीने तुमको यह राज्य और मुझे वनवास दिया है। अब यदि मैं इसका उलटा करूँ तो असत्य ज्यों-का-त्यों ही रहता है ॥ ३८ ॥
भरत उवाच<br>अहमप्यागमिष्यामि सेवे त्वां लक्ष्मणो यथा ।<br>नोचेत्प्रायोपवेशनं त्यजाम्येतत्कलेवरम् ॥३९॥<br>इत्येवं निश्चयं कृत्वा दर्भानास्तीर्य चातपे ।<br>मनसापि विनिश्चित्य प्राङ्मुखोपविवेश सः ॥४०॥<br>भरतस्यापि निर्बन्धं दृष्ट्वा रामोऽतिविस्मितः ।<br>नेत्रान्तसंज्ञां गुरवे चकार रघुनन्दनः ॥४१॥भरतजी बोले—( अच्छा, यदि आप वनसे नहीं लौटना चाहते तो मुझे आज्ञा दीजिये, जिससे ) मैं भी वनमें आकर लक्ष्मणके समान ही आपकी सेवा करूँ, नहीं तो मैं अन्न-जल छोड़कर इस शरीरको त्याग दूँगा ॥ ३९ ॥ अपना ऐसा निश्चय प्रकट कर और मनमें भी यही ठानकर वे धूपमें कुशा बिछाकर पूर्वकी ओर मुख करके बैठ गये ॥ ४० ॥ भरतजीका ऐसा हठ देखकर श्रीरामचन्द्रजीने अत्यन्त विस्मित हो गुरु वसिष्ठजीको नेत्रोंसे संकेत किया ॥ ४१ ॥
एकान्ते भरतं प्राह वसिष्ठो ज्ञानिनां वरः ।<br>वत्स गुह्यं शृणुष्वेदं मम वाक्यात्सुनिश्चितम् ॥४२॥<br>रामो नारायणः साक्षाद्ब्रह्मणा याचितः पुरा ।<br>रावणस्य वधार्थाय जातो दशरथात्मजः ॥४३॥तब ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीने भरतको एकान्तमें ले जाकर कहा, "वत्स ! मैं जो कहता हूँ यह सुनिश्चित गुह्य रहस्यकी बात सुनो ॥४२॥ भगवान् राम साक्षात् नारायण हैं। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके प्रार्थना करनेपर उन्होंने रावणको मारनेके लिये दशरथके यहाँ पुत्र-
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