भारतकोश
अध्यात्म रामायण

अध्यात्म रामायण

Adhyatma Ramayana

महर्षि वेदव्यास (टीकाकार: मुनीलाल) द्वारा

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९४अध्यात्मरामायण[ सर्ग ९

[संस्कृत मूल पाठ]

इङ्गुदीफलपिण्याकरचितान्मधुसम्प्लुतान् ।
वयं यदन्नाः पितरस्तदन्नाः स्मृतिनोदिताः ॥१९॥

इति दुःखाश्रुपूर्णाक्षः पुनः स्नात्वा गृहं ययौ ।
सर्वे रुदित्वा सुचिरं स्नात्वा जग्मुस्तदाश्रमम् ॥२०॥

तस्मिंस्तु दिवसे सर्वे उपवासं प्रचक्रिरे ।
ततः परेद्युर्विमले स्नात्वा मन्दाकिनीजले ॥२१॥

उपविष्टं समागम्य भरतो राममब्रवीत् ।
राम राम महाभाग स्वात्मानमभिषेचय ॥२२॥

राज्यं पालय पित्र्यं ते ज्येष्ठस्त्वं मे पिता तथा ।
क्षत्रियाणामयं धर्मो यत्प्रजापरिपालनम् ॥२३॥

इष्ट्वा यज्ञैर्बहुविधैः पुत्रानुत्पाद्य तन्तवे ।
राज्ये पुत्रं समारोप्य गमिष्यसि ततो वनम् ॥२४॥

इदानीं वनवासस्य कालो नैव प्रसीद मे ।
मातुर्मे दुष्कृतं किञ्चित्स्मर्तुं नार्हसि पाहि नः।२५।

इत्युक्त्वा चरणौ भ्रातुः शिरस्याधाय भक्तितः ।
रामस्य पुरतः साक्षाद्दण्डवत्पतितो भुवि ॥२६॥

उत्थाप्य राघवः शीघ्रमारोप्याङ्केऽतिमक्तितः ।
उवाच भरतं रामः स्नेहार्द्रनयनः शनैः ॥२७॥

शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि त्वयोक्तं यत्तथैव तत् ।
किन्तु मामब्रवीत्तातॊ नव वर्षाणि पञ्च च ॥२८॥

उषित्वा दण्डकारण्ये पुरं पश्चात्समाविश ।
इदानीं भरतायेदं राज्यं दत्तं मयाखिलम् ॥२९॥

ततः पित्रैव सुव्यक्तं राज्यं दत्तं तवैव हि ।
दण्डकारण्यराज्यं मे दत्तं पित्रा तथैव च ॥३०॥

अतः पितुर्वचः कार्यमावाभ्यामतियत्नतः ।
पितुर्वचनमुल्लङ्घ्य स्वतन्त्रो यस्तु वर्तते ॥३१॥


[हिन्दी अनुवाद]

हमारा अन्न है वही हमारे पितरोंको प्रिय होगा, यही स्मृतिकी आज्ञा है' ऐसा कह उन्होंने इंगुदी फलके पिण्ड बना उनपर मधु डालकर उन्हें दान किया ॥ १९॥ फिर नेत्रोंमें शोकाश्रु भरे हुए वे पुनः स्नानकर आश्रममें आये । इसी प्रकार और सब भी बहुत देरतक रोकर अन्तमें स्नान करके आश्रमको लौटे ॥२०॥

उस दिन सबने उपवास किया। दूसरे दिन, मन्दाकिनीके निर्मल जलमें स्नान कर भरतजीने आश्रममें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास आकर कहा—"हे राम ! हे राम ! हे महाभाग ! आप अपना अभिषेक कीजिये ॥ २१-२२ ॥ यह पैतृक राज्य आपहीका है, आप इसका पालन करें । आप हमारे बड़े भाई हैं, अतः पितृतुल्य हैं। महाराज ! प्रजाका पालन करना यही क्षत्रियोंका मुख्य धर्म है। ॥ २३॥ अतः आप नाना प्रकारके यज्ञोंसे यजन करके फिर वंशवृद्धिके लिये पुत्र उत्पन्न कर उसे (बड़े होनेपर) राजसिंहासनपर बैठाकर तब वनको जायें ॥ २४ ॥ हे प्रभो ! अभी वनवासका समय नहीं है, आप मुझपर प्रसन्न होइये । मेरी माताका जो कुछ अपराध है उसे भूल जाइये और हमारी रक्षा कीजिये" ॥ २५॥ ऐसा कहकर उन्होंने भाईके चरणोंको भक्तिपूर्वक अपने मस्तकपर रख लिया और श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख दण्डके समान पृथिवीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥

रामजीने भरतको शीघ्रतासे उठाकर अति प्रेमपूर्वक गोदमें बैठा लिया और नेत्रोंमें प्रेमाश्रु भरकर धीरे-धीरे उनसे कहने लगे—॥ २७॥ “भाई ! मैं जो कहता हूँ वह सुनो । तुम जो कुछ कहते हो सो बिलकुल ठीक है । किन्तु पिताजीने मुझे आज्ञा दी थी कि चौदह वर्ष दण्डकारण्यमें रहकर फिर अयोध्यामें आना; इस समय यह सम्पूर्ण राज्य मैं भरतको देता हूँ ॥ २८-२९ ॥ अतः स्पष्ट ही पिताजीने यह राज्य तो तुम्हींको दिया है और वैसे ही मुझे उन्होंने दण्डकारण्यका राज्य दिया है ॥ ३० ॥ इसलिये हम दोनोंको ही प्रयत्नपूर्वक पिताजीके वचनोंको सफल करना चाहिये । जो मनुष्य अपने पिताके वचनोंका उल्लङ्घन कर स्वेच्छापूर्वक बरतता है वह जीता हुआ भी मृतकके समान है और शरीर छोड़नेपर नरकको जाता है ।